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बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित हो सकता है बथुआ

Thu, 06 Jun 2019 12:56 AM IST
jhansi Published by: देवेंद्र कुमार Updated Thu, 06 Jun 2019 12:56 AM IST
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bathua farming good for bundelkhand farmer
farmer - फोटो : demo
झांसी। पहले खरपतवार समझकर उखाड़कर फेंक दिया जाने वाला बथुआ अब बुंदेलखंड के किसानों की आय बढ़ाने में वरदान साबित हो सकता है। इसकी खेती कर किसान एक सीजन में 35 से 40 हजार रुपये कमा सकते हैं। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इसकी भारतीय बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अच्छी मांग है। सबसे अच्छी बात यह है कि बुंदेलखंड के किसान भूमि को बंजर होने से बचाने के लिए इसकी खेती में केवल जैविक खाद का ही प्रयोग कर रहे हैं।
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जनपद के बंगरा, गुरसराय, बड़ागांव ब्लाक के कनौरा, टोड़ी फतेहपुर, दुगारा, पठा, नेगुआं, घुघुआ सहित कई गांवों में किसान इसकी खेती कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि वह गेहूं, चना, मटर, सरसों, मसूर आदि की खेती से बमुश्किल एक एकड़ में 20 से 25 हजार रुपये ही बचा पाते थे। अब बथुआ की खेती कर वह एक सीजन में 35 से 40 हजार रुपये तक की बचत कर लेते हैं। यह खेती जैविक पद्घति से की जा रही है। इसमें पानी की भी बहुत कम जरूरत होती है, जिससे इन क्षेत्रों में भूगर्भ जल भी पहले की अपेक्षा नहीं घट रहा है। इसकी बुआई सितंबर से लेकर मार्च तक की जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक भी इसकी बुआई की जाती है।
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बथुआ को अंग्रेजी में ऑल गुड कहा जाता है। इसका मतलब है कि सब कुछ अच्छा। इसके बीज में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के कई प्रकार के विकारों व बीमारियों को दूर करता है। साथ ही इसकी पत्तियां रक्त शोधक का काम करती हैं, गुर्दे की पथरी के उपचार के लिए व पेट संबंधी अन्य बीमारियों के लिए बथुआ की पत्तियों का रस बहुत लाभदायक होता है। बथुआ के इन्हीं महत्वपूर्ण गुणों के कारण संयुक्त राष्ट्र इसे 2013 में अंतरराष्ट्रीय (किनोवा) वर्ष के रूप में घोषित कर चुका है। किनोवा बथुआ की एक प्रजाति है। राष्ट्रीय औषधि बोर्ड के अनुसार भारत विश्व में औषधीय पौधों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है।
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ऐसे करें बुआई
सबसे पहले भूमि पर गोबर से बनी खाद डाल दें, फिर उसमें पानी लगा दें। फिर चार से पांच दिन बाद खेत की जुताई कर लें। साथ ही मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए पाटा लगा लें। फिर एकड़ में बथुआ के ढाई से तीन किलो बीज का छिड़काव कर दें।
किसानों से बातचीत

परंपरागत खेती की अपेक्षा इसमें लागत कम लगती है और एक एकड़ में 35 से 40 हजार का मुनाफा हो जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए 2017 में इसकी खेती शुरू की थी। - राजेश कुमार, पठा

रासायनिक खादों के प्रयोग से यहां की भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो गई है। बथुआ की खेती गोबर की खाद से की जा रही है, जिससे जैविक खेती को भी बढ़ावा मिल रहा है। धर्मेंद्र, किसान

दो साल से बथुआ की खेती कर रहे हैं। कम लागत के साथ रखरखाव की भी ज्यादा चिंता नहीं रहती। एक एकड़ में आठ से दस क्विंटल की पैदावार हो जाती है। गंगाराम, किसान

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत पंतजलि कृषक समृद्धि प्रोग्राम बुंदेलखंड के 14 जिलों में संचालित कर रही है। इसमें किसानों को प्र्रोत्साहित किया जा रहा है। चार हजार किसान अब तक इससे जुड़ चुके हैं। किसानों को प्रशिक्षित कर प्रमाणपत्र बांटे जा रहे हैं।  जिन किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया है पतंजलि उनकी उपज की खरीद शुरू कर देगी। पुष्पेंद्र यादव, स्टेट कोआर्डिनेटर, पतंजलि बायो रिसर्च इंस्टीट्यूट
बथुअे की मुख्य रूप से रबी की फसल के दौरान पैदावार होती है। भरपूर पोषक तत्वों के कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग है। परंपरागत खेती की अन्य फसलों की अपेक्षा इसमें कम पानी लगता है। क्षेत्र के किसान रासायनिक खादों का प्रयोग छोड़ जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं जो भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मददगार साबित होगा। भैरम सिंह, उपनिदेशक, उद्यान विभाग झांसी

बेचने के लिए बाजार
किसान आयुष मंत्रालय की वेबसाइट www.echark.in पर रजिस्ट्रेशन कर उपज का ब्योरा वेबसाइट पर डाल दें। जो कंपनियां भारत में औषधीय फसलों की खरीद करती है वह स्वत: किसानों से संपर्क कर उनकी उपज खरीद लेंगी। वर्तमान में क्षेत्र के किसान एक निजी कंपनी को अपनी उपज बेच रहे हैं।
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