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पानी न होने से 100 हेक्टेयर में नहीं हो सकी बुवाई
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झांसी। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी न होने से इस बार भी गरौठा, बंगरा, बामौर आदि इलाकों के किसानों को खेत खाली छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बुंदेलखंड के बड़े रकबे में बोवाई नहीं हुई। सिर्फ झांसी में ही करीब 100 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में किसान बुवाई नहीं कर सके।
भौगोलिक परिस्थितियों के लिहाज से बुंदेलखंड में बारिश सामान्य से कम होती है। पिछले कई मानसूनी सीजन में सामान्य बारिश तक नहीं हुई। ऐसे में सिंचाई साधनों के भरोसे रहना किसानों की मजबूरी है। खरीफ सीजन में भी नहरों से पानी देना पड़ता है जबकि रबी की पूरी फसल ही नहरों पर निर्भर है। बुंदेलखंड में गेहूं की चार सिंचाई करनी पड़ जाती है लेकिन, नहरों में पर्याप्त पानी न होने से सभी को पानी नहीं मिल पाता। फसल खराब होने के नुकसान से बचने को खेत खाली छोड़ देते हैं। आंकड़ों के मुताबिक जनपद के कुल क्षेत्रफल 501.327 में 362.099 हजार हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल कृषि उत्पादन के लिए होता है।
कृषि विभाग के हालिया आंकड़ों के मुताबिक खरीफ की फसल 272.171 हजार हेक्टेयर जबकि, रबी 349.911 हजार हेक्टेयर में बोई गई है। जायद की फसल जनपद में महज 3.315 हजार हेक्टेयर में ही बुवाई हुई। कृषि जानकारों का कहना है कुल करीब 102.116 हजार हेक्टेयर भूमि किसानों ने खाली छोड़ी हैं। वहीं, बेतवा नहर प्रखंड के अधिशासी अभियंता उमेश कुमार का कहना है नहरें अपनी क्षमता से अधिक इलाकों तक पानी पहुंचा रहीं हैं। बेतवा और पहूज को जितनी क्षमता के मुताबिक डिजाइन किया गया, वह उससे काफी अधिक पानी दे रही हैं।
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पंद्रह साल बाद भी सूखा ग्रस्त इलाकों तक नहीं पहुंची नहर
सूखा ग्रस्त इलाकों में गरौठा, बंगरा का बड़ा भू-भाग शुमार है लेकिन, पिछले पंद्रह वर्षों के दौरान यहां एक इंच भी नहर प्रणाली नहीं बढ़ी। इस वर्ष लखेरी बांध परियोजना जरूर आरंभ हुई लेकिन, उससे सूखाग्रस्त इलाकों को कोई मदद नहीं मिली। वहीं, गरौठा इलाके के लिए एरच बांध परियोजना आंरभ हुई लेकिन, भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने से परियोजना अधर में है। बता दें, अभी बेतवा नहर प्रणाली, पहूज नहर प्रणाली, गढ़मऊ, सपरार अल्पिका प्रणाली, गुरसराय नहर प्रणाली, बढ़वार नहर प्रणाली (बेतवा प्रखंड), रानीपुर, स्यावरी, मगरपुर, पचवारा, अड़जार, तैंदोल, कचनेव (सपरार प्रखंड), घुसगुवां, भरतपुरा, बरहेट, सिया पंप नहर, बड़ागांव (लघु डल नहर) के जरिए जनपद के खेतों को पानी दिया जाता है।
309.500 हजार हेक्टेयर में ही सिर्फ सिंचाई
सरकारी आकड़ों में सिर्फ 309.500 हजार हेक्टेयर इलाका ही सिंचित बताया गया है। यह कुल कृषि रकबे का 61 प्रतिशत है। शेष इलाके अभी तक प्यासे हैं। सरकारी आकड़ों में जिन इलाकों को सिंचित दिखाया गया उनमें भी टेल तक पानी कभी नहीं पहुंचता। सरकारी सिंचित इलाके में सैकड़ों हेक्टेयर जमीन नहरों से पानी नहीं पहुंचा।
जनपद में बारिश के आकड़े (मिमी में)
सामान्य बारिश 879
2014-15 542.77
2015-16 470.33
2016-17 561.11
2017-18 382.93
2018-19 710.17
2019-20 542.32
न्यूनतम उत्पादकता वाली न्याय पंचायतें
धमनाखुर्द, चंदवारी (चिरगांव), पूंछ (मोंठ), अंबाबाय (बड़ागांव), राजापुर, रक्सा (बबीना), उल्दन (बंगरा), रतौसा, चुरारा (मऊरानीपुर), धनौरा, ककरबई (बामौर), सिमरधा (गुरसराय)
