{"_id":"6129442d8ebc3e744630cc34","slug":"do-not-burn-crop-residue-make-it-a-source-of-income-jhansi-news-jhs202918661","type":"story","status":"publish","title_hn":"फसल अवशेष जलाएं नहीं, आमदनी का जरिया बनाएं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फसल अवशेष जलाएं नहीं, आमदनी का जरिया बनाएं
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
झांसी। मानव श्रम की कमी, कटाई के नवीनतम कृषि यंत्रों और मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण फसल अवशेष जलाने की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। अवशेष जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होता है और खेतों में रहने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यदि किसान फसल के अवशेषाें का उपयोग पशु चारा और कंपोस्ट खाद बनाने में करेंगे तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होगा।
धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलों के अवशेष का बड़ा हिस्सा खेत में ही जला दिया जाता है। यह बड़ी समस्या बन गया है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा मिलता है। खेत की मिट्टी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस कारण मिट्टी में उपलब्ध नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इससे खेतों में फसल की उत्पादकता कम हो जाती है। उत्पादकता बढ़ाने के चक्कर में किसानों की खेती करने में लागत बढ़ जाती है।
फसलों के अवशेषों को जलाना और चारे की कम उपलब्धता दोनों आपस में एक - दूसरे से जुड़े हैं। चारा की कमी के कारण इसके दामों में बढ़ोतरी हो रही है। किसानों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की कमी, कटाई के लिए मशीनरी का प्रयोग और भूसे के लिए भंडारण की सुविधा की कमी समेत अन्य कारण भी हैं, जिससे किसान फसलों के अवशेषों को जला रहे हैं। अवशेष का उपयोग पशुओं के लिए चारे के रूप में कर सकते हैं। परंपरागत रूप से खाद तैयार कर सकते हैं। उच्च गुणवत्ता वाली ईंधन गैस भी बना सकते हैं। गोशालाओं को पराली या फसलों के अवशेष दान करके बदले में गोबर की खाद ले सकते हैं, जिससे गोशालाओं को चारा उपलब्ध होगा और पशुओं को छुट्टा छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी।
विज्ञापन
फसलों के अवशेषों को जलाएं नहीं बल्कि उसका उपयोग चारा अथवा खाद बनाने में कर सकते हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होगा और खेत की उर्वरा शक्ति भी कमजोर नहीं होगी।
- के के सिंह, उप कृषि निदेशक
विज्ञापन
धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलों के अवशेष का बड़ा हिस्सा खेत में ही जला दिया जाता है। यह बड़ी समस्या बन गया है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा मिलता है। खेत की मिट्टी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस कारण मिट्टी में उपलब्ध नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इससे खेतों में फसल की उत्पादकता कम हो जाती है। उत्पादकता बढ़ाने के चक्कर में किसानों की खेती करने में लागत बढ़ जाती है।
विज्ञापन
फसलों के अवशेषों को जलाना और चारे की कम उपलब्धता दोनों आपस में एक - दूसरे से जुड़े हैं। चारा की कमी के कारण इसके दामों में बढ़ोतरी हो रही है। किसानों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की कमी, कटाई के लिए मशीनरी का प्रयोग और भूसे के लिए भंडारण की सुविधा की कमी समेत अन्य कारण भी हैं, जिससे किसान फसलों के अवशेषों को जला रहे हैं। अवशेष का उपयोग पशुओं के लिए चारे के रूप में कर सकते हैं। परंपरागत रूप से खाद तैयार कर सकते हैं। उच्च गुणवत्ता वाली ईंधन गैस भी बना सकते हैं। गोशालाओं को पराली या फसलों के अवशेष दान करके बदले में गोबर की खाद ले सकते हैं, जिससे गोशालाओं को चारा उपलब्ध होगा और पशुओं को छुट्टा छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी।
विज्ञापन
फसलों के अवशेषों को जलाएं नहीं बल्कि उसका उपयोग चारा अथवा खाद बनाने में कर सकते हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होगा और खेत की उर्वरा शक्ति भी कमजोर नहीं होगी।
- के के सिंह, उप कृषि निदेशक