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नदी-नहरें सूखीं, बारिश कम होने से फसल के जमाव और बढ़त पर पड़ा असर
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अषाढ़, सावन बीतने के बाद भी नदियों में बेहद कम पानी है।
- फोटो : DEHAT
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प्रशांत शर्मा
झांसी। बुंदेलखंड में सूखे के डर के बीच छह से 22 जुलाई तक दो सप्ताह बारिश थमी रहने के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। पर्याप्त पानी न मिलने से कई इलाकों में फसल का जमाव नहीं हो पाया है। जहां कुछ हद तक पानी गिरा है, वहां जमाव तो हो गया लेकिन फसल की बढ़त पर असर दिखाई दिया है। अब सारी निगाहें अगस्त के बचे हुए दिनों पर टिकी हुई हैं। आगे भी अच्छी वर्षा नहीं हुई तो फसल खराब हो सकती है।
जून और जुलाई के महीने में बुंदेलखंड में औसत से पचास फीसदी कम वर्षा हुई है। सामान्य बारिश नहीं होने से झांसी की पहूज व बेतवा, महोबा की धसान और बांदा की केन नदी का जलस्तर गर्मियों जैसा ही है। सावन निकलने के बाद भादौं शुरू हो चुुका है। जबकि, इस समय तक तो पिछले वर्षों तक नदियां लबालब हो जाती थीं। नदियों से नहरों में पानी जाता है। फिर इनके जरिए खेतों में सिंचाई होती है। नहरें भी सूखी होने से फसलों की सिंचाई पर भी असर पड़ा है।
इन दिनों उर्द, मूंग, तिल, मूंगफली, धान की बुवाई हो चुकी है। इनमें से सबसे ज्यादा पानी धान को चाहिए होता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक एक किलो धान के लिए तीन हजार लीटर से ज्यादा पानी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में कम बारिश से इस फसल पर सीधा असर पड़ा है। वहीं, उर्द, मूंग, मूंगफली को हर सप्ताह एक बार तो पानी की आवश्यकता पड़ती ही है। ऐसे में बुंदेलखंड में कहीं पानी न गिरने से फसलों का जमाव नहीं हो पाया, तो कहीं कुछ हद तक पानी गिरा भी तो फसल की बढ़त नहीं हो पाई। चूंकि, बुंदेलखंड में 15 सितंबर तक बारिश का सीजन रहता है। ऐसे में आगे के दिनों में भी अच्छी बारिश नहीं हुई तो फसलों को काफी नुकसान पहुंच सकता है।
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लाल मिट्टी से नहीं रुकता जल
झांसी समेत बुंदेलखंड में ज्यादातर लाल मिट्टी है। विशेषज्ञों के मुताबिक लाल मिट्टी में जल धारण की क्षमता कम होती है। ऐसे में रुकने के बजाए पानी निकल जाता है।
छह जुलाई से 22 जुलाई तक बुंदेलखंड के कई जगहों पर पानी नहीं गिरने से फसलों जमाव नहीं हो पाया है। जहां कुछ पानी गिरा भी तो वहां फसल की वृद्धि पूरी तरह नहीं हो पाई। अब सितंबर के प्रथम सप्ताह तक फसलों को अच्छी बरसात की जरूरत है। पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश के चलते उम्मीद भी है कि फसलों को जरूरत के अनुसार पानी मिल जाएगा।
- डॉ. मुकेश चंद्र, कृषि वैज्ञानिक, भरारी मौसम विज्ञान केंद्र, झांसी।
जितनी बरसात हुई है, उससे तिल को तो कोई समस्या नहीं हुई है। वहीं, जिन इलाकों में मूंगफली की बुवाई हुए 40 से 45 दिन हो गए हैं, वहां पानी की कमी होगी तो दाने छोटे रह जाएंगे। बुंदेलखंड में बारिश को लेकर अनिश्चितता रहती है। ऐसे में किसानों को मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा आदि की तरफ भी ध्यान देना होगा। यह कम पानी में हो जाती हैं। क्षेत्र के लिए उपयुक्त भी हैं।
