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Jhansi News: एनीमिया से लेकर पीसीओडी तक, शुरू में ही पहचान से बड़े खतरे से बच जाएगी बिटिया
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। अगर शुरु में ही सावधानी बरती जाए, कुछ बीमारियों के लक्षणों का पता कर इलाज शुरू करवा दें तो बड़े में होने वाली बीमारियों से बेटी को बचाया जा सकता है। मगर जरूरी है कि एहतियात बरतने की। डॉक्टरों का कहना है कि अगर खून की कमी, पीरियड अनियमित अथवा न होने की समस्या हो तो तुरंत इलाज शुरू कराएं। इससे मातृ-मृत्यु से लेकर बांझपन तक के खतरे को कम अथवा खत्म किया जा सकता है।
किशोरावस्था में एनीमिया से शारीरिक व मानसिक विकास, संक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध शक्ति आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मेडिकल कॉलेज की एसपीएम विभाग की सहायक आचार्य डॉ. सुधा शर्मा का कहना है कि रिपोर्ट के मुताबिक सर्वाइकल कैंसर भारतीय महिलाओं में दूसरा सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है। मगर नौ से 14 साल की उम्र में ही बालिका को एचपीवी वैक्सीन लगवा दी जाए, तो इस बीमारी के खतरे को टाला जा सकता है। उन्होंने बताया कि सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं से शुरू होता है। इलाज न कराने पर समस्या बढ़ जाती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. जसकरन त्रिपाठी ने बताया कि महिलाओं को एनीमिया की वजह से पीठ का दर्द, शारीरिक विकास अवरुद्ध होने समेत कई समस्याएं हो जाती हैं। कमजोरी होने पर डिलीवरी में भी समस्या आती है। इसका असर जन्म लेने वाले बच्चे पर भी पड़ता है। ऐसे में 12 से 14 साल की उम्र में बेटी का विशेष ध्यान देने की जरूरत है। आयरन की गोलियां खिलाकर, पोषण युक्त भोजन कराकर ठीक किया जा सकता है। जंक फूड आदि खाने से महिलाओं को पीसीओडी की भी समस्या हो जाती है। इसमें पीरियड अनियमित अथवा न होने की समस्या हो जाती है। अगर समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो महिला को बांझपन की समस्या हो जाती है। समय पर इलाज कराने से बीमारी ठीक हो जाती है।
क्या कहते हैं आंकड़े
..............................
2020-21 के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़ों को देखें तो झांसी में छह से 59 महीने तक के 70.3 फीसदी बच्चे एनीमिक हैं। हालांकि, 2015-16 में हुए एनएफएचएस-4 के सर्वे के मुताबिक इसमें 7.5 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं, एनएफएचएस-5 के सर्वे में 15 से 49 साल तक की 35.7 फीसदी महिलाएं गर्भवती मिली हैं, जो कि चिंताजनक है।
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झांसी। अगर शुरु में ही सावधानी बरती जाए, कुछ बीमारियों के लक्षणों का पता कर इलाज शुरू करवा दें तो बड़े में होने वाली बीमारियों से बेटी को बचाया जा सकता है। मगर जरूरी है कि एहतियात बरतने की। डॉक्टरों का कहना है कि अगर खून की कमी, पीरियड अनियमित अथवा न होने की समस्या हो तो तुरंत इलाज शुरू कराएं। इससे मातृ-मृत्यु से लेकर बांझपन तक के खतरे को कम अथवा खत्म किया जा सकता है।
किशोरावस्था में एनीमिया से शारीरिक व मानसिक विकास, संक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध शक्ति आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मेडिकल कॉलेज की एसपीएम विभाग की सहायक आचार्य डॉ. सुधा शर्मा का कहना है कि रिपोर्ट के मुताबिक सर्वाइकल कैंसर भारतीय महिलाओं में दूसरा सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है। मगर नौ से 14 साल की उम्र में ही बालिका को एचपीवी वैक्सीन लगवा दी जाए, तो इस बीमारी के खतरे को टाला जा सकता है। उन्होंने बताया कि सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं से शुरू होता है। इलाज न कराने पर समस्या बढ़ जाती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. जसकरन त्रिपाठी ने बताया कि महिलाओं को एनीमिया की वजह से पीठ का दर्द, शारीरिक विकास अवरुद्ध होने समेत कई समस्याएं हो जाती हैं। कमजोरी होने पर डिलीवरी में भी समस्या आती है। इसका असर जन्म लेने वाले बच्चे पर भी पड़ता है। ऐसे में 12 से 14 साल की उम्र में बेटी का विशेष ध्यान देने की जरूरत है। आयरन की गोलियां खिलाकर, पोषण युक्त भोजन कराकर ठीक किया जा सकता है। जंक फूड आदि खाने से महिलाओं को पीसीओडी की भी समस्या हो जाती है। इसमें पीरियड अनियमित अथवा न होने की समस्या हो जाती है। अगर समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो महिला को बांझपन की समस्या हो जाती है। समय पर इलाज कराने से बीमारी ठीक हो जाती है।
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क्या कहते हैं आंकड़े
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2020-21 के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़ों को देखें तो झांसी में छह से 59 महीने तक के 70.3 फीसदी बच्चे एनीमिक हैं। हालांकि, 2015-16 में हुए एनएफएचएस-4 के सर्वे के मुताबिक इसमें 7.5 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं, एनएफएचएस-5 के सर्वे में 15 से 49 साल तक की 35.7 फीसदी महिलाएं गर्भवती मिली हैं, जो कि चिंताजनक है।
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