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बुंदेलखंड के ध्याना र्थ - प्राकृतिक खेती-Cordination
Updated Tue, 25 Sep 2018 01:57 AM IST
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गहरी जुताई से घटती है जमीन की उर्वरा शक्ति: पालेकर
- हैवी ट्रैक्टर नहीं हैं जुताई के लिए उपयुक्त
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। शून्य लागत प्राकृतिक कृषि अभियान के प्रशिक्षण शिविर में पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा कि गहरी जुताई से जमीन की उर्वरा शक्ति घटती है। हैवी ट्रैक्टर इसके लिए कतई उपयुक्त नहीं हैं। जमीन के ऊपर की 4.5 इंच की सतह की सुरक्षा की जानी चाहिए। जुताई के लिए हल उपयोगी है।
रानी लक्ष्मीबाई पैरा मेडिकल कॉलेज में चल रहे प्रशिक्षण शिविर मे सोमवार को उन्होंने कहा कि बरसाती सीजन में 90 से लेकर 100 प्रतिशत तक नमी वाष्प के रूप में रहती है। सर्दियों में यह नमी 65 प्रतिशत और गर्मियों में 35 प्रतिशत हो जाती है। हवा (नमी) से पानी खींचने का काम ह्यूमस करता है। बंजर भूमि पर आच्छादन करने से करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु पैदा होते हैं। आच्छादन में मदृाच्छादन से नमी का वाष्पीकरण होता है, जिससे जड़ों और मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को नमी नहीं मिलती है। पौधे सूखने लगते हैं, फल फूल गिरने लगते हैं। इसी नुकसान से फसलों को बचाने के लिए जुताई की जाती है। जुताई का उद्देश्य मिट्टी में हवा का पर्याप्त संचालन, जमीन में वर्षा जल का संग्रह और खरपतवार का नियंत्रण करना है। ह्यूमस जमीन की ऊपर की ओर 4.5 इंच सतह पर होता है। इसकी सुरक्षा की जानी चाहिए, इसलिए किसी भी हाल में गहरी जुताई न की जाए। गहरी जुताई से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में पानी और बिजली की 90 प्रतिशत तक बचत होती है। सिंचाई के लिए खेतों में नालियां बनानी चाहिए तथा एक नाली को छोड़कर दूसरी नाली में पानी देना चाहिए। इससे पानी की 50 प्रतिशत बचत होती है। इसी तरह बीच-बीच में छोड़ी गई नालियों में पानी देने से बचत होती है।
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इस मौके पर अनुराग शर्मा, अतुल शर्मा, गोपाल उपाध्याय, आचार्य योगर्षि अविनाश, श्याम बिहारी गुप्ता, नितिन चौरसिया, डॉ. एसआर गुप्ता, राकेश पाठक, सुल्तान सिंह, सुनीता पांडेय, कुंजबिहारी गुुप्ता मौजूद रहे।
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- हैवी ट्रैक्टर नहीं हैं जुताई के लिए उपयुक्त
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। शून्य लागत प्राकृतिक कृषि अभियान के प्रशिक्षण शिविर में पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा कि गहरी जुताई से जमीन की उर्वरा शक्ति घटती है। हैवी ट्रैक्टर इसके लिए कतई उपयुक्त नहीं हैं। जमीन के ऊपर की 4.5 इंच की सतह की सुरक्षा की जानी चाहिए। जुताई के लिए हल उपयोगी है।
रानी लक्ष्मीबाई पैरा मेडिकल कॉलेज में चल रहे प्रशिक्षण शिविर मे सोमवार को उन्होंने कहा कि बरसाती सीजन में 90 से लेकर 100 प्रतिशत तक नमी वाष्प के रूप में रहती है। सर्दियों में यह नमी 65 प्रतिशत और गर्मियों में 35 प्रतिशत हो जाती है। हवा (नमी) से पानी खींचने का काम ह्यूमस करता है। बंजर भूमि पर आच्छादन करने से करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु पैदा होते हैं। आच्छादन में मदृाच्छादन से नमी का वाष्पीकरण होता है, जिससे जड़ों और मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को नमी नहीं मिलती है। पौधे सूखने लगते हैं, फल फूल गिरने लगते हैं। इसी नुकसान से फसलों को बचाने के लिए जुताई की जाती है। जुताई का उद्देश्य मिट्टी में हवा का पर्याप्त संचालन, जमीन में वर्षा जल का संग्रह और खरपतवार का नियंत्रण करना है। ह्यूमस जमीन की ऊपर की ओर 4.5 इंच सतह पर होता है। इसकी सुरक्षा की जानी चाहिए, इसलिए किसी भी हाल में गहरी जुताई न की जाए। गहरी जुताई से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है।
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उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में पानी और बिजली की 90 प्रतिशत तक बचत होती है। सिंचाई के लिए खेतों में नालियां बनानी चाहिए तथा एक नाली को छोड़कर दूसरी नाली में पानी देना चाहिए। इससे पानी की 50 प्रतिशत बचत होती है। इसी तरह बीच-बीच में छोड़ी गई नालियों में पानी देने से बचत होती है।
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इस मौके पर अनुराग शर्मा, अतुल शर्मा, गोपाल उपाध्याय, आचार्य योगर्षि अविनाश, श्याम बिहारी गुप्ता, नितिन चौरसिया, डॉ. एसआर गुप्ता, राकेश पाठक, सुल्तान सिंह, सुनीता पांडेय, कुंजबिहारी गुुप्ता मौजूद रहे।