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बारिश में छिना 47 हजार मजदूरों का रोजगार
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झांसी। बारिश भले किसानों के लिए राहत बनकर आई हो लेकिन, भूमिहीन मजदूरों को यह भारी पड़ गई। बारिश होने से मनरेगा के जरिए कराए जा रहे करीब डेढ़ दर्जन कच्चे कार्य बंद कराने पड़े। इस वजह से मनरेगा मजदूरों की संख्या में भारी गिरावट आ गई। पहले जहां 72 हजार मजदूर काम करते थे, वहीं अब महज 20-25 हजार मजदूर ही काम कर रहे हैं। शेष मजदूरों को अब अगले माह ही काम दुबारा मिल सकेगा।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना प्रवासी मजदूरों के लिए कोरोना महामारी के दौरान सबसे राहतभरी योजना बनकर सामने आई। महामारी के बीच लौटे मजदूरों को इसके जरिए गांव में ही रोजगार दिया गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रवासी मजदूरों के जॉबकॉर्ड बनने के बाद इनकी संख्या बढ़कर 1.99 लाख हो गई। जिनमें कुल 1.09 लाख सक्रिय मजदूर थे। इनसे ब्लॉक एवं ग्राम स्तर पर तालाब खोदाई, गहरीकरण, मेड़ बंधी, पौधरोपण, सिंचाई विभाग, पीडब्ल्यूडी, कृषि विभाग, पंचायती राज विभाग आदि के जरिए तमाम सारे कच्चे कार्य कराए जा रहे थे। जुलाई के आखिरी सप्ताह तक इनमें काम करने वाले मजदूरों की कुल संख्या 72 हजार थी लेकिन, बारिश आरंभ होने के बाद धीरे-धीरे तमाम कच्चे काम बंद हो गए।
इस वजह से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक महज 20-25 हजार के बीच ही मजदूर काम पर आ रहे हैं। अधिकांश मजदूरों की मजदूरी बारिश की वजह से बंद हुए काम की भेंट चढ़ चुकी हालांकि कुछ मजदूर ऐसे भी हैं जो बारिश में काम करने को राजी नहीं। इस वजह से भी काम मांगने वाले मजदूरों की संख्या में कमी आई है। जुलाई माह के आखिरी सप्ताह में बजट न होने से मजदूरों को पंद्रह दिन का भुगतान नहीं हुआ। इस वजह से भी तमाम मजदूरों ने काम छोड़ दिया। हालांकि अफसरों का कहना है कि बारिश की वजह से काम प्रभावित हुआ है। अगस्त के दूसरे पखवारे से कच्चे कामों के अलावा पंचायती राज विभाग की ओर से पंचायत भवन का निर्माण, सामुदायिक शौचालय आदि के कार्य कराए जा रहे हैं लेकिन, इनमें अधिक संख्या में मनरेगा मजदूरों को काम नहीं मिल रहा।
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बारिश की वजह से कच्चे काम प्रभावित हुए हैं लेकिन, पंचायत भवन, पौधरोपण आदि के कार्य कराए ही जा रहे हैं। जो मजदूर काम मांगता है, उसे काम दिया जाता है। - रामऔतार उपायुक्त, मनरेगा
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना प्रवासी मजदूरों के लिए कोरोना महामारी के दौरान सबसे राहतभरी योजना बनकर सामने आई। महामारी के बीच लौटे मजदूरों को इसके जरिए गांव में ही रोजगार दिया गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रवासी मजदूरों के जॉबकॉर्ड बनने के बाद इनकी संख्या बढ़कर 1.99 लाख हो गई। जिनमें कुल 1.09 लाख सक्रिय मजदूर थे। इनसे ब्लॉक एवं ग्राम स्तर पर तालाब खोदाई, गहरीकरण, मेड़ बंधी, पौधरोपण, सिंचाई विभाग, पीडब्ल्यूडी, कृषि विभाग, पंचायती राज विभाग आदि के जरिए तमाम सारे कच्चे कार्य कराए जा रहे थे। जुलाई के आखिरी सप्ताह तक इनमें काम करने वाले मजदूरों की कुल संख्या 72 हजार थी लेकिन, बारिश आरंभ होने के बाद धीरे-धीरे तमाम कच्चे काम बंद हो गए।
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इस वजह से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक महज 20-25 हजार के बीच ही मजदूर काम पर आ रहे हैं। अधिकांश मजदूरों की मजदूरी बारिश की वजह से बंद हुए काम की भेंट चढ़ चुकी हालांकि कुछ मजदूर ऐसे भी हैं जो बारिश में काम करने को राजी नहीं। इस वजह से भी काम मांगने वाले मजदूरों की संख्या में कमी आई है। जुलाई माह के आखिरी सप्ताह में बजट न होने से मजदूरों को पंद्रह दिन का भुगतान नहीं हुआ। इस वजह से भी तमाम मजदूरों ने काम छोड़ दिया। हालांकि अफसरों का कहना है कि बारिश की वजह से काम प्रभावित हुआ है। अगस्त के दूसरे पखवारे से कच्चे कामों के अलावा पंचायती राज विभाग की ओर से पंचायत भवन का निर्माण, सामुदायिक शौचालय आदि के कार्य कराए जा रहे हैं लेकिन, इनमें अधिक संख्या में मनरेगा मजदूरों को काम नहीं मिल रहा।
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बारिश की वजह से कच्चे काम प्रभावित हुए हैं लेकिन, पंचायत भवन, पौधरोपण आदि के कार्य कराए ही जा रहे हैं। जो मजदूर काम मांगता है, उसे काम दिया जाता है। - रामऔतार उपायुक्त, मनरेगा