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ध्यानचंद के करिश्माई खेल ने भारत को ओलंपिक में दिलाया था पहला स्वर्ण पदक
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Dhyanchand's charismatic game won India its first gold medal in Olympics
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झांसी। गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिंदुस्तान के अवाम का पहली बार पूरी दुनिया में सिर फक्र से ऊंचा मेजर ध्यानचंद ने किया था। जी हां, मौका था 1928 के ओलंपिक का, जिसमें पहली बार भारतीय हॉकी टीम को हिस्सा लेने का मौका मिला था। ध्यानचंद ने करिश्माई खेल का प्रदर्शन करते हुए भारतीय हॉकी टीम को स्वर्ण पदक दिलाया था। इस स्वर्णिम इतिहास को भारत ने 1932 और 1936 के ओलंपिक में भी दोहराया। टोक्यो में चल रहे ओलंपिक में शनिवार को भारत के खाते में एक रजत पदक आया है। इस खुशी ने झांसी वालों के जेहन में एक बार फिर से मेजर ध्यानचंद की यादें ताजा कर दी हैं।
ओलंपिक खेलों से झांसी का गहरा नाता रहा है। इस वीर धरा के सपूत मेजर ध्यानचंद ने भारत को लगातार तीन ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलाए थे। इसका आगाज 13 मई 1928 को हुआ था। इस दिन भारतीय हॉकी टीम ने अपना पहला ओलंपिक मैच खेला था। पहले मैच में भारत ने आस्ट्रेलिया को 6-0 के अंतर से हराया था। इसमें चार गोल मेजर ध्यानचंद के थे। इसके बाद बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0 और स्विजरलैंड को 6-0 से हराकर भारत ने फाइनल में प्रवेश किया था। खिताबी मुकाबले में हालैंड को 3-0 से करारी शिकस्त देकर भारतीय हॉकी टीम ने अपना पहला स्वर्ण पदक हासिल किया था।
इसके बाद 1932 में लॉज एंजल्स में खेले गए ओलंपिक के लिए चुनी गई टीम में ध्यानचंद के साथ उनके भाई रूप सिंह का भी चयन हुआ था। दोनों भाइयों ने मिलकर गोलों का तूफान खड़ा कर दिया था। ओलंपिक के पहले मैच में जापान को 11-0 से हराया था, इसमें ध्यानचंद ने चार और रूप सिंह ने तीन गोल दागे थे। 11 अगस्त को इस प्रतियोगिता का खिताबी मैच हुआ था, जिसमें भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। 10 गोल ध्यानचंद और आठ रूप सिंह की ओर से दागे गए थे।
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1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान मेजर ध्यानचंद थे। इस प्रतियोगिता के मैचों में भारत ने हंगरी को 4-0, अमेरिका को 7-0, जापान को 10-0 से परास्त किया था। फाइनल मैच में भारत ने उस दौर की दुनिया की सशक्त टीम जर्मनी को 8-1 से हराकर विश्व पटल भारत का परचम फहराया था।
मेजर ध्यानचंद के इसी करिश्माई खेल की बदौलत उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाने लगा था। जबकि, झांसी के लोग उन्हें प्यार से ‘दद्दा’ कहकर पुकारते थे।
ऊबड़खाबड़ जमीन से तय किया ओलंपिक का सफर
झांसी। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके जन्म के कुछ समय बाद ही उनके पिता रामेश्वर सिंह झांसी में आकर बस गए थे। ध्यानचंद ने 6-7 वर्ष की आयु में ही हॉकी ओर आकर्षित हो गए थे। छड़ी और गेंद के सहारे वे ऊबड़खाबड़ जमीन पर अभ्यास किया करते थे। हॉकी से उनके लगाव को देखते हुए पिता ने उन्हें खेलने की प्रेरणा दी। 1922 में से बतौर सिपाही की हैसियत से सेना में भर्ती हो गए थे। बाद उनके खेल ने उन्हें मेजर के पद तक पहुंचाया। तीन दिसंबर 1979 को उन्होंने एम्स में अंतिम सांसें ली थीं।
भारत रत्न न मिलने का खेल प्रेमियों को है मलाल
झांसी। भारत सरकार न जब पहली बार खिलाड़ियों के लिए भारत रत्न का दरवाजा खोला था तो तब माना जा रहा था कि देश का ये सर्वोच्च सम्मान मेजर ध्यानचंद को दिया जाएगा। लेकिन, ये हो नहीं पाया। इसके के लिए देश भर के सांसदों व खिलाड़ियों ने बड़े पैमाने पर मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाया। खेल प्रेमियों को आज भी इसका मलाल है। हालांकि, 1956 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण का सम्मान दिया था। बाद में उन पर डाक टिकट भी जारी किया गया था। 1994 में सरकार ने उनके जन्मदिवस 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया था।
दद्दा की विरासत को झांसी ने खूब सहेजा