- डॉ. अरविंद कुमार, कुलपति, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी।
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झांसी। बुंदेलखंड में सूखे के डर के बीच छह से 22 जुलाई तक दो सप्ताह बारिश थमी रहने के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। पर्याप्त पानी न मिलने से कई इलाकों में फसल का जमाव नहीं हो पाया है। जहां कुछ हद तक पानी गिरा है, वहां जमाव तो हो गया लेकिन फसल की बढ़त पर असर दिखाई दिया है। अब सारी निगाहें अगस्त के बचे हुए दिनों पर टिकी हुई हैं। आगे भी अच्छी वर्षा नहीं हुई तो फसल खराब हो सकती है।
जून और जुलाई के महीने में बुंदेलखंड में औसत से पचास फीसदी कम वर्षा हुई है। सामान्य बारिश नहीं होने से झांसी की पहूज व बेतवा, महोबा की धसान और बांदा की केन नदी का जलस्तर गर्मियों जैसा ही है। सावन निकलने के बाद भादौं शुरू हो चुुका है। जबकि, इस समय तक तो पिछले वर्षों तक नदियां लबालब हो जाती थीं। नदियों से नहरों में पानी जाता है। फिर इनके जरिए खेतों में सिंचाई होती है। नहरें भी सूखी होने से फसलों की सिंचाई पर भी असर पड़ा है।
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इन दिनों उर्द, मूंग, तिल, मूंगफली, धान की बुवाई हो चुकी है। इनमें से सबसे ज्यादा पानी धान को चाहिए होता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक एक किलो धान के लिए तीन हजार लीटर से ज्यादा पानी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में कम बारिश से इस फसल पर सीधा असर पड़ा है। वहीं, उर्द, मूंग, मूंगफली को हर सप्ताह एक बार तो पानी की आवश्यकता पड़ती ही है। ऐसे में बुंदेलखंड में कहीं पानी न गिरने से फसलों का जमाव नहीं हो पाया, तो कहीं कुछ हद तक पानी गिरा भी तो फसल की बढ़त नहीं हो पाई। चूंकि, बुंदेलखंड में 15 सितंबर तक बारिश का सीजन रहता है। ऐसे में आगे के दिनों में भी अच्छी बारिश नहीं हुई तो फसलों को काफी नुकसान पहुंच सकता है।
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लाल मिट्टी से नहीं रुकता जल
झांसी समेत बुंदेलखंड में ज्यादातर लाल मिट्टी है। विशेषज्ञों के मुताबिक लाल मिट्टी में जल धारण की क्षमता कम होती है। ऐसे में रुकने के बजाए पानी निकल जाता है।
छह जुलाई से 22 जुलाई तक बुंदेलखंड के कई जगहों पर पानी नहीं गिरने से फसलों जमाव नहीं हो पाया है। जहां कुछ पानी गिरा भी तो वहां फसल की वृद्धि पूरी तरह नहीं हो पाई। अब सितंबर के प्रथम सप्ताह तक फसलों को अच्छी बरसात की जरूरत है। पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश के चलते उम्मीद भी है कि फसलों को जरूरत के अनुसार पानी मिल जाएगा।
- डॉ. मुकेश चंद्र, कृषि वैज्ञानिक, भरारी मौसम विज्ञान केंद्र, झांसी।
जितनी बरसात हुई है, उससे तिल को तो कोई समस्या नहीं हुई है। वहीं, जिन इलाकों में मूंगफली की बुवाई हुए 40 से 45 दिन हो गए हैं, वहां पानी की कमी होगी तो दाने छोटे रह जाएंगे। बुंदेलखंड में बारिश को लेकर अनिश्चितता रहती है। ऐसे में किसानों को मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा आदि की तरफ भी ध्यान देना होगा। यह कम पानी में हो जाती हैं। क्षेत्र के लिए उपयुक्त भी हैं।
- डॉ. अरविंद कुमार, कुलपति, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी।