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मुस्लिम रमजान-Lalitpur
Updated Fri, 16 Jun 2017 08:19 PM IST
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हर दुआ कबूल करता है खुदा
सब हेड: माहे रमजान में अल्लाह की इबादत कर रहे मुस्लिम
क्रासर
- आखिरी अशराह शुरू, मस्जिदों में रुककर पांचों वक्त की नमाज अदा कर रहे रोजेदार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
रमजान पाक का आखिरी अशराह शुरू हो गया है। यह रमजान के 21 वीं रात से शुरू होता है। आखिरी अशराह में रोजेदार मस्जिदों में रुककर खुदा की इबादत करते है तथा पांचों वक्त की नमाज अदा कर दुआएं मांगते हैं। यह वह अवसर होता है, जब अल्लाह से मांगी गई हर दुआ कबूल होती है। मस्जिदों में तराबीह जारी है।
दोजख (नर्क) से मिलती है आजादी
आखिरी अशराह मेें रमजान की 21, 23, 25, 27 व 29 की राते शबे कदर है। इसमें रात को जागकर इबादत की जाती है। एक रात का शबाब एक हजार वर्ष की इबादत के बराबर है। इसमें जो भी अल्लाह से दुआ मांगी जाती है। वह कबूल होती है। पैगंबर साहब ने फरमाया है कि तीसरा अशराह में नर्क से आजादी मिलती है।
मुफ्ती साबिर कासमी
गुनाहों से दूर होता है इंसान
रमजान शरीफ में रोजा रखने से बहुत सी बीमारियां दूर होती है। व्यक्ति का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। गुनाहों से इंसान दूर होता है। रमजान में जकात निकालना चाहिए। दूसरों की मदद करना चाहिए। ताकि सभी ईद मनाए। पैगंबर साहब ने फरमाया है कि जो गरीबों की मदद करता है, अल्लाह उसके माल को बढ़ा देते है।
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मौलाना आमिल कासमी सदर जमीयत उलेमा हिंद
जिस्म के हर हिस्से का नाम रोजा है
रोजा रखने से इंसान में आत्म विश्वास बढ़ता है और ताकत बढ़ती है। रोजा का मतलब सिर्फ भूखा, प्यासा रहना नहीं है। जिस्म के हर हिस्से से रोजा रखा जाता है। आंख से गलत न देखे, कान से गलत न सुने, पैरों से गलत जगहों पर न जाए। हाथों को कमजोर पर न उठाएं यह भी रोजा है। प्रत्येक व्यक्ति खुदा से लगाव रखे।
मौलाना शाने हैदर जैदी
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हर दुआ कबूल करता है खुदा
सब हेड: माहे रमजान में अल्लाह की इबादत कर रहे मुस्लिम
क्रासर
- आखिरी अशराह शुरू, मस्जिदों में रुककर पांचों वक्त की नमाज अदा कर रहे रोजेदार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
रमजान पाक का आखिरी अशराह शुरू हो गया है। यह रमजान के 21 वीं रात से शुरू होता है। आखिरी अशराह में रोजेदार मस्जिदों में रुककर खुदा की इबादत करते है तथा पांचों वक्त की नमाज अदा कर दुआएं मांगते हैं। यह वह अवसर होता है, जब अल्लाह से मांगी गई हर दुआ कबूल होती है। मस्जिदों में तराबीह जारी है।
दोजख (नर्क) से मिलती है आजादी
आखिरी अशराह मेें रमजान की 21, 23, 25, 27 व 29 की राते शबे कदर है। इसमें रात को जागकर इबादत की जाती है। एक रात का शबाब एक हजार वर्ष की इबादत के बराबर है। इसमें जो भी अल्लाह से दुआ मांगी जाती है। वह कबूल होती है। पैगंबर साहब ने फरमाया है कि तीसरा अशराह में नर्क से आजादी मिलती है।
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मुफ्ती साबिर कासमी
गुनाहों से दूर होता है इंसान
रमजान शरीफ में रोजा रखने से बहुत सी बीमारियां दूर होती है। व्यक्ति का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। गुनाहों से इंसान दूर होता है। रमजान में जकात निकालना चाहिए। दूसरों की मदद करना चाहिए। ताकि सभी ईद मनाए। पैगंबर साहब ने फरमाया है कि जो गरीबों की मदद करता है, अल्लाह उसके माल को बढ़ा देते है।
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मौलाना आमिल कासमी सदर जमीयत उलेमा हिंद
जिस्म के हर हिस्से का नाम रोजा है
रोजा रखने से इंसान में आत्म विश्वास बढ़ता है और ताकत बढ़ती है। रोजा का मतलब सिर्फ भूखा, प्यासा रहना नहीं है। जिस्म के हर हिस्से से रोजा रखा जाता है। आंख से गलत न देखे, कान से गलत न सुने, पैरों से गलत जगहों पर न जाए। हाथों को कमजोर पर न उठाएं यह भी रोजा है। प्रत्येक व्यक्ति खुदा से लगाव रखे।
मौलाना शाने हैदर जैदी