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अखिलेश भइया, दवाओं को दे दो रुपइया
ब्यूरो
Updated Sun, 20 Dec 2015 11:56 PM IST
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प्रशांत शर्मा
झांसी। शासन ने मरीजों को मुफ्त दवाई देने का आदेश तो जारी कर रखे हैं, लेकिन बजट नहीं बढ़ाया है। इस कारण शासन का यह आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। मजबूरी में चिकित्सकों को मरीजों को बाहर की दवा लिखनी पड़ रही है।
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में मरीजों को दवाइयों के लिए परेशान होना पड़ रहा है। झांसी समेत आसपास के जनपदों के सैकड़ों मरीज रोजाना महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने के लिए आते हैं। बुंदेलखंड पिछड़ा क्षेत्र होने के चलते यहां आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की संख्या बहुतायत है।
हर कोई चाहता है कि उसका इलाज मुफ्त में हो, लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा है। बजट की कमी से गरीब मरीजों को भी सुविधा नहीं मिल पा रही है। दरअसल, इसमें मेडिकल कालेज प्रशासन का दोष नहीं है। सरकार जितना बजट देती है, उस हिसाब से दवाओं की खरीद हो जाती है। सस्ती दवाएं देकर मरीजों को टरकाना मजबूरी हो गया है। सरकार द्वारा दिए जाने वाले बजट व रोजाना होने वाले खर्च से आसानी से समझा जा सकता है कि शासन की मंशा के अनुरूप दवाओं का वितरण संभव नहीं है।
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वर्ष 2012 के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रति दिन ओपीडी के एक सामान्य मरीज को दी जाने वाली सामान्य दवाओं की कीमत 43.38 रुपये तक पहुंचती थी। प्रतिदिन 740 मरीज आते थे। इस लिहाज से ओपीडी के कुल मरीजों को सारी दवाएं देने पर प्रति वर्ष 8.20 करोड़ रुपये का व्यय आता था।
वहीं, भर्ती मरीजों को प्रतिदिन देने वाली दवा की औसत कीमत 546 रुपये होती थी। भर्ती मरीजों को कुल 10.47 लाख रुपये की दवाइयां उपलब्ध करानी पड़ती थीं। इस तरह साल 2012 में सभी मरीजों को समस्त औषधियां उपलब्ध कराने हेतु अनुमानित धनराशि 19.50 करोड़ की आवश्यकता थी।
वर्ष 2013, 2014, 2015 में विगत वर्षों की तुलना में आठ से दस प्रतिशत मरीजों की बढ़ोतरी हुई है। दवाओं की कीमत भी बढ़ी है। वर्ष 2012 में मेडिकल गैस क्रय में करीब 55 लाख रुपये व्यय होता था जबकि, 2015 में इसका खर्च बढ़कर 1.25 करोड़ रुपये पहुंच गया है। वर्ष 2012 में कैमिकल्स, रिएजेंट्स के क्रय में 37 लाख रुपये व्यय होते थे, जबकि 2015 में यह बढ़कर एक करोड़ रुपये तक पहुंच गए।
मरीजों की संख्या के अनुपात में वर्ष 2012 की तुलना में वर्ष 2015 में औषधि और रसायन मद में करीब 1.50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता जताई गई। इस हिसाब से यदि सभी मरीजों को समस्त औषधियां उपलब्ध कराई जाएं तो औषधि, रसायन मद में वित्तीय वर्ष 2015-16 में कम से कम करीब 21 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जबकि शासन सिर्फ साढ़े तीन करोड़ रुपये ही दे रहा है। कॉलेज प्रशासन की ओर से शासन को कई बार बजट बढ़ाने को लेकर पत्र लिखा जा चुका है लेकिन अभी भी उम्मीद धुंधली नजर आ रही है।
ओपीडी में आए मरीजों की संख्या
वर्ष-नए-पुराने आकस्मिक विभाग-कुल
2013-2,75,015-17,886-25,042-3,17,943
2014-2,83,810-18,605-23,385-3,25,800
भर्ती किए गए मरीजों की संख्या
वर्ष-ओपीडी-आकस्मिक-कुल
2013-14,152-16,815-30,967
2014-14,634-15,361-29,995
डॉक्टर उठा रहे फायदा
बजट आड़े आ जाने से मरीजों को पूरी दवाएं मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने उपलब्ध कराने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इसी मजबूरी का फायदा अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा उठाया जा रहा है। वह धड़ल्ले से सेटिंग वाले मेडिकल स्टोरों पर बाहर की दवाएं लिखकर अपना कमीशन वसूल रहे हैं। इससे मरीज सरकारी अस्पताल में जाकर भी प्राइवेट नर्सिंग होम जैसी सेवाएं ले रहा है।
