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अपनों के इंतजार में 13 दिन बाद युवक ने तोड़ा दम
ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2015 12:21 AM IST
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झांसी। आरपीएफ और जीआरपी में चल रही अधिकार-दायित्व की जंग में फंसे एक युवक ने अपनों का इंतजार करते-करते 13 दिन बाद मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया। जिला पुलिस ने परिजनों को सूचना देकर पोस्टमार्टम कराया। मानवता को तार-तार करने वाले इस मामले में आरपीएफ घायल को भर्ती कराने पर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं जीआरपी अनजान बनी हुई है।
बुलंदशहर के ककोड़ थानांतर्गत गांव धनौरा निवासी निरंजन का 20 वर्षीय पुत्र नवनीत 29 जुलाई को घर से दिल्ली इंटरव्यू देने गया था। कुछ दिन दिल्ली रुकने के बाद वह घर आया और आठ अगस्त को कोचिंग के लिए बात करने मुंबई के लिए निकला। उसी दिन रात को रेलवे स्टेशन झांसी पर वह घायल अवस्था में पड़ा मिला। मौके पर जीआरपी और आरपीएफ के जवान पहुंचे, मगर उसे अस्पताल भिजवाने की कोई व्यवस्था नहीं की। कुछ देर बाद आरपीएफ के अधिकारियों के आदेश पर कांस्टेबल आरके श्रीवास्तव उसे लेकर मेडिकल कॅालेज पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने नवनीत को भर्ती कर लिया। मेडिकल कॉलेज में आरपीएफ जवान ने नवनीत का नाम व पता लिखवाया और चला गया। इस संबंध में परिजनों को सूचना नहीं दी गई।
परिजनों का इंतजार करते-करते घायल नवनीत ने 21 अगस्त यानी 13 दिन बाद दम तोड़ दिया। गुरुवार की रात मेडिकल कॉलेज से जब नवनीत की मौत का विश्वविद्यालय पुलिस चौकी पर मीमो पहुंचा तो चौकी प्रभारी ने तुरंत बुलंदशहर संपर्क करके परिजनों को मामले की जानकारी दी। सूचना पर परिजन शुक्रवार सुबह झांसी आए। जब उन्हें पूरे मामले की जानकारी हुई तो उनका गुस्सा भड़क गया। उन्होंने आरपीएफ व जीआरपी अधिकारियों से संपर्क किया तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। भर्ती कराने वाले जवान का कहना है कि उसे ‘साहब’ ने सिर्फ भर्ती कराने के लिए भेजा था, सो उसने करा दिया। इंस्पेक्टर राजीव उपाध्याय का कहना है कि जिस समय नवनीत स्टेशन पर पड़ा मिला था, उस समय मौके पर जीआरपी भी थी।
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नियमानुसार जीआरपी को अस्पताल भेजना चाहिए था, मगर उन्होंने मानवता के चलते नवनीत को मेडिकल कॉलेज भेजा। जब उनसे जीआरपी को लिखित में सूचना देने के बारे में पूछा गया तो वह अधिकार व दायित्व का पाठ पढ़ाने लगे। वहीं, जीआरपी इंस्पेक्टर आरसी मिश्रा का कहना है कि वह जिले से बाहर हैं, झांसी लौटने पर मामले की जानकारी करेंगे। उनका कहना है कि ऐसा संभव नहीं कि जीआरपी मौके पर पहुंचे और घायल को अस्पताल भर्ती नहीं करवाए। वहीं, परिजनों ने पूरे मामले की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने का फैसला किया है। उन्होंने बताया कि नवनीत का बैग, मोबाइल फोन व नकदी गायब है।
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बुलंदशहर के ककोड़ थानांतर्गत गांव धनौरा निवासी निरंजन का 20 वर्षीय पुत्र नवनीत 29 जुलाई को घर से दिल्ली इंटरव्यू देने गया था। कुछ दिन दिल्ली रुकने के बाद वह घर आया और आठ अगस्त को कोचिंग के लिए बात करने मुंबई के लिए निकला। उसी दिन रात को रेलवे स्टेशन झांसी पर वह घायल अवस्था में पड़ा मिला। मौके पर जीआरपी और आरपीएफ के जवान पहुंचे, मगर उसे अस्पताल भिजवाने की कोई व्यवस्था नहीं की। कुछ देर बाद आरपीएफ के अधिकारियों के आदेश पर कांस्टेबल आरके श्रीवास्तव उसे लेकर मेडिकल कॅालेज पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने नवनीत को भर्ती कर लिया। मेडिकल कॉलेज में आरपीएफ जवान ने नवनीत का नाम व पता लिखवाया और चला गया। इस संबंध में परिजनों को सूचना नहीं दी गई।
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परिजनों का इंतजार करते-करते घायल नवनीत ने 21 अगस्त यानी 13 दिन बाद दम तोड़ दिया। गुरुवार की रात मेडिकल कॉलेज से जब नवनीत की मौत का विश्वविद्यालय पुलिस चौकी पर मीमो पहुंचा तो चौकी प्रभारी ने तुरंत बुलंदशहर संपर्क करके परिजनों को मामले की जानकारी दी। सूचना पर परिजन शुक्रवार सुबह झांसी आए। जब उन्हें पूरे मामले की जानकारी हुई तो उनका गुस्सा भड़क गया। उन्होंने आरपीएफ व जीआरपी अधिकारियों से संपर्क किया तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। भर्ती कराने वाले जवान का कहना है कि उसे ‘साहब’ ने सिर्फ भर्ती कराने के लिए भेजा था, सो उसने करा दिया। इंस्पेक्टर राजीव उपाध्याय का कहना है कि जिस समय नवनीत स्टेशन पर पड़ा मिला था, उस समय मौके पर जीआरपी भी थी।
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नियमानुसार जीआरपी को अस्पताल भेजना चाहिए था, मगर उन्होंने मानवता के चलते नवनीत को मेडिकल कॉलेज भेजा। जब उनसे जीआरपी को लिखित में सूचना देने के बारे में पूछा गया तो वह अधिकार व दायित्व का पाठ पढ़ाने लगे। वहीं, जीआरपी इंस्पेक्टर आरसी मिश्रा का कहना है कि वह जिले से बाहर हैं, झांसी लौटने पर मामले की जानकारी करेंगे। उनका कहना है कि ऐसा संभव नहीं कि जीआरपी मौके पर पहुंचे और घायल को अस्पताल भर्ती नहीं करवाए। वहीं, परिजनों ने पूरे मामले की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने का फैसला किया है। उन्होंने बताया कि नवनीत का बैग, मोबाइल फोन व नकदी गायब है।