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सिविक एमीनिटीज: डिब्बां में लगेंगे बफर कप्लर-City
Updated Wed, 13 Sep 2017 08:31 PM IST
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हादसा होगा तो एकदूसरे पर नहीं चढ़ेंगे कोच
रेल दुर्घटना से बचाव के लिए डिब्बों में लगेंगे सेंट्रल बफर कप्लर
संरक्षा को लेकर उठाए जा रहे कड़े कदम
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
आने वाले दिनों में अगर कोई रेल हादसा हुआ तो कोच एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ेंगे। रेलवे बोर्ड ने संरक्षा को लेकर कड़े कदम उठाना शुरू कर दिए हैं। रेलवे वर्कशाप में मरम्मत के लिए आने वाले वैगन और सवारी डिब्बों में सेंट्रल बफर कप्लर लगाने की व्यवस्था शुरू कर दी गई है।
पुखरायां में हुए इंदौर-पटना एक्सप्रेस और मुजफ्फरनगर में उत्कल एक्सप्रेस जैसी बड़ी रेल दुर्घटनाओं के बाद सेे रेलवे सुरक्षा को लेकर बेहद सजग है। इंदौर-पटना एक्सप्रेस में आईसीएफ टाइप (पुरानी स्टाइल) के कोच लगे हुए थे, जो अधिक स्पीड में होने वाली दुर्घटनाओं को सहने की क्षमता नहीं रखते हैं। ऐसा ही हाल उत्कल एक्सप्रेस के कोचों का था। परिणामस्वरूप दुर्घटना होने पर उनके डिब्बे एक के ऊपर एक चढ़ गए। रेलवे बोर्ड ने तय किया है कि जिन भी ट्रेनों में अभी आईसीएफ (इंट्रीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई) कोच लगे हैं, उनमें सेंट्रल बफर कप्लर लगाए जाएंगे। अभी दो डिब्बों की कपलिंग के बीच एक लोहे की रॉड डाल दी जाती है। नई तकनीक की कपलिंग में डिब्बों के एक-दूसरे पर चढ़ने की संभावना कम होती है।
‘मरम्मत के लिए आ रहे सवारी डिब्बों और मालगाड़ी के वैगन में सेंट्रल बफर कप्लर लगाना शुरू कर दिया है। संरक्षा के हर पहलू को ध्यान में रखकर डिब्बे तैयार किए जा रहे हैं।’
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आरडी मौर्या, मुख्य कारखाना प्रबंधक।
ये भी जानिये
-----------
- आईसीएफ कोच माइल्ड स्टील के बने होते हैं जो इसके झटके सहने की क्षमता को कम करते हैं और दुर्घटना का कारण बनते हैं।
- आईसीएफ कोच में एयरब्रेक और थ्रेड सिस्टम होता है, जिससे चलती ट्रेन को रोकने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।
- आईसीएफ कोच को हर दो लाख से चार लाख किलोमीटर चलने के बाद मेंटेनेंस पर आवश्यकता होती है।
- आईसीएफ कोच का साउंड लेबल 100 डेसीबल होता है।
- आईसीएफ कोच की स्पीड 70 से 140 किलोमीटर प्रति घंटा की होती है।
- पटरियों पर 90 प्रतिशत कोच आईसीएफ के दौड़ रहे हैं। आईसीएफ कोचों का निर्माण चेन्नई व एलएचबी कोचों का निर्माण कपूरथला, रायबरेली व चेन्नई की फैक्ट्री में होता है।
650 नहीं अब 675 वैगनों की होगी मरम्मत
रेलवे बोर्ड ने इस महीने से वैगन मरम्मत कारखाने लक्ष्य बढ़ा दिया है। कारखाने में हर माह अब 650 की जगह 660 वैगनों की मरम्मत होगी। यह लक्ष्य भारतीय रेलवे के सभी नौ वैगन वर्कशाप के आउट टर्न में सबसे अधिक है। इसी तरह कोच मरम्मत कारखाने में हर महीने अभी छह कोच तैयार करके निकाले जा रहे हैं।