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झांसी। शासन ने मरीजों को मुफ्त दवाई देने का आदेश तो जारी कर रखे हैं, लेकिन बजट नहीं बढ़ाया है। इस कारण शासन का यह आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। मजबूरी में चिकित्सकों को मरीजों को बाहर की दवा लिखनी पड़ रही है।
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में मरीजों को दवाइयों के लिए परेशान होना पड़ रहा है। झांसी समेत आसपास के जनपदों के सैकड़ों मरीज रोजाना महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने के लिए आते हैं। बुंदेलखंड पिछड़ा क्षेत्र होने के चलते यहां आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की संख्या बहुतायत है।
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हर कोई चाहता है कि उसका इलाज मुफ्त में हो, लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा है। बजट की कमी से गरीब मरीजों को भी सुविधा नहीं मिल पा रही है। दरअसल, इसमें मेडिकल कालेज प्रशासन का दोष नहीं है। सरकार जितना बजट देती है, उस हिसाब से दवाओं की खरीद हो जाती है। सस्ती दवाएं देकर मरीजों को टरकाना मजबूरी हो गया है। सरकार द्वारा दिए जाने वाले बजट व रोजाना होने वाले खर्च से आसानी से समझा जा सकता है कि शासन की मंशा के अनुरूप दवाओं का वितरण संभव नहीं है।
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वर्ष 2012 के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रति दिन ओपीडी के एक सामान्य मरीज को दी जाने वाली सामान्य दवाओं की कीमत 43.38 रुपये तक पहुंचती थी। प्रतिदिन 740 मरीज आते थे। इस लिहाज से ओपीडी के कुल मरीजों को सारी दवाएं देने पर प्रति वर्ष 8.20 करोड़ रुपये का व्यय आता था।
वहीं, भर्ती मरीजों को प्रतिदिन देने वाली दवा की औसत कीमत 546 रुपये होती थी। भर्ती मरीजों को कुल 10.47 लाख रुपये की दवाइयां उपलब्ध करानी पड़ती थीं। इस तरह साल 2012 में सभी मरीजों को समस्त औषधियां उपलब्ध कराने हेतु अनुमानित धनराशि 19.50 करोड़ की आवश्यकता थी।
वर्ष 2013, 2014, 2015 में विगत वर्षों की तुलना में आठ से दस प्रतिशत मरीजों की बढ़ोतरी हुई है। दवाओं की कीमत भी बढ़ी है। वर्ष 2012 में मेडिकल गैस क्रय में करीब 55 लाख रुपये व्यय होता था जबकि, 2015 में इसका खर्च बढ़कर 1.25 करोड़ रुपये पहुंच गया है। वर्ष 2012 में कैमिकल्स, रिएजेंट्स के क्रय में 37 लाख रुपये व्यय होते थे, जबकि 2015 में यह बढ़कर एक करोड़ रुपये तक पहुंच गए।
मरीजों की संख्या के अनुपात में वर्ष 2012 की तुलना में वर्ष 2015 में औषधि और रसायन मद में करीब 1.50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता जताई गई। इस हिसाब से यदि सभी मरीजों को समस्त औषधियां उपलब्ध कराई जाएं तो औषधि, रसायन मद में वित्तीय वर्ष 2015-16 में कम से कम करीब 21 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जबकि शासन सिर्फ साढ़े तीन करोड़ रुपये ही दे रहा है। कॉलेज प्रशासन की ओर से शासन को कई बार बजट बढ़ाने को लेकर पत्र लिखा जा चुका है लेकिन अभी भी उम्मीद धुंधली नजर आ रही है।
ओपीडी में आए मरीजों की संख्या
वर्ष-नए-पुराने आकस्मिक विभाग-कुल
2013-2,75,015-17,886-25,042-3,17,943
2014-2,83,810-18,605-23,385-3,25,800
भर्ती किए गए मरीजों की संख्या
वर्ष-ओपीडी-आकस्मिक-कुल
2013-14,152-16,815-30,967
2014-14,634-15,361-29,995
डॉक्टर उठा रहे फायदा
बजट आड़े आ जाने से मरीजों को पूरी दवाएं मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने उपलब्ध कराने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इसी मजबूरी का फायदा अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा उठाया जा रहा है। वह धड़ल्ले से सेटिंग वाले मेडिकल स्टोरों पर बाहर की दवाएं लिखकर अपना कमीशन वसूल रहे हैं। इससे मरीज सरकारी अस्पताल में जाकर भी प्राइवेट नर्सिंग होम जैसी सेवाएं ले रहा है।