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कोरोना काल में पोषाहार से दूर हुआ देशी घी
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कोरोना काल में पोषाहार से दूर हुआ देसी घी
गर्भवती महिलाओं एवं कुपोषित बच्चों को 450 ग्राम दिया जा रहा था घी, सरकार ने खत्म कर दिया बजट
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। कुपोषित बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं को दिए जाने वाले पोषाहार से देसी घी खत्म कर दिया गया है। नए बजट में इसके लिए प्रावधान नहीं किया गया है। कोरोना काल में जब मजबूत इम्यूनिटी की जरूर है, ऐसे समय में गर्भवती महिलाओं एवं कुपोषित बच्चों को घी से वंचित होना पड़ेगा।
कोविड-19 ने गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं किशोरियों के बीच वितरित होने वाले पोषाहार पर बुरा असर डाला। पिछले वर्ष लॉकडॉउन के दौरान करीब तीन महीने पोषाहार वितरण पूरी तरह ठप रहा। कुछ माह बाद जब व्यवस्था पटरी पर लौटी तब लाभार्थियों को सिर्फ गेहूं एवं चावल दिए गए। पिछले वर्ष दिसंबर माह में इनके बीच दूध एवं देसी घी वितरित किए जाने की योजना बनी। इसके तहत प्रत्येक लाभार्थी को करीब 450 ग्राम देसी घी एवं 400-750 ग्राम स्किम्ड दूध दिया जाना था।
लेकिन, यह व्यवस्था सिर्फ तीन माह ही चल सकी। अब नए वित्तीय वर्ष में सरकार ने इस नई व्यवस्था के लिए बजट देने से इंकार कर दिया। इसके चलते घी का वितरण बंद कर दिया गया जबकि समय की जरूरत को देखते हुए गर्भवती महिलाओं में इसकी सबसे अधिक जरूरत बताई जा रही। इसी तरह स्किम्ड मिल्क भी नहीं दिया जा रहा है। अब पुरानी व्यवस्था के मुताबिक ही इन लाभार्थियों के बीच पोषाहार के नाम पर गेहूं एवं चावल दिया जा रहा है।
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बता दें, सरकार ने पोषाहार वितरण में पिछले वर्ष कई बदलाव किए। सबसे पहले पंजीरी कंपनियों के बजाए यह काम स्वयं सहायता समूहों को दे दिया। पंजीरी कंपनियां गेहूं, चावल, दाल को दलिया में बदलकर लाभार्थियों तक पहुंचाने का काम करती थीं लेकिन, अभी स्वयं सहायता समूहों के पास साधन न होने से अनाज खड़े रूप में ही लाभार्थियों तक पहुंचाया जा रहा। वहीं, उपायुक्त स्वरोजगार डा.एनएन मिश्र का कहना है उपलब्ध कराए गए बजट के मुताबिक ही स्वयं सहायता समूह पोषाहार वितरित कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों को सक्षम बनाने की कोशिश की जा रही, जिससे पोषाहार की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सके। जनपद में करीब चालीस हजार लाभार्थियों के बीच पोषाहार वितरण होता है।
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गर्भवती महिलाओं एवं कुपोषित बच्चों को 450 ग्राम दिया जा रहा था घी, सरकार ने खत्म कर दिया बजट
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। कुपोषित बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं को दिए जाने वाले पोषाहार से देसी घी खत्म कर दिया गया है। नए बजट में इसके लिए प्रावधान नहीं किया गया है। कोरोना काल में जब मजबूत इम्यूनिटी की जरूर है, ऐसे समय में गर्भवती महिलाओं एवं कुपोषित बच्चों को घी से वंचित होना पड़ेगा।
कोविड-19 ने गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं किशोरियों के बीच वितरित होने वाले पोषाहार पर बुरा असर डाला। पिछले वर्ष लॉकडॉउन के दौरान करीब तीन महीने पोषाहार वितरण पूरी तरह ठप रहा। कुछ माह बाद जब व्यवस्था पटरी पर लौटी तब लाभार्थियों को सिर्फ गेहूं एवं चावल दिए गए। पिछले वर्ष दिसंबर माह में इनके बीच दूध एवं देसी घी वितरित किए जाने की योजना बनी। इसके तहत प्रत्येक लाभार्थी को करीब 450 ग्राम देसी घी एवं 400-750 ग्राम स्किम्ड दूध दिया जाना था।
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लेकिन, यह व्यवस्था सिर्फ तीन माह ही चल सकी। अब नए वित्तीय वर्ष में सरकार ने इस नई व्यवस्था के लिए बजट देने से इंकार कर दिया। इसके चलते घी का वितरण बंद कर दिया गया जबकि समय की जरूरत को देखते हुए गर्भवती महिलाओं में इसकी सबसे अधिक जरूरत बताई जा रही। इसी तरह स्किम्ड मिल्क भी नहीं दिया जा रहा है। अब पुरानी व्यवस्था के मुताबिक ही इन लाभार्थियों के बीच पोषाहार के नाम पर गेहूं एवं चावल दिया जा रहा है।
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बता दें, सरकार ने पोषाहार वितरण में पिछले वर्ष कई बदलाव किए। सबसे पहले पंजीरी कंपनियों के बजाए यह काम स्वयं सहायता समूहों को दे दिया। पंजीरी कंपनियां गेहूं, चावल, दाल को दलिया में बदलकर लाभार्थियों तक पहुंचाने का काम करती थीं लेकिन, अभी स्वयं सहायता समूहों के पास साधन न होने से अनाज खड़े रूप में ही लाभार्थियों तक पहुंचाया जा रहा। वहीं, उपायुक्त स्वरोजगार डा.एनएन मिश्र का कहना है उपलब्ध कराए गए बजट के मुताबिक ही स्वयं सहायता समूह पोषाहार वितरित कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों को सक्षम बनाने की कोशिश की जा रही, जिससे पोषाहार की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सके। जनपद में करीब चालीस हजार लाभार्थियों के बीच पोषाहार वितरण होता है।