झांसी। मेजर ध्यानचंद की हॉकी की विरासत को झांसी ने खूब सहेजा। उनके पुत्र अशोक ध्यानचंद ने भी भारतीय हॉकी टीम के साथ ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था। इसके बाद तुषार खंडकर ने 2012 का लंदन ओलंपिक खेला था। जबकि, 2016 में तुषार भारतीय टीम के असिस्टेंट कोच बनकर रियो ओलंपिक में शामिल हुए थे। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हॉकी का नाम अब्दुल अजीज, सुबोध खंडकर, नेहा सिंह, जमशेद ने भी खूब चमकाया था। राष्ट्रीय स्तर पर अपने हॉकी के खेल की चमक बिखेरने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आज भी ध्यानचंद स्टेडियम हो या एलवीएम ग्राउंड, दर्जनों की संख्या में नवोदित खिलाड़ी हॉकी का अभ्यास करते नजर आते हैं।
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ओलंपिक खेलों से झांसी का गहरा नाता रहा है। इस वीर धरा के सपूत मेजर ध्यानचंद ने भारत को लगातार तीन ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलाए थे। इसका आगाज 13 मई 1928 को हुआ था। इस दिन भारतीय हॉकी टीम ने अपना पहला ओलंपिक मैच खेला था। पहले मैच में भारत ने आस्ट्रेलिया को 6-0 के अंतर से हराया था। इसमें चार गोल मेजर ध्यानचंद के थे। इसके बाद बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0 और स्विजरलैंड को 6-0 से हराकर भारत ने फाइनल में प्रवेश किया था। खिताबी मुकाबले में हालैंड को 3-0 से करारी शिकस्त देकर भारतीय हॉकी टीम ने अपना पहला स्वर्ण पदक हासिल किया था।
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इसके बाद 1932 में लॉज एंजल्स में खेले गए ओलंपिक के लिए चुनी गई टीम में ध्यानचंद के साथ उनके भाई रूप सिंह का भी चयन हुआ था। दोनों भाइयों ने मिलकर गोलों का तूफान खड़ा कर दिया था। ओलंपिक के पहले मैच में जापान को 11-0 से हराया था, इसमें ध्यानचंद ने चार और रूप सिंह ने तीन गोल दागे थे। 11 अगस्त को इस प्रतियोगिता का खिताबी मैच हुआ था, जिसमें भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। 10 गोल ध्यानचंद और आठ रूप सिंह की ओर से दागे गए थे।
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1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान मेजर ध्यानचंद थे। इस प्रतियोगिता के मैचों में भारत ने हंगरी को 4-0, अमेरिका को 7-0, जापान को 10-0 से परास्त किया था। फाइनल मैच में भारत ने उस दौर की दुनिया की सशक्त टीम जर्मनी को 8-1 से हराकर विश्व पटल भारत का परचम फहराया था।
मेजर ध्यानचंद के इसी करिश्माई खेल की बदौलत उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाने लगा था। जबकि, झांसी के लोग उन्हें प्यार से ‘दद्दा’ कहकर पुकारते थे।
ऊबड़खाबड़ जमीन से तय किया ओलंपिक का सफर
झांसी। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके जन्म के कुछ समय बाद ही उनके पिता रामेश्वर सिंह झांसी में आकर बस गए थे। ध्यानचंद ने 6-7 वर्ष की आयु में ही हॉकी ओर आकर्षित हो गए थे। छड़ी और गेंद के सहारे वे ऊबड़खाबड़ जमीन पर अभ्यास किया करते थे। हॉकी से उनके लगाव को देखते हुए पिता ने उन्हें खेलने की प्रेरणा दी। 1922 में से बतौर सिपाही की हैसियत से सेना में भर्ती हो गए थे। बाद उनके खेल ने उन्हें मेजर के पद तक पहुंचाया। तीन दिसंबर 1979 को उन्होंने एम्स में अंतिम सांसें ली थीं।
भारत रत्न न मिलने का खेल प्रेमियों को है मलाल
झांसी। भारत सरकार न जब पहली बार खिलाड़ियों के लिए भारत रत्न का दरवाजा खोला था तो तब माना जा रहा था कि देश का ये सर्वोच्च सम्मान मेजर ध्यानचंद को दिया जाएगा। लेकिन, ये हो नहीं पाया। इसके के लिए देश भर के सांसदों व खिलाड़ियों ने बड़े पैमाने पर मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाया। खेल प्रेमियों को आज भी इसका मलाल है। हालांकि, 1956 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण का सम्मान दिया था। बाद में उन पर डाक टिकट भी जारी किया गया था। 1994 में सरकार ने उनके जन्मदिवस 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया था।
दद्दा की विरासत को झांसी ने खूब सहेजा
झांसी। मेजर ध्यानचंद की हॉकी की विरासत को झांसी ने खूब सहेजा। उनके पुत्र अशोक ध्यानचंद ने भी भारतीय हॉकी टीम के साथ ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था। इसके बाद तुषार खंडकर ने 2012 का लंदन ओलंपिक खेला था। जबकि, 2016 में तुषार भारतीय टीम के असिस्टेंट कोच बनकर रियो ओलंपिक में शामिल हुए थे। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हॉकी का नाम अब्दुल अजीज, सुबोध खंडकर, नेहा सिंह, जमशेद ने भी खूब चमकाया था। राष्ट्रीय स्तर पर अपने हॉकी के खेल की चमक बिखेरने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आज भी ध्यानचंद स्टेडियम हो या एलवीएम ग्राउंड, दर्जनों की संख्या में नवोदित खिलाड़ी हॉकी का अभ्यास करते नजर आते हैं।