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15 साल से जीत के इंतजार में बसपा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 08 Feb 2017 01:06 AM IST
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15 साल से जीत के इंतजार में बसपा
- फोटो : demo
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बहुजन समाज पार्टी गरौठा विधानसभा सीट फतह करने के लिए 15 साल से इंतजार कर रही है। पार्टी अब तक सिर्फ एक बार यहां पर जीत सकी है। पार्टी ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए अबकी बार फिर यहां से डॉ. अरुण मिश्रा पर भरोसा जताया है।
गरौठा विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी का रिकार्ड ज्यादा अच्छा नहीं है। 1984 में पार्टी के गठन के बाद पहला चुनाव 1989 में लड़ा था। कर्ण सिंह निरंजन चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें सिर्फ 11,000 मत मिले। कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव 62,000 से अधिक वोट पाकर जीत गए थे। इसके बाद 1991 में हुए चुनाव में पार्टी ने संत सिंह सेरसा को मैदान में उतारा। पर, वह कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव को पार नहीं पा सके। इस दौरान भाजपा के वीरेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर रहे। बसपा का प्रदर्शन इतना खराब रहा कि दोनों चुनाव में पार्टी चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ सकी। 1993 में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया, जिससे सीट सपा के खाते में चली गई। लेकिन, इसके बाद भी कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव चुनाव जीत गए। इसके बाद 1996 में बसपा का कांग्रेस से गठबंधन हो गया व गरौठा सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। चुनाव में सपा के चंद्रपाल सिंह यादव ने गठबंधन प्रत्याशी रणजीत सिंह जूदेव को पटखनी दे दी और पहली बार समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी चंद्रपाल ने विजय हासिल की।
2002 में बसपा ने बृजेंद्र कुमार व्यास ‘डमडम महाराज’ को चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने विपक्षियों को कड़ी टक्कर दी और 59,724 वोट पाकर जीत का परचम लहराया, जबकि सपा के चंद्रपाल सिंह यादव 46,299 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव पैंतीस हजार वोट भी हासिल नहीं कर सके। लेकिन, 2007 के चुनाव में बाजी फिर पलट गई। सपा और बसपा ने प्रत्याशी बदल दिए। बसपा ने जहां उमाशंकर निरंजन पर दांव आजमाया, वहीं सपा ने दीपनारायण सिंह यादव को मैदान में उतारा। इस चुनाव में दीपनारायण सिंह ने करीब तीस हजार वोटों से बसपा को हरा दिया। चौंकाने वाले परिणाम यह रहे कि कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव 45 हजार से अधिक वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। 2012 में बसपा ने जीत की उम्मीद लेकर फिर से ब्राह्मण कार्ड खेला और देवेश पालीवाल को मैदान में उतारा था, लेकिन सफलता नहीं मिली और दीपनारायण सिंह फिर से विजयी रहे। अबकी बार फिर दीपनारायण सिंह मैदान में हैं। इस बार कांग्रेस और सपा का गठबंधन होने के कारण कांग्रेस से कोई प्रत्याशी नहीं हैं।
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वर्जन........................