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रेल दुर्घटना से बचाव के लिए डिब्बों में लगेंगे सेंट्रल बफर कप्लर
संरक्षा को लेकर उठाए जा रहे कड़े कदम
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
आने वाले दिनों में अगर कोई रेल हादसा हुआ तो कोच एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ेंगे। रेलवे बोर्ड ने संरक्षा को लेकर कड़े कदम उठाना शुरू कर दिए हैं। रेलवे वर्कशाप में मरम्मत के लिए आने वाले वैगन और सवारी डिब्बों में सेंट्रल बफर कप्लर लगाने की व्यवस्था शुरू कर दी गई है।
पुखरायां में हुए इंदौर-पटना एक्सप्रेस और मुजफ्फरनगर में उत्कल एक्सप्रेस जैसी बड़ी रेल दुर्घटनाओं के बाद सेे रेलवे सुरक्षा को लेकर बेहद सजग है। इंदौर-पटना एक्सप्रेस में आईसीएफ टाइप (पुरानी स्टाइल) के कोच लगे हुए थे, जो अधिक स्पीड में होने वाली दुर्घटनाओं को सहने की क्षमता नहीं रखते हैं। ऐसा ही हाल उत्कल एक्सप्रेस के कोचों का था। परिणामस्वरूप दुर्घटना होने पर उनके डिब्बे एक के ऊपर एक चढ़ गए। रेलवे बोर्ड ने तय किया है कि जिन भी ट्रेनों में अभी आईसीएफ (इंट्रीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई) कोच लगे हैं, उनमें सेंट्रल बफर कप्लर लगाए जाएंगे। अभी दो डिब्बों की कपलिंग के बीच एक लोहे की रॉड डाल दी जाती है। नई तकनीक की कपलिंग में डिब्बों के एक-दूसरे पर चढ़ने की संभावना कम होती है।
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‘मरम्मत के लिए आ रहे सवारी डिब्बों और मालगाड़ी के वैगन में सेंट्रल बफर कप्लर लगाना शुरू कर दिया है। संरक्षा के हर पहलू को ध्यान में रखकर डिब्बे तैयार किए जा रहे हैं।’
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आरडी मौर्या, मुख्य कारखाना प्रबंधक।
ये भी जानिये
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- आईसीएफ कोच माइल्ड स्टील के बने होते हैं जो इसके झटके सहने की क्षमता को कम करते हैं और दुर्घटना का कारण बनते हैं।
- आईसीएफ कोच में एयरब्रेक और थ्रेड सिस्टम होता है, जिससे चलती ट्रेन को रोकने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।
- आईसीएफ कोच को हर दो लाख से चार लाख किलोमीटर चलने के बाद मेंटेनेंस पर आवश्यकता होती है।
- आईसीएफ कोच का साउंड लेबल 100 डेसीबल होता है।
- आईसीएफ कोच की स्पीड 70 से 140 किलोमीटर प्रति घंटा की होती है।
- पटरियों पर 90 प्रतिशत कोच आईसीएफ के दौड़ रहे हैं। आईसीएफ कोचों का निर्माण चेन्नई व एलएचबी कोचों का निर्माण कपूरथला, रायबरेली व चेन्नई की फैक्ट्री में होता है।
650 नहीं अब 675 वैगनों की होगी मरम्मत
रेलवे बोर्ड ने इस महीने से वैगन मरम्मत कारखाने लक्ष्य बढ़ा दिया है। कारखाने में हर माह अब 650 की जगह 660 वैगनों की मरम्मत होगी। यह लक्ष्य भारतीय रेलवे के सभी नौ वैगन वर्कशाप के आउट टर्न में सबसे अधिक है। इसी तरह कोच मरम्मत कारखाने में हर महीने अभी छह कोच तैयार करके निकाले जा रहे हैं।