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पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए उन्हें भोजन देने के लिए किया जाता है श्राद्ध
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मोंठ। पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न करने के लिए जल अर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। परंपरा के अनुसार पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए उन्हें भोजन देने के लिए श्राद्ध किया जाता है। तपोभूमि ग्राम बघेरा के वेद मूर्ति पंडित परशुराम शास्त्री आश्रम के संचालक आचार्य आनंद स्वामी जी महाराज ने पितृपक्ष में श्राद्ध के बारे में बताते हुए कहा कि सबसे पहले किसने किया था श्राद्ध, कैसे शुरू हुई ये परंपरा श्राद्ध के बारे में अनेक धर्म ग्रंथों में कई बातें बताई गई हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई ऐसी बातें बताई हैं, जो वर्तमान समय में बहुत कम लोग जानते हैं। महाभारत में ये भी बताया गया है कि श्राद्ध की परंपरा कैसे शुरू हुई और फिर कैसे ये धीरे-धीरे जनमानस तक पहुंची।
महाभारत के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध का कर्म प्रारंभ किया, उसके बाद अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे। लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।
पहले पिता को देना चाहिए पिंड
महाभारत के अनुसार, अग्नि में हवन करने के बाद जो पितरों के निमित्त पिंडदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस भी दूषित नहीं करते। श्राद्ध में अग्निदेव को उपस्थित देखकर राक्षस वहां से भाग जाते हैं। सबसे पहले पिता को, उनके बाद दादा को उसके बाद परदादा को पिंड देना चाहिए। यही श्राद्ध की विधि है। प्रत्येक पिंड देते समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जाप तथा सोमाय पितृमते स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए।
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कुल के पितरों को करें तृप्त
रजस्वला स्त्री को श्राद्ध का भोजन तैयार करने में नहीं लगाना चाहिए। तर्पण करते समय पिता-पितामह आदि के नाम का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। किसी नदी के किनारे पहुंचने पर पितरों का पिंडदान और तर्पण अवश्य करना चाहिए। पहले अपने कुल के पितरों को जल से तृप्त करने के पश्चात मित्रों और संबंधियों को जलांजलि देनी चाहिए। चितकबरे बैलों से जुती हुई गाड़ी में बैठकर नदी पार करते समय बैलों की पूंछ से पितरों का तर्पण करना चाहिए क्योंकि पितर ऐसे तर्पण की अभिलाषा रखते हैं।
अमावस्या पर जरूर करना चाहिए श्राद्ध
नाव से नदी पार करने वालों को भी पितरों का तर्पण करना चाहिए, जो तर्पण के महत्व को जानते हैं, वे नाव में बैठने पर एकाग्रचित्त हो अवश्य ही पितरों का जलदान करते हैं। कृष्णपक्ष में जब महीने का आधा समय बीत जाए, उस दिन अर्थात अमावस्या तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
इसलिए रखना चाहिए पितरों को प्रसन्न
पितरों की भक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य और धन की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी, पुलस्त्य, वशिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप ये सात ऋषि महान योगेश्वर और पितर माने गए हैं। मरे हुए मनुष्य अपने वंशजों द्वारा पिंडदान पाकर प्रेतत्व के कष्ट से छुटकारा पा जाते हैं।
ऐसे करना चाहिए पिंडदान
महाभारत के अनुसार, श्राद्ध में जो तीन पिंडों का विधान है, उनमें से पहला जल में डाल देना चाहिए। दूसरा पिंड श्राद्धकर्ता की पत्नी को खिला देना चाहिए और तीसरे पिंड को अग्नि में छोड़ देना चाहिए, यही श्राद्ध का विधान है। जो इसका पालन करता है उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त और संतुष्ट रहते हैं और उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
