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शहर की फिजा को रंगीन करेगा गुलाल
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 06 Mar 2017 12:21 AM IST
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holi, jhnansi news
- फोटो : demo
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होली पर शहर की फिजा को रंगीन करने के लिए 150 टन गुलाल तैयार है। पिछले साल शहर में करीब सौ टन गुलाल उड़ाकर होली मनाई गई थी। इस बार होलिका दहन 12 मार्च को होना है, लेकिन रंग 11 मार्च से ही उड़ने लगेगा। इस दिन विधानसभा चुनाव का परिणाम आना है। चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी के समर्थक भी गुलाल उड़ाकर उत्सव मनाएंगे।
पिछले कुछ सालों से सूखे रंगों की होली का चलने बढ़ा है। इस वजह से गुलाल की बिक्री बहुत बढ़ गई है। कम हानिकारक होने के कारण गुलाल का उपयोग भी रंगों की अपेक्षा ज्यादा होता है। बुंदेलखंड में गुलाल बनाने की एकमात्र फैक्ट्री शहर में हैं।
यहां बनने वाले गुलाल में से करीब सौ टन शहर के दुकानदार खरीदते हैं। इस बार शहर के व्यापारियों ने डेढ़ सौ टन गुलाल के लिए आर्डर दिया है। इस फैक्टरी से गुलाल जिले के अन्य स्थानों के अलावा यूपी, एमपी, बिहार समेत अन्य राज्यों में भी जाता है। इसके अलावा शहर में हाथरस में बना गुलाल भी आता है। बाहर से गुलाल मंगाने पर लागत अधिक आती है, इस कारण व्यापारी यहीं पर बने गुलाल को खरीदते हैं। बुंदेलखंड में खनिज की पर्याप्त उपलब्धता होने के कारण गुलाल बनाने का कच्चा माल आसानी से मिल जाता है।
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ये है कीमत
फैक्ट्री में इसके निर्माण की लागत पांच रुपये किलो आती है। इसके बाद इसे दस-दस किलो के पैकेट मेें बंद किया जाता है और छह रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से दुकानदारों तक पहुंचाया जाता है। दुकानदार गुलाल की मांग के अनुसार दस से पचास रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं।
ऐसे बनता है
गुलाल बनाने के लिए विभिन्न मिट्टियों और पत्थरों के चूर्ण का उपयोग होता है। सबसे पहले पत्थरों को रंग के अनुसार छटनी की जाती है। इसके बाद पीसकर इनका चूर्ण बनाया जाता है। रंग के लिए इसमें प्राकृतिक रंगों को मिलाया जाता है। एक टन चूर्ण में सिर्फ एक किलो रंग ही मिलाया जाता है। खुशबू के लिए इत्र का उपयोग भी किया जाता है। गुलाल बनाने के लिए काली मिट्टी, पीली मिट्टी, लाल मिट्टी, सिलिका परत आदि का उपयोग होता है।
रंगों में आई विविधता
कारोबारियों के अनुसार पहले मात्र हरा और लाल रंग के गुलाल का उपयोग होता था। धीरे-धीरे इनके रंगों में विविधता भी आई है। अब गुलाबी, हरा, पीला, लाल, बैगनी, नारंगी, मैजेंटा कलर के गुलाल भी फैक्ट्रियों में तैयार किए जाते हैं।
पूरे साल होती है मांग
गुलाल का उपयोग धीरे-धीरे धार्मिक आयोजनों में भी बढ़ता जा रहा है। पहले सिर्फ होली के लिए ही गुलाल बिकता था, लेकिन अब दुर्गा महोत्सव, गणेश महोत्सव समेत विभिन्न धार्मिक आयोजनों में उड़ाने के लिए गुलाल खरीदा जाता है।
ये बरतें सावधानियां
- चेहरे पर मास्क लगाएं
- गीले की बजाय सूखे रंगों से होली खेलें
- शरीर पर तेल लगाकर होली खेलें
- आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मा पहनें
- कोई समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
होली के लिए दिसंबर से ही गुलाल बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लेकिन नोटबंदी के कारण बाजार मंदा था तो व्यापारियों ने आर्डर नहीं दिए। अब बाजार सामान्य होने और चुनाव होने के कारण खपत बढ़ गई है। अब आर्डर आ रहे हैं लेकिन पूरे नहीं कर पा रहे हैं। इस बार पिछले साल के मुकाबले कम ही गुलाल बनाया है।
राजा गहोई, मालिक, गुलाल फैक्टरी
