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झांसी में रहकर आजाद ने जलाई थी क्रांति की मशाल

Fri, 23 Jul 2021 01:21 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 23 Jul 2021 01:21 AM IST
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Azad had lit the torch of revolution while living in Jhansi
चंद्रशेखर आजाद की खबर में .... चंद्रशेखर आजाद की तस्वीर।
झांसी। अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का बुंदेलखंड और झांसी की धरती से गहरा नाता रहा है। यहां उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन के छह साल बिताए हैं। यहीं रहकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबना बुना था। वे ओरछा के सातार में एक कुटी में नाम बदलकर रहे। इतना ही नहीं उनकी शहादत के बाद मां जगरानी देवी ने भी जीवन के अंतिम क्षण यहां बिताए और यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। आज चंद्रशेखर आजाद की 115वीं जयंती है। झांसी में उनके क्रांतिकारी जीवन के संस्मरणों पर पढ़िए रिपोर्ट.....
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कुटिया में बनाते थे क्रांति की योजनाएं
चंद्रशेखर आजाद ने अज्ञात वास बुंदेलखंड में ही रहकर काटा था। बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों में वे नाम बदलकर रहे। ओरछा स्थित सातार में वह एक कुटिया में पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से रहते थे। सातार में उनकी कुटी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गई थी। अधिकांश गुप्त योजनाएं इसी कुटी में बनती थीं। चंद्रशेखर आजाद को बुंदेलखंड का खाना खासकर यहां की कढ़ी बेहद पसंद थी। ओरछा के जंगलों में उन्होंने दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण और बच्चों को अध्यापन कराया। इसके साथ ही यहां उन्होंने अपने साथियों के साथ निशानेबाजी भी की।
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टकसाल मुहल्ले में बिताया समय
झांसी में चंद्रशेखर आजाद को क्रांतिकारी मास्टर रुद्र नारायण सिंह का साथ मिला। वे टकसाल मुहल्ले में रहते थे। इसके साथ ही सदाशिव राव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर और खनियाधाना के महाराज खलक सिंह जूदेव ने उनकी काफ ी मदद की थी। इसके अलावा नई बस्ती, गनपत खिड़की, बिलैया खिड़की और दतिया में उनका प्रवास रहा।
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मां जगरानी देवी का भी यहीं हुआ निधन
चंद्रशेखर आजाद के बलिदान के कुछ समय बाद ही उनके पिता शिवराम तिवारी की भी मौत हो गई थी। ऐसी परिस्थितियों में उनकी मां जगरानी देवी अकेली पड़ गईं। झाबुआ जिले के भाबरा गांव में वह गुमनामी में दिन बिताने लगी थीं। यहां वे लकड़ी और कंडे बेचकर जीवन बिता रही थीं। मां के बारे में जानकारी मिलने पर आजाद के सहयोगी सदाशिव राव मलकापुरकर उन्हें झांसी ले आए। चारों धाम की तीर्थ यात्रा कराई। झांसी में कई साल बिताने के बाद मां जगरानी देवी का 22 मार्च 1951 को निधन हो गया। आज भी उनकी समाधि बड़ागांव गेट स्थित मुक्तिधाम पर बनी हुई है।
भुला दिया आजाद का बलिदान
अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने देश के लिए बलिदान दे दिया। लोगों ने उनकी याद में प्रतिमा लगवाई और मीनार बनवाई, लेकिन अब यह दुर्दशा की शिकार है। मानिक चौक में लगी प्रतिमा अतिक्रमण के चपेट में है। अधिकांश लोगों को प्रतिमा नजर ही नहीं आती। ग्वालियर रोड स्थित आजाद मीनार भी लंबे समय से रंगाई पुताई के इंतजार में है। आजाद मीनार में पहुंचने के लिए सीधा रास्ता न होने से अधिकांश लोगों को इसके महत्व की जानकारी ही नहीं है। मीनार चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतिकारियों को भी समर्पित है।
संग्रहालय को दें आजाद के स्मृति चिन्ह
राजकीय संग्रहालय में वीरांगना लक्ष्मीबाई और चंद्रशेखर आजाद से संबंधित वस्तुएं अथवा स्मृति चिन्ह नहीं है। पुरातत्व अधिकारी एवं राजकीय संग्रहालय के प्रभारी उपनिदेशक डॉ. एसके दुबे ने बताया कि चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतिकारियों से संबंधित वस्तुओं को संकलित करने का प्रयास किया जाएगा। जिन नागरिकों के पास आजादजी से संबंधित स्मृति चिन्ह अथवा वस्तु हो वह संग्रहालय को उपलब्ध कराएं। जिसका झांसी की युवा पीढ़ी और पर्यटक अवलोकन कर सकेंगे।
कहते हैं लोग
चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और उनके साथियों को बुंदेलखंड में गोली चलाना सिखाया था। आजाद और मां जगरानी को बुंदेलखंड से बड़ा लगाव था। आज भी बुंदेले उन्हें याद करते हैं।
हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
हमारे दादा जी रामसेवक रावत चंद्रशेखर आजाद के प्रमुख सहयोगी रहे। झांसी में कई स्थानों पर वह उनके साथ रहे। खंडेराव गेट से तहसील के बीच चंद्रशेखर आजाद के नाम से पार्क अथवा म्यूजियम बनना चाहिये।
पीयूष रावत समाज सेवी
सातार पर आजाद जी की कुटिया को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करना चाहिए। उसका पुराना स्वरूप बरकरार रहना चाहिए। इस कुटिया में कई क्रांतिकारी आते थे और गुप्त योजनाएं बनाते थे।

मोहन नेपाली समाजसेवी
हमें गर्व है कि चंद्रशेखर आजाद झांसी में रहे। झांसी में उनसे जुड़े स्थलों को पर्यटन एवं पुरातत्व विभाग की वेबसाइट पर दर्शाना चाहिए। सातार को भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिलनी चाहिए।
इंजीनियर राहुल शुक्ला
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