1, पहला पिंड जो पानी के भीतर चला जाता है, वह चंद्रमा को तृप्त करता है और चंद्रमा स्वयं देवता तथा पितरों को संतुष्ट करते हैं।
2, इसी प्रकार पत्नी गुरुजनों की आज्ञा से जो दूसरा पिंड खाती है, उससे प्रसन्न होकर पितर पुत्र की कामना वाले पुरुष को पुत्र प्रदान करते हैं।
3, तीसरा पिंड अग्नि में डाला जाता है, उससे तृप्त होकर पितर मनुष्य की संपूर्ण कामनाएं पूर्ण करते हैं।
आचार्य आनंद स्वामी जी ने कहा कि शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिए। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने पार्वती जी को स्पष्ट रूप से कहा है ,जो एकादशी के दिन श्राद्ध करते हैं तो श्राद्ध को खाने वाला और श्राद्ध को खिलाने वाला और जिस के निमित्त वह श्राद्ध हो रहा है वह पितर, तीनों नर्क गामी होते हैं । इसके लिए ठीक तो यही होगा कि वह उस दिन के निमित्त द्वादशी को श्राद्ध करें।
श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता
आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है,क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।
पितरों को पहले थाली नहीं देवें,
पितृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। भोजन बनाकर पहले भगवान को भोग लगाना चाहिए। भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि मिलती है। पितृ लोक का एक दिन मृत्युलोक के 1 वर्ष के बराबर होता है। यहां एक वर्ष बीतता है तो पितृ लोक में एक दिन बीतता है। केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम ,श्री महा मंत्र का जप ,और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है ।जब तक यह पंच भौतिक देह है तब तक इस संबंध में जो शास्त्र आज्ञा और उपक्रम है उनका भी निर्वाह करना पड़ेगा । गया जी करने के बाद भी हमें श्राद्ध करना चाहिए। गया जी का श्राद्ध एक विशिष्ट कर्म है, और प्रत्येक वर्ष की पितृ तिथि पर श्राद्ध यह हमारा नित्यकर्म है। इसलिए गया जी के बाद भी श्राद्ध कर्म करना गरुड़ पुराण अनुसार धर्म सम्मत है। यह सभी कर्म सनातन हिंदू धर्मावलंबियों के लिए हमारे ऋषियों ने निर्धारित किए हैं । प्रत्येक धर्म में अपने पूर्वजों के लिए अलग-अलग प्रकार से सद्गति के लिए प्रक्रिया होती है, जिसका वे पालन करते हैं। हम लोग केवल अपने सनातन धर्म की आज्ञा का ही पालन करते हैं। नास्तिक लोगों के लिए यहां पर कोई जगह नहीं है। क्योंकि, यह कहा जाता है नास्तिक व्यक्ति भी मृत्यु के बाद में प्रेत योनि को ही प्राप्त होता है।
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महाभारत के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध का कर्म प्रारंभ किया, उसके बाद अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे। लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।
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पहले पिता को देना चाहिए पिंड
महाभारत के अनुसार, अग्नि में हवन करने के बाद जो पितरों के निमित्त पिंडदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस भी दूषित नहीं करते। श्राद्ध में अग्निदेव को उपस्थित देखकर राक्षस वहां से भाग जाते हैं। सबसे पहले पिता को, उनके बाद दादा को उसके बाद परदादा को पिंड देना चाहिए। यही श्राद्ध की विधि है। प्रत्येक पिंड देते समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जाप तथा सोमाय पितृमते स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए।
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कुल के पितरों को करें तृप्त
रजस्वला स्त्री को श्राद्ध का भोजन तैयार करने में नहीं लगाना चाहिए। तर्पण करते समय पिता-पितामह आदि के नाम का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। किसी नदी के किनारे पहुंचने पर पितरों का पिंडदान और तर्पण अवश्य करना चाहिए। पहले अपने कुल के पितरों को जल से तृप्त करने के पश्चात मित्रों और संबंधियों को जलांजलि देनी चाहिए। चितकबरे बैलों से जुती हुई गाड़ी में बैठकर नदी पार करते समय बैलों की पूंछ से पितरों का तर्पण करना चाहिए क्योंकि पितर ऐसे तर्पण की अभिलाषा रखते हैं।
