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किसानों को बनारसी कड़ाका बांट कर बना रहे आत्मनिर्भर
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झांसी। रक्सा के पास ग्राम रामगढ़ निवासी प्रगतिशील किसान प्रभुदयाल स्वयं जैविक खेती करते हैं और अन्य किसानों को जागरूक कर रहे हैं। वह ‘बनारसी कड़ाका’ प्रजाति के बेर की कलम दूसरे किसानों के खेतों में लगे बेर के पेड़ पर निशुल्क लगा रहे हैं। अब तक दो सौ से अधिक किसानों के यहां कलम लगा चुके हैं। साल भर में बेर का पेड़ तैयार हो जाता है। इस बेर की बहुत मांग है। बेर का पेड़ एक सीजन में एक क्विंटल या उससे अधिक फल देता है। मार्केट में यह साठ से सत्तर रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। जिन किसानों को फसलों में फायदा नहीं होता है, उनके लिए यह बेर आय बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है।
बेर के फल की करीब पचास प्रजातियां हैं। इनमें से करीब बीस भारत में पाई जाती हैं। लेकिन, बागवानी के हिसाब से बहुत कम प्रजातियां उपयोगी हैं। पके बेर में विटामिन सी, ए, बी, शर्करा, खनिज पदार्थ, कैल्शियम, मैग्नीशियम और जस्ता प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बेर की उमरान किस्म राजस्थान में पाई जाती है। इसके अलावा माधुरी, काठा, कोठी, अजमेरी, देलही गोला, नाजुक, सेब आदि प्रमुख हैं। नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद ने चालीस किस्म के बेरों को एकत्रित कर देश में बेर की प्रमुख सात किस्मों का वर्गीकरण किया है। इसमें गोला, कालीगोरा, बनारसी कड़ाका, कैथिली, मुड़िया मुरहरा, पोंडा व उमरान प्रमुख हैं। इनमें से बनारसी कड़ाका बेर की प्रसिद्ध किस्म है। इस बेर का आकार लंबा होता है और एक बेर औसत 17 ग्राम का होता है। एक सीजन में एक पेड़ से 125 किलोग्राम पैदावार होती है।
किसान प्रभुदयाल ने बताया कि उन्हें राजकीय उद्यान नारायण बाग में सबसे पहले इसके बारे में जानकारी मिली थी, तभी उन्होंने इसकी ट्रेनिंग लेकर कलम लगानी शुरू कर दी। इसकी कलम देशी बेर के पेड़ पर लगाई जाती है। एक साल में कलम से पेड़ तैयार हो जाता है और फल देने लगता है। बुंदेलखंड में बेर के अनुकूल मौसम होने के कारण इसका पेड़ जल्दी तैयार हो जाता है। एक बेर दो सौ ग्राम तक वजन का हो जाता है। शुरूआत में कुल पांच किग्रा बेर तैयार होते हैं। अगली साल तक एक क्विंटल तक बेर का उत्पादन होता है। इन दिनों कलम लगाने का सीजन चल रहा है, इसलिए किसान प्रभुदयाल प्रतिदिन कहीं न कहीं कलम लगाने पहुंच जाते हैं। सीजन में यह बेर साठ से सत्तर रुपये प्रति किग्रा की दर से बिकता है। बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।
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उन्होंने बताया कि शुरूआत में किसानों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब उन्हें समझ में आ गया है कि अतिरिक्त आमदनी व आत्मनिर्भर होने के लिए कुछ न कुछ अलग करना पड़ेगा।
पांच सौ हेक्टेयर में ‘बनारसी कड़ाका’ बेर का उत्पादन हो रहा है। यह किसानों के लिए बहुत लाभदायक है।
- विनय कुमार यादव, उपनिदेशक उद्यान
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बेर के फल की करीब पचास प्रजातियां हैं। इनमें से करीब बीस भारत में पाई जाती हैं। लेकिन, बागवानी के हिसाब से बहुत कम प्रजातियां उपयोगी हैं। पके बेर में विटामिन सी, ए, बी, शर्करा, खनिज पदार्थ, कैल्शियम, मैग्नीशियम और जस्ता प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बेर की उमरान किस्म राजस्थान में पाई जाती है। इसके अलावा माधुरी, काठा, कोठी, अजमेरी, देलही गोला, नाजुक, सेब आदि प्रमुख हैं। नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद ने चालीस किस्म के बेरों को एकत्रित कर देश में बेर की प्रमुख सात किस्मों का वर्गीकरण किया है। इसमें गोला, कालीगोरा, बनारसी कड़ाका, कैथिली, मुड़िया मुरहरा, पोंडा व उमरान प्रमुख हैं। इनमें से बनारसी कड़ाका बेर की प्रसिद्ध किस्म है। इस बेर का आकार लंबा होता है और एक बेर औसत 17 ग्राम का होता है। एक सीजन में एक पेड़ से 125 किलोग्राम पैदावार होती है।
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किसान प्रभुदयाल ने बताया कि उन्हें राजकीय उद्यान नारायण बाग में सबसे पहले इसके बारे में जानकारी मिली थी, तभी उन्होंने इसकी ट्रेनिंग लेकर कलम लगानी शुरू कर दी। इसकी कलम देशी बेर के पेड़ पर लगाई जाती है। एक साल में कलम से पेड़ तैयार हो जाता है और फल देने लगता है। बुंदेलखंड में बेर के अनुकूल मौसम होने के कारण इसका पेड़ जल्दी तैयार हो जाता है। एक बेर दो सौ ग्राम तक वजन का हो जाता है। शुरूआत में कुल पांच किग्रा बेर तैयार होते हैं। अगली साल तक एक क्विंटल तक बेर का उत्पादन होता है। इन दिनों कलम लगाने का सीजन चल रहा है, इसलिए किसान प्रभुदयाल प्रतिदिन कहीं न कहीं कलम लगाने पहुंच जाते हैं। सीजन में यह बेर साठ से सत्तर रुपये प्रति किग्रा की दर से बिकता है। बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।
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उन्होंने बताया कि शुरूआत में किसानों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब उन्हें समझ में आ गया है कि अतिरिक्त आमदनी व आत्मनिर्भर होने के लिए कुछ न कुछ अलग करना पड़ेगा।
पांच सौ हेक्टेयर में ‘बनारसी कड़ाका’ बेर का उत्पादन हो रहा है। यह किसानों के लिए बहुत लाभदायक है।
- विनय कुमार यादव, उपनिदेशक उद्यान