{"_id":"5fac3c778ebc3e9bf52fb420","slug":"five-days-diwali-start-today-jhansi-news-jhs1809053116","type":"story","status":"publish","title_hn":"पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज आज से","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज आज से
विज्ञापन
दीपावली के लिए सीपरी बाजार में सजी खील बतासों की दुकानों पर खरीदारी शुरु हो गई है। अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
झांसी। महानगर में पंच दिवसीय दीपोत्सव पर्व का बृहस्पतिवार से शुभारंभ हो जाएगा। धनतेरस पर्व की तिथि दो दिन रहेगी। ऐसे में धनतेरस की खरीदारी बृहस्पति और शुक्रवार को जमकर होगी। पर्व पर भगवान धनवंतरी, कु बेर की पूजा की जाएगी और यम को दीप दान किया जाएगा। वहीं, दीपोत्सव को लेकर महानगर के बाजार भी सज गए हैं।
सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का बड़ा महत्व है। यह धनतेरस से भाई दोज तक रहता है। हर घर में दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा अर्चना की जाती है। ज्योतिषविद शांतनू पांडेय के अनुसार धनतेरस का पर्व उदया तिथि के कारण 13 नवंबर को मनाया जाएगा। हालांकि पर्व की तेरस की तिथि 12 नवंबर को शाम 4:15 बजे से लग जाएगी। ऐसे में कई लोग इस दिन भी धनतेरस की खरीदारी कर सकते है। जो शुभ रहेगा। धनतेरस पर ज्वैलरी, बर्तन सहित अन्य गृह उपयोगी वस्तुओं की खरीददारी को शुभ शगुन माना जाता है। इधर त्योहार को लेकर महानगर के बाजार बिजली की रंग बिरंगी झालरों और पंडालों से सजा दिए गए है।
झांसी। बुंदेलखंड में दीपावली के त्योहार को लेकर कई लोक मान्यताएं - परंपराएं प्रचलित है। इन्हें आज भी पूरे उत्साह से अधिकांश परिवार निभाते है। खासकर ग्रामीण इलाकों में। जो जनमानस को कृषि एवं गाय के संवर्धन के लिए प्रेरित करती है। दीपावली के दूसरे दिन परमा पर आकर्षक दीवारी नृत्य आज भी लोगों को आकर्षित करता है।
विज्ञापन
सुराती बनाकर पूजी जाती है मां लक्ष्मी
बुंदेलखंड में दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की प्राचीन परंपरा आज भी कायम है। बुंदेली लोक विद मधु श्रीवास्तव के अनुसार सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती है। जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति तैयार होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, सात घड़ों के चित्र भी बनाए जाते है। कई घरों में हाथ से बने लक्ष्मी गणेश के चित्रों जिसे पना कहा जाता है, की भी पूजा की जाती है।
लोहे को दिया जाता है सम्मान
दीपावली पर गोधूलि बेला में घर के मुख्य दरवाजे पर लोहे की कील ठुकवाने की परंपरा कभी बहुत प्रचलित रही है। मान्यता है, कि इससे साल भर बुरी बलाएं घर में प्रवेश नहीं कर पाती है। एक मान्यता है कि कील ठुकवाने से दीपावली पर लोहे का सम्मान प्राप्त होता है। लोहे से ही कृषि यंत्रों का निर्माण होता है। दीपावली के बाद रबी की फसल की बुबाई में यह यंत्र काम आते है।
भाग दरिद्रा आए लक्ष्मी....
बुंदेलखंड में लोक विश्वास है, कि लक्ष्मी और दरिद्रा दो बहनें है। जो एक साथ दीपावली पर विचरण करती है। जिस घर में स्वच्छता और प्रकाश होता है। वहां लक्ष्मी जी प्रवेश करती है। जहां गंदगी और अंधकार रहता है। वहां दरिद्रा स्थान बनाती है। इसी भावना से बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं सूप को लकड़ी की डंडी से बजाकर निकल दरिद्रा आए लक्ष्मी, भाग दरिद्रा आए लक्ष्मी कहती है।
विज्ञापन
सनातन धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव का बड़ा महत्व है। यह धनतेरस से भाई दोज तक रहता है। हर घर में दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा अर्चना की जाती है। ज्योतिषविद शांतनू पांडेय के अनुसार धनतेरस का पर्व उदया तिथि के कारण 13 नवंबर को मनाया जाएगा। हालांकि पर्व की तेरस की तिथि 12 नवंबर को शाम 4:15 बजे से लग जाएगी। ऐसे में कई लोग इस दिन भी धनतेरस की खरीदारी कर सकते है। जो शुभ रहेगा। धनतेरस पर ज्वैलरी, बर्तन सहित अन्य गृह उपयोगी वस्तुओं की खरीददारी को शुभ शगुन माना जाता है। इधर त्योहार को लेकर महानगर के बाजार बिजली की रंग बिरंगी झालरों और पंडालों से सजा दिए गए है।
विज्ञापन
झांसी। बुंदेलखंड में दीपावली के त्योहार को लेकर कई लोक मान्यताएं - परंपराएं प्रचलित है। इन्हें आज भी पूरे उत्साह से अधिकांश परिवार निभाते है। खासकर ग्रामीण इलाकों में। जो जनमानस को कृषि एवं गाय के संवर्धन के लिए प्रेरित करती है। दीपावली के दूसरे दिन परमा पर आकर्षक दीवारी नृत्य आज भी लोगों को आकर्षित करता है।
विज्ञापन
सुराती बनाकर पूजी जाती है मां लक्ष्मी
बुंदेलखंड में दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की प्राचीन परंपरा आज भी कायम है। बुंदेली लोक विद मधु श्रीवास्तव के अनुसार सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती है। जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति तैयार होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, सात घड़ों के चित्र भी बनाए जाते है। कई घरों में हाथ से बने लक्ष्मी गणेश के चित्रों जिसे पना कहा जाता है, की भी पूजा की जाती है।
लोहे को दिया जाता है सम्मान
दीपावली पर गोधूलि बेला में घर के मुख्य दरवाजे पर लोहे की कील ठुकवाने की परंपरा कभी बहुत प्रचलित रही है। मान्यता है, कि इससे साल भर बुरी बलाएं घर में प्रवेश नहीं कर पाती है। एक मान्यता है कि कील ठुकवाने से दीपावली पर लोहे का सम्मान प्राप्त होता है। लोहे से ही कृषि यंत्रों का निर्माण होता है। दीपावली के बाद रबी की फसल की बुबाई में यह यंत्र काम आते है।
भाग दरिद्रा आए लक्ष्मी....
बुंदेलखंड में लोक विश्वास है, कि लक्ष्मी और दरिद्रा दो बहनें है। जो एक साथ दीपावली पर विचरण करती है। जिस घर में स्वच्छता और प्रकाश होता है। वहां लक्ष्मी जी प्रवेश करती है। जहां गंदगी और अंधकार रहता है। वहां दरिद्रा स्थान बनाती है। इसी भावना से बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं सूप को लकड़ी की डंडी से बजाकर निकल दरिद्रा आए लक्ष्मी, भाग दरिद्रा आए लक्ष्मी कहती है।