होली खेलते समय शरीर की विशेष सुरक्षा रखने की जरूरत है। पानी वाले रंगों का उपयोग करने से शरीर पर खुजली, दाने, जलन की समस्या हो सकती है। आंखों में रंग या गुलाल जाने से पुतली में इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है। गुलाल से होली खेलने से नाक के माध्यम से फेफड़ों तक धूल के कण जाने की संभावना रहती है। इससे श्वांस के रोगियों को समस्या होती है।
डा. प्रतीक शिवहरे, असिस्टेंट प्रोफेसर, चर्म रोग विभाग
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पिछले कुछ सालों से सूखे रंगों की होली का चलने बढ़ा है। इस वजह से गुलाल की बिक्री बहुत बढ़ गई है। कम हानिकारक होने के कारण गुलाल का उपयोग भी रंगों की अपेक्षा ज्यादा होता है। बुंदेलखंड में गुलाल बनाने की एकमात्र फैक्ट्री शहर में हैं।
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यहां बनने वाले गुलाल में से करीब सौ टन शहर के दुकानदार खरीदते हैं। इस बार शहर के व्यापारियों ने डेढ़ सौ टन गुलाल के लिए आर्डर दिया है। इस फैक्टरी से गुलाल जिले के अन्य स्थानों के अलावा यूपी, एमपी, बिहार समेत अन्य राज्यों में भी जाता है। इसके अलावा शहर में हाथरस में बना गुलाल भी आता है। बाहर से गुलाल मंगाने पर लागत अधिक आती है, इस कारण व्यापारी यहीं पर बने गुलाल को खरीदते हैं। बुंदेलखंड में खनिज की पर्याप्त उपलब्धता होने के कारण गुलाल बनाने का कच्चा माल आसानी से मिल जाता है।
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ये है कीमत
फैक्ट्री में इसके निर्माण की लागत पांच रुपये किलो आती है। इसके बाद इसे दस-दस किलो के पैकेट मेें बंद किया जाता है और छह रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से दुकानदारों तक पहुंचाया जाता है। दुकानदार गुलाल की मांग के अनुसार दस से पचास रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं।
ऐसे बनता है
गुलाल बनाने के लिए विभिन्न मिट्टियों और पत्थरों के चूर्ण का उपयोग होता है। सबसे पहले पत्थरों को रंग के अनुसार छटनी की जाती है। इसके बाद पीसकर इनका चूर्ण बनाया जाता है। रंग के लिए इसमें प्राकृतिक रंगों को मिलाया जाता है। एक टन चूर्ण में सिर्फ एक किलो रंग ही मिलाया जाता है। खुशबू के लिए इत्र का उपयोग भी किया जाता है। गुलाल बनाने के लिए काली मिट्टी, पीली मिट्टी, लाल मिट्टी, सिलिका परत आदि का उपयोग होता है।
रंगों में आई विविधता
कारोबारियों के अनुसार पहले मात्र हरा और लाल रंग के गुलाल का उपयोग होता था। धीरे-धीरे इनके रंगों में विविधता भी आई है। अब गुलाबी, हरा, पीला, लाल, बैगनी, नारंगी, मैजेंटा कलर के गुलाल भी फैक्ट्रियों में तैयार किए जाते हैं।
पूरे साल होती है मांग
गुलाल का उपयोग धीरे-धीरे धार्मिक आयोजनों में भी बढ़ता जा रहा है। पहले सिर्फ होली के लिए ही गुलाल बिकता था, लेकिन अब दुर्गा महोत्सव, गणेश महोत्सव समेत विभिन्न धार्मिक आयोजनों में उड़ाने के लिए गुलाल खरीदा जाता है।
ये बरतें सावधानियां
- चेहरे पर मास्क लगाएं
- गीले की बजाय सूखे रंगों से होली खेलें
- शरीर पर तेल लगाकर होली खेलें
- आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मा पहनें
- कोई समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
होली के लिए दिसंबर से ही गुलाल बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लेकिन नोटबंदी के कारण बाजार मंदा था तो व्यापारियों ने आर्डर नहीं दिए। अब बाजार सामान्य होने और चुनाव होने के कारण खपत बढ़ गई है। अब आर्डर आ रहे हैं लेकिन पूरे नहीं कर पा रहे हैं। इस बार पिछले साल के मुकाबले कम ही गुलाल बनाया है।
राजा गहोई, मालिक, गुलाल फैक्टरी
होली खेलते समय शरीर की विशेष सुरक्षा रखने की जरूरत है। पानी वाले रंगों का उपयोग करने से शरीर पर खुजली, दाने, जलन की समस्या हो सकती है। आंखों में रंग या गुलाल जाने से पुतली में इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है। गुलाल से होली खेलने से नाक के माध्यम से फेफड़ों तक धूल के कण जाने की संभावना रहती है। इससे श्वांस के रोगियों को समस्या होती है।
डा. प्रतीक शिवहरे, असिस्टेंट प्रोफेसर, चर्म रोग विभाग