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बेटियां : किसी ने वृद्धाश्रम को बना लिया घर...कोई घायलों को पहुंचा रही अस्पताल
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झांसी। कहते हैं बेटियां अनमोल होती हैं। यूं तो बेटियों को पराया कहा जाता है लेकिन बेटियाें से ही घर रोशन होता है। झांसी शहर में भी ऐसी कई बेटियां हैं जिन्होंने अपने दम पर अपने घर-परिवार को रोशन कर रखा है। इनमें किसी ने अपनों को खोया तो किसी ने बुजुर्गों का प्यार पाने के लिए वृद्धाश्रम को ही अपना घर बना लिया। इनका कहना है कि एक बेटी बनकर जो खुशी वह अपनों को दे सकती हैं वह और किसी रिश्ते में नहीं है। जरूरी नहीं कि बेटे ही माता-पिता को संभाल सकते हैं। बेटियां भी वक्त पड़ने पर परिवार का मजबूत कंधा बन सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर शहर की ऐसी ही कुछ होनहार बेटियाें से बात की तो पता चला कि किसी कोने में ही सही...ये बेटियां अपने दम पर आगे बढ़ रही हैं।
नौ साल से वृद्धाश्रम में कर रहीं बुजर्गों की सेवा, मिल रहा 85 दादा-दादी का प्यार
झांसी। पांच साल की उम्र में अपने पिता रामदयाल चौहान को खोने वाली अनुराधा ने कभी अपने दादी-बाबा को नहीं देखा। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान जब उन्हें वृद्धाश्रम में सेवा करने का मौका मिला तो अनुराधा खुद को रोक नहीं पाईं। लखनऊ की रहने वाली अनुराधा वर्ष 2014 से झांसी के आईटीआई वृद्धाश्रम में रहकर बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं। कहने को तो अनुराधा आश्रम की प्रबंधक हैं और इन्हें आश्रम प्रबंधन की तरफ से कुछ वेतन भी मिलता है लेकिन वृद्धाश्रम के बुजुर्गों खासकर महिलाओं के लिए इनकी सेवा देखते ही बनती है। अनुराधा इन्हीं महिलाओं के बीच एक कमरे में रहती हैं। वृद्धाश्रम में बना खाना ही खाती हैं। बुजुर्ग महिलाओं के बाल संवारना, किसी के दुखी या परेशान होने पर उन्हें खाना खिलाना, तबियत बिगड़ने पर रात-दिन देखभाल करना और समय-समय पर दवाई देने के अलावा सारे तीज-त्योहार बुजुर्गों के साथ मनाना ही अनुराधा की दिनचर्या बन चुका है। चार बहनें और तीन भाइयों में छोटी अनुराधा की मां रेनू देवी लखनऊ में ही रहती है। संपन्न और खेती-बाड़ी वाले परिवार की अनुराधा एमएससी-बीएड कर चुकी हैं। बताती हैं कि बचपन में वह एक दादा-दादी के लिए तरसती थीं आज वृद्धाश्रम में उनके 85 दादा-दादी का प्यार मिल रहा है।
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असहायों को तुरंत पहुंचाती हैं राहत, पिता व भाई को खोकर भी हिम्मत नहीं हारी
झांसी। शहर की होनहार बेटी घटना नियंत्रण अधिकारी नागरिक सुरक्षा कोर प्रगति शर्मा एक ऐसा नाम है, जो शास्त्रीय संगीत में महारथ रखने के साथ-साथ दूरदर्शन और आकाशवाणी की कलाकार भी रही हैं। प्रेमगंज सीपरी बाजार में रहने वाली प्रगति अपनी मां दीपशिखा शर्मा के साथ रहती हैं। इनकी मां ट्रैफिक वार्डेन हैं। दीपशिखा बताती हैं कि वर्ष 2011 में पिता सुरेश चंद्र और वर्ष 2020 में इकलौते भाई हरीश चंद्र को खोने के बाद मां की स्थिति उन्हें परेशान करती थी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मां और खुद को नौकरी के अलावा सेवा भाव से जोड़ा। समाजसेवा में उनकी बचपन से रुचि रही है, ऐसे में जब भी उन्हें सड़क पर कोई असहाय या घायल दिखता है वह तुरंत उसकी सहायता करती हैं। अब तक उन्होंने कई घायलों को खुद अस्पताल तक पहुंचाया है। प्रगति एक अच्छी लेखिका व कवयित्री भी हैं। वर्ष 2003 से 2006 तक वह आर्य कन्या डिग्री कॉलेज में छात्रासंघ की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
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21 गोल्ड मेडल जीत चुकीं लगन, छोटी की उम्र में अपने दम पर बना रहीं मुकाम