प्रत्याशी सर्वसुलभ, जीतेंगे जरूर
बसपा ने पिछली बार देवेश पालीवाल को टिकट दिया था, लेकिन वह ब्राह्मणों के ही वोट नहीं ले सके थे। इसलिए अबकी बार पार्टी ने डॉ. अरुण मिश्रा पर भरोसा जताया है। वह समाजसेवा के क्षेत्र मेें काफी समय से कार्य कर रहे हैं। इसलिए अबकी बार पार्टी का दावा बहुत मजबूत है।
- भूपेंद्र आर्य, मुख्य जोन कोआर्डिनेटर, बसपा
अबकी बार परिवर्तन की लहर
अबकी बार वोटर परिवर्तन चाहता है। कांग्रेस से टिकट मांग रहे राधेलाल पाल खुलकर मेरे साथ आ गए हैं। क्षेत्र में पाल समाज का वोट निर्णायक है। ब्राह्मण मुझे सहयोग कर रहे हैं। मुस्लिम मतदाता भी मेरे साथ हैं। इस बार गरौठा में पार्टी रिकार्ड मतों से जीतेगी।
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बहुजन समाज पार्टी गरौठा विधानसभा सीट फतह करने के लिए 15 साल से इंतजार कर रही है। पार्टी अब तक सिर्फ एक बार यहां पर जीत सकी है। पार्टी ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए अबकी बार फिर यहां से डॉ. अरुण मिश्रा पर भरोसा जताया है।
गरौठा विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी का रिकार्ड ज्यादा अच्छा नहीं है। 1984 में पार्टी के गठन के बाद पहला चुनाव 1989 में लड़ा था। कर्ण सिंह निरंजन चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें सिर्फ 11,000 मत मिले। कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव 62,000 से अधिक वोट पाकर जीत गए थे। इसके बाद 1991 में हुए चुनाव में पार्टी ने संत सिंह सेरसा को मैदान में उतारा। पर, वह कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव को पार नहीं पा सके। इस दौरान भाजपा के वीरेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर रहे। बसपा का प्रदर्शन इतना खराब रहा कि दोनों चुनाव में पार्टी चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ सकी। 1993 में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया, जिससे सीट सपा के खाते में चली गई। लेकिन, इसके बाद भी कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव चुनाव जीत गए। इसके बाद 1996 में बसपा का कांग्रेस से गठबंधन हो गया व गरौठा सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। चुनाव में सपा के चंद्रपाल सिंह यादव ने गठबंधन प्रत्याशी रणजीत सिंह जूदेव को पटखनी दे दी और पहली बार समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी चंद्रपाल ने विजय हासिल की।
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2002 में बसपा ने बृजेंद्र कुमार व्यास ‘डमडम महाराज’ को चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने विपक्षियों को कड़ी टक्कर दी और 59,724 वोट पाकर जीत का परचम लहराया, जबकि सपा के चंद्रपाल सिंह यादव 46,299 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव पैंतीस हजार वोट भी हासिल नहीं कर सके। लेकिन, 2007 के चुनाव में बाजी फिर पलट गई। सपा और बसपा ने प्रत्याशी बदल दिए। बसपा ने जहां उमाशंकर निरंजन पर दांव आजमाया, वहीं सपा ने दीपनारायण सिंह यादव को मैदान में उतारा। इस चुनाव में दीपनारायण सिंह ने करीब तीस हजार वोटों से बसपा को हरा दिया। चौंकाने वाले परिणाम यह रहे कि कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव 45 हजार से अधिक वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। 2012 में बसपा ने जीत की उम्मीद लेकर फिर से ब्राह्मण कार्ड खेला और देवेश पालीवाल को मैदान में उतारा था, लेकिन सफलता नहीं मिली और दीपनारायण सिंह फिर से विजयी रहे। अबकी बार फिर दीपनारायण सिंह मैदान में हैं। इस बार कांग्रेस और सपा का गठबंधन होने के कारण कांग्रेस से कोई प्रत्याशी नहीं हैं।
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बसपा ने पिछली बार देवेश पालीवाल को टिकट दिया था, लेकिन वह ब्राह्मणों के ही वोट नहीं ले सके थे। इसलिए अबकी बार पार्टी ने डॉ. अरुण मिश्रा पर भरोसा जताया है। वह समाजसेवा के क्षेत्र मेें काफी समय से कार्य कर रहे हैं। इसलिए अबकी बार पार्टी का दावा बहुत मजबूत है।
- भूपेंद्र आर्य, मुख्य जोन कोआर्डिनेटर, बसपा
अबकी बार परिवर्तन की लहर
अबकी बार वोटर परिवर्तन चाहता है। कांग्रेस से टिकट मांग रहे राधेलाल पाल खुलकर मेरे साथ आ गए हैं। क्षेत्र में पाल समाज का वोट निर्णायक है। ब्राह्मण मुझे सहयोग कर रहे हैं। मुस्लिम मतदाता भी मेरे साथ हैं। इस बार गरौठा में पार्टी रिकार्ड मतों से जीतेगी।