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अपनी धरती अपने लाल : बुंदेलखंड के कबीर थे लोककवि ईसुरी, काव्य-शैली ने बनाया औरों से अलग

Tue, 06 Jul 2021 04:16 AM IST
दुष्यंत शर्मा ओमप्रकाश दुबे, झांसी
ओमप्रकाश दुबे, झांसी Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Tue, 06 Jul 2021 04:16 AM IST
सार

अमर उजाला बुंदेलखंड की धरती पर जन्मी हस्तियों के जीवन से जुड़े अनछुए पहलुओं को आप तक पहुंचाने का प्रयास अपनी नई सीरीज 'अपनी धरती अपने लाल' के माध्यम से कर रहा है। आज इस कड़ी में लोककवि ईसुरी की बात जिनके फागों की महफिल ग्रामीण अंचलों में आज भी चौपालों पर जमती है।

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Apni Dharti Apne Lal : folk poet Isuri Isuri was Kabir of Bundelkhand
ईसुरी का चित्र .. ईसुरी के गांव मेंढ़की के निवासी प्रदीप तिवारी, मेंढ़की में ईसुरी के मकान में रहने वाले जयप्रकाश रावत, मेंढ़की निवासी बुजुर्ग अशोक पाठक (बाएं से) और (नीचे) इसी मकान में हुआ था ईसुरी का जन्म - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोककवि ईसुरी को बुंदेलखंड का कबीर कहा जाता है। ईसुरी की चौकड़ियों में कबीर की ही तरह वैराग्य के दर्शन होते हैं, पर इससे भी इतर उन्होंने अपने काव्य में श्रृंगार में वैराग्य का जो सुंदर प्रयोग किया है वह उनके साहित्य को दूसरे कवियों से विशिष्ट बनाता है।

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उन्होंने लिखा है, जिदना मन पंछी उड़ जाने डरो पींजरा रानैं, भाई न जैहैं बंद न जैंहे, हंस अकेलो जाने। ई तन भीतर दस द्वारे हैं की हो के कड़ जाने, कैवे खौं रै जैहै ईसुर ऐसे हते फलाने। ईसुरी ने इस चौकड़ियां में मनुष्य की दस इंद्रियों की तुलना दस दरवाजों से की है, और प्राणों को पंछी तथा शरीर को पिंजरा माना है। 
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उनके काव्य में वैराग्य का दर्शन, बुंदेलखंड की मिट्टी की महक, पैजनियों की खनक, गरीब की कसक और नायिका रजऊ की ठसक दिखाई देती है। ईसुरी का जन्म झांसी जिले की मऊरानीपुर तहसील के मेंढ़की गांव में भोलानाथ अरजरिया के यहां हुआ था। माता पिता का देहांत बचपन में हो जाने के कारण इनका लालन पालन इनकी ननिहाल में हुआ। इनके पूर्वज ओरछा रियासत से आकर मेंढ़की में रहने लगे थे।
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बखरी रैयत है भारे की दई पिया प्यारे की..
मऊरानीपुर तहसील के मेंढ़की गांव में अब भी ईसुरी का मकान मौजूद है, इस विरासत का अधिकार अब उनके ही रिश्तेदार जय प्रकाश रावत के पास है। जब उनसे पूंछा गया कि इस बखरी (मकान) में ईसुरी का जन्म हुआ था आपका सौभाग्य है कि आप इसमें रहते हैं तो उन्होंने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा वक्त के साथ वारिस बदलते रहते हैं।

उन्होंने कहा कि लोककवि ईसुरी ने कबीरदास जी की है तरह इस मानव शरीर को भी एक बखरी यानी कि मकान माना है, ईसुरी ने अपनी चौकड़िया में लिखा है, बखरी रैयत है भारे की, दई पिया प्यारे की। कच्ची भीत उठी माटी की छाई फूस चारे की। बे बंदेज बड़ी बेबाड़ा तई पै दस द्वारे की । किबार, किबरिया एकऊ नइयां, बिना कुची तारे की। ईसुर चाय निकारो जिदना, हमें कौन बारे की। रावत ने कहा जब यह शरीर ही किराये का मकान है तो फिर इन दीवारों के मकानों की क्या अहमियत।

कौन थीं ईसुरी के काव्य की नायिका रजऊ

लोककवि ईसुरी की श्रृंगार की चौकड़ियों में उनकी नायिका का नाम रजऊ लिखा गया है, आखिर रजऊ थी कौन? जब हमने इस बारे में ग्राम मेंढ़की के निवासी बुजुर्ग अशोक कुमार पाठक से पूंछा तो उन्होंने हंसते हुए बताया कि गांव के पूर्वज इसका एक किस्सा बताते थे कि युवा अवस्था में ईसुरी कुछ दिनों के लिए धौर्रा गांव में व्यवसाय के सिलसिले में रहने लगे थे, यहीं पर उनकी नजदीकी गांव के जमींदार की बेटी रजऊ राजे से हो गई।

जब इसकी भनक जमीदार को लगी तो वह मन में गांठ बांध गया। इसी दौरान उसके घर में चोरी हो गई तथा उसकी नौकरानी से जेवरात भी बरामद हो गए। जमींदार ने नौकरानी से कहा कि अगर वह कह दे कि चोरी ईसुरी के कहने पर की थी तो उसे दंड नहीं देंगे। नौकरानी ने भरी पंचायत में कह दिया कि ईसुरी के कहने पर ही चोरी की थी, फिर क्या था जमींदार ने ईसुरी को नीम के पेड़ पर लटकाकर पीट दिया।

इसके बाद ईसुरी धौर्रा गांव छोड़कर तो चले आए पर यह घटना और रजऊ दोनों को वे जीवन भर नहीं भूल सके, ईसुरी ने अपने काव्य में इस घटना का जिक्र करते हुए यह चौकड़िया लिखी है, जा भई दशा लगन के मारें रजऊ तुम्हारे द्वारें। जिन तन फूल छड़ी न लागी, तिन तन दईं तरवारें। हम तो टंगे नीम की डारें, रजुआ करें बहारें, ठाड़ी हती टिकी चौखट सें हो गई ओट किबारें।

ईसुरी के काव्य के श्रृंगार में है बुंदेली बोली का लालित्य
मेंढ़की गांव के निवासी प्रदीप तिवारी बताते हैं कि ईसुरी के काव्य में श्रृंगार और वैराग्य के अलावा बुंदेली बोली का लालित्य भी है। उन्होंने श्रृंगार में वैराग्य का सुंदर प्रयोग करते हुए लिखा है, चलती बेर नजर भर हेरो, मन भर जावे मेरो। मिला लेओ आंखन में आंखें घूंघट तनक उघेरो। टप टप अंसुआ गिरत नैन सों चिते चिते मुख तेरो। ईसुर कहत विदा की बेरा होत विधाता डेरो।

श्रृंगार की इस चौकड़िया में ईसुरी ने जीवन के अंतिम क्षणों का भावुक कर देने वाला वर्णन किया है। बुंदेली बोली की आत्मा कहे जाने वाले लोककवि ईसुरी अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियों को सहेजने वाला भी कोई नहीं है। मेढ़की में ईसुरी शोध संस्थान की स्थापना की गई थी, पर सरकारी उपेक्षा के चलते यह बंद पड़ा है। इनकी फागों के प्रकाशन का भी सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया गया है।

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