झांसी। छोटी सी उम्र में अपनी एक अलग पहचान कैसे बनाते हैं ये कोई शहर की होनहार बेटी लगन लाक्षाकार से सीखे। लगन योग, जिमनास्टिक, कराटे, ताइक्वांडो, बॉक्सिंग, जीत कुनाडो डू, स्वीमिंग और जूडो आदि आठ खेलों में 21 गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। झांसी में सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड एंबेसडर भी हैं। कक्षा 10 में पढ़ने वाली लगन नारी शक्ति सम्मान के तहत उत्तर प्रदेश रत्न 2020 से भी सम्मानित हैं। हाल ही में लगन को खेलो इंडिया गेम्स में वूमंस जूडो नेशनल लीग में सिल्वर मेडल भी मिल चुका है। लगन के पिता अरविंद लाक्षाकार एक योग शिक्षक हैं। लगन उनकी इकलौती बेटी है। अरविंद बताते हैं कि भले ही उनके पास बहुत अधिक संसाधन नहीं हैं। लेकिन उनकी बेटी ने अपने दम पर जो मुकाम बनाया है वह उनके लिए फक्र की बात है। लगन अपनी मां की भी लाडली है।
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नौ साल से वृद्धाश्रम में कर रहीं बुजर्गों की सेवा, मिल रहा 85 दादा-दादी का प्यार
झांसी। पांच साल की उम्र में अपने पिता रामदयाल चौहान को खोने वाली अनुराधा ने कभी अपने दादी-बाबा को नहीं देखा। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान जब उन्हें वृद्धाश्रम में सेवा करने का मौका मिला तो अनुराधा खुद को रोक नहीं पाईं। लखनऊ की रहने वाली अनुराधा वर्ष 2014 से झांसी के आईटीआई वृद्धाश्रम में रहकर बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं। कहने को तो अनुराधा आश्रम की प्रबंधक हैं और इन्हें आश्रम प्रबंधन की तरफ से कुछ वेतन भी मिलता है लेकिन वृद्धाश्रम के बुजुर्गों खासकर महिलाओं के लिए इनकी सेवा देखते ही बनती है। अनुराधा इन्हीं महिलाओं के बीच एक कमरे में रहती हैं। वृद्धाश्रम में बना खाना ही खाती हैं। बुजुर्ग महिलाओं के बाल संवारना, किसी के दुखी या परेशान होने पर उन्हें खाना खिलाना, तबियत बिगड़ने पर रात-दिन देखभाल करना और समय-समय पर दवाई देने के अलावा सारे तीज-त्योहार बुजुर्गों के साथ मनाना ही अनुराधा की दिनचर्या बन चुका है। चार बहनें और तीन भाइयों में छोटी अनुराधा की मां रेनू देवी लखनऊ में ही रहती है। संपन्न और खेती-बाड़ी वाले परिवार की अनुराधा एमएससी-बीएड कर चुकी हैं। बताती हैं कि बचपन में वह एक दादा-दादी के लिए तरसती थीं आज वृद्धाश्रम में उनके 85 दादा-दादी का प्यार मिल रहा है।
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असहायों को तुरंत पहुंचाती हैं राहत, पिता व भाई को खोकर भी हिम्मत नहीं हारी
झांसी। शहर की होनहार बेटी घटना नियंत्रण अधिकारी नागरिक सुरक्षा कोर प्रगति शर्मा एक ऐसा नाम है, जो शास्त्रीय संगीत में महारथ रखने के साथ-साथ दूरदर्शन और आकाशवाणी की कलाकार भी रही हैं। प्रेमगंज सीपरी बाजार में रहने वाली प्रगति अपनी मां दीपशिखा शर्मा के साथ रहती हैं। इनकी मां ट्रैफिक वार्डेन हैं। दीपशिखा बताती हैं कि वर्ष 2011 में पिता सुरेश चंद्र और वर्ष 2020 में इकलौते भाई हरीश चंद्र को खोने के बाद मां की स्थिति उन्हें परेशान करती थी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मां और खुद को नौकरी के अलावा सेवा भाव से जोड़ा। समाजसेवा में उनकी बचपन से रुचि रही है, ऐसे में जब भी उन्हें सड़क पर कोई असहाय या घायल दिखता है वह तुरंत उसकी सहायता करती हैं। अब तक उन्होंने कई घायलों को खुद अस्पताल तक पहुंचाया है। प्रगति एक अच्छी लेखिका व कवयित्री भी हैं। वर्ष 2003 से 2006 तक वह आर्य कन्या डिग्री कॉलेज में छात्रासंघ की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
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21 गोल्ड मेडल जीत चुकीं लगन, छोटी की उम्र में अपने दम पर बना रहीं मुकाम
झांसी। छोटी सी उम्र में अपनी एक अलग पहचान कैसे बनाते हैं ये कोई शहर की होनहार बेटी लगन लाक्षाकार से सीखे। लगन योग, जिमनास्टिक, कराटे, ताइक्वांडो, बॉक्सिंग, जीत कुनाडो डू, स्वीमिंग और जूडो आदि आठ खेलों में 21 गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। झांसी में सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड एंबेसडर भी हैं। कक्षा 10 में पढ़ने वाली लगन नारी शक्ति सम्मान के तहत उत्तर प्रदेश रत्न 2020 से भी सम्मानित हैं। हाल ही में लगन को खेलो इंडिया गेम्स में वूमंस जूडो नेशनल लीग में सिल्वर मेडल भी मिल चुका है। लगन के पिता अरविंद लाक्षाकार एक योग शिक्षक हैं। लगन उनकी इकलौती बेटी है। अरविंद बताते हैं कि भले ही उनके पास बहुत अधिक संसाधन नहीं हैं। लेकिन उनकी बेटी ने अपने दम पर जो मुकाम बनाया है वह उनके लिए फक्र की बात है। लगन अपनी मां की भी लाडली है।