अमावस्या पर जरूर करना चाहिए श्राद्ध
नाव से नदी पार करने वालों को भी पितरों का तर्पण करना चाहिए, जो तर्पण के महत्व को जानते हैं, वे नाव में बैठने पर एकाग्रचित्त हो अवश्य ही पितरों का जलदान करते हैं। कृष्णपक्ष में जब महीने का आधा समय बीत जाए, उस दिन अर्थात अमावस्या तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
इसलिए रखना चाहिए पितरों को प्रसन्न
पितरों की भक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य और धन की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी, पुलस्त्य, वशिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप ये सात ऋषि महान योगेश्वर और पितर माने गए हैं। मरे हुए मनुष्य अपने वंशजों द्वारा पिंडदान पाकर प्रेतत्व के कष्ट से छुटकारा पा जाते हैं।
ऐसे करना चाहिए पिंडदान
महाभारत के अनुसार, श्राद्ध में जो तीन पिंडों का विधान है, उनमें से पहला जल में डाल देना चाहिए। दूसरा पिंड श्राद्धकर्ता की पत्नी को खिला देना चाहिए और तीसरे पिंड को अग्नि में छोड़ देना चाहिए, यही श्राद्ध का विधान है। जो इसका पालन करता है उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त और संतुष्ट रहते हैं और उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
1, पहला पिंड जो पानी के भीतर चला जाता है, वह चंद्रमा को तृप्त करता है और चंद्रमा स्वयं देवता तथा पितरों को संतुष्ट करते हैं।
2, इसी प्रकार पत्नी गुरुजनों की आज्ञा से जो दूसरा पिंड खाती है, उससे प्रसन्न होकर पितर पुत्र की कामना वाले पुरुष को पुत्र प्रदान करते हैं।
3, तीसरा पिंड अग्नि में डाला जाता है, उससे तृप्त होकर पितर मनुष्य की संपूर्ण कामनाएं पूर्ण करते हैं।
आचार्य आनंद स्वामी जी ने कहा कि शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिए। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने पार्वती जी को स्पष्ट रूप से कहा है ,जो एकादशी के दिन श्राद्ध करते हैं तो श्राद्ध को खाने वाला और श्राद्ध को खिलाने वाला और जिस के निमित्त वह श्राद्ध हो रहा है वह पितर, तीनों नर्क गामी होते हैं । इसके लिए ठीक तो यही होगा कि वह उस दिन के निमित्त द्वादशी को श्राद्ध करें।
श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता
आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है,क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।
पितरों को पहले थाली नहीं देवें,
पितृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। भोजन बनाकर पहले भगवान को भोग लगाना चाहिए। भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि मिलती है। पितृ लोक का एक दिन मृत्युलोक के 1 वर्ष के बराबर होता है। यहां एक वर्ष बीतता है तो पितृ लोक में एक दिन बीतता है। केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम ,श्री महा मंत्र का जप ,और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है ।जब तक यह पंच भौतिक देह है तब तक इस संबंध में जो शास्त्र आज्ञा और उपक्रम है उनका भी निर्वाह करना पड़ेगा । गया जी करने के बाद भी हमें श्राद्ध करना चाहिए। गया जी का श्राद्ध एक विशिष्ट कर्म है, और प्रत्येक वर्ष की पितृ तिथि पर श्राद्ध यह हमारा नित्यकर्म है। इसलिए गया जी के बाद भी श्राद्ध कर्म करना गरुड़ पुराण अनुसार धर्म सम्मत है। यह सभी कर्म सनातन हिंदू धर्मावलंबियों के लिए हमारे ऋषियों ने निर्धारित किए हैं । प्रत्येक धर्म में अपने पूर्वजों के लिए अलग-अलग प्रकार से सद्गति के लिए प्रक्रिया होती है, जिसका वे पालन करते हैं। हम लोग केवल अपने सनातन धर्म की आज्ञा का ही पालन करते हैं। नास्तिक लोगों के लिए यहां पर कोई जगह नहीं है। क्योंकि, यह कहा जाता है नास्तिक व्यक्ति भी मृत्यु के बाद में प्रेत योनि को ही प्राप्त होता है।