सभी की फोटो है
1- कृपेंद्र प्रताप सिंह
निवासी पठा, ब्लॉक बंगरा
दो हेक्टयर जमीन पानी न मिलने से खाली पड़ी रहती है
2- पुष्पेंद्र सिंह
निवासी पठा ब्लॉक बंगरा
डेढ़ हेक्टयर जमीन में पानी न होने पर बोवाई नहीं हो सकी
3- कृष्णगोपाल
निवासी ककरबई, गरौठा
तीन हेक्टेयर जमीन खाली पड़ी है
4- मदारी प्रसाद
निवासी गोकुल, गरौठा
डेढ़ हेक्टेयर जमीन पर पानी न होने से नहीं करते खेती
5-पंचम अहिरवार
निवासी धनौरा
ढाई हेक्टेयर जमीन में सिंचाई सहुलियत न होने से नहीं बोई फसल
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भौगोलिक परिस्थितियों के लिहाज से बुंदेलखंड में बारिश सामान्य से कम होती है। पिछले कई मानसूनी सीजन में सामान्य बारिश तक नहीं हुई। ऐसे में सिंचाई साधनों के भरोसे रहना किसानों की मजबूरी है। खरीफ सीजन में भी नहरों से पानी देना पड़ता है जबकि रबी की पूरी फसल ही नहरों पर निर्भर है। बुंदेलखंड में गेहूं की चार सिंचाई करनी पड़ जाती है लेकिन, नहरों में पर्याप्त पानी न होने से सभी को पानी नहीं मिल पाता। फसल खराब होने के नुकसान से बचने को खेत खाली छोड़ देते हैं। आंकड़ों के मुताबिक जनपद के कुल क्षेत्रफल 501.327 में 362.099 हजार हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल कृषि उत्पादन के लिए होता है।
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कृषि विभाग के हालिया आंकड़ों के मुताबिक खरीफ की फसल 272.171 हजार हेक्टेयर जबकि, रबी 349.911 हजार हेक्टेयर में बोई गई है। जायद की फसल जनपद में महज 3.315 हजार हेक्टेयर में ही बुवाई हुई। कृषि जानकारों का कहना है कुल करीब 102.116 हजार हेक्टेयर भूमि किसानों ने खाली छोड़ी हैं। वहीं, बेतवा नहर प्रखंड के अधिशासी अभियंता उमेश कुमार का कहना है नहरें अपनी क्षमता से अधिक इलाकों तक पानी पहुंचा रहीं हैं। बेतवा और पहूज को जितनी क्षमता के मुताबिक डिजाइन किया गया, वह उससे काफी अधिक पानी दे रही हैं।
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पंद्रह साल बाद भी सूखा ग्रस्त इलाकों तक नहीं पहुंची नहर
सूखा ग्रस्त इलाकों में गरौठा, बंगरा का बड़ा भू-भाग शुमार है लेकिन, पिछले पंद्रह वर्षों के दौरान यहां एक इंच भी नहर प्रणाली नहीं बढ़ी। इस वर्ष लखेरी बांध परियोजना जरूर आरंभ हुई लेकिन, उससे सूखाग्रस्त इलाकों को कोई मदद नहीं मिली। वहीं, गरौठा इलाके के लिए एरच बांध परियोजना आंरभ हुई लेकिन, भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने से परियोजना अधर में है। बता दें, अभी बेतवा नहर प्रणाली, पहूज नहर प्रणाली, गढ़मऊ, सपरार अल्पिका प्रणाली, गुरसराय नहर प्रणाली, बढ़वार नहर प्रणाली (बेतवा प्रखंड), रानीपुर, स्यावरी, मगरपुर, पचवारा, अड़जार, तैंदोल, कचनेव (सपरार प्रखंड), घुसगुवां, भरतपुरा, बरहेट, सिया पंप नहर, बड़ागांव (लघु डल नहर) के जरिए जनपद के खेतों को पानी दिया जाता है।
309.500 हजार हेक्टेयर में ही सिर्फ सिंचाई
सरकारी आकड़ों में सिर्फ 309.500 हजार हेक्टेयर इलाका ही सिंचित बताया गया है। यह कुल कृषि रकबे का 61 प्रतिशत है। शेष इलाके अभी तक प्यासे हैं। सरकारी आकड़ों में जिन इलाकों को सिंचित दिखाया गया उनमें भी टेल तक पानी कभी नहीं पहुंचता। सरकारी सिंचित इलाके में सैकड़ों हेक्टेयर जमीन नहरों से पानी नहीं पहुंचा।
जनपद में बारिश के आकड़े (मिमी में)
सामान्य बारिश 879
2014-15 542.77
2015-16 470.33
2016-17 561.11
2017-18 382.93
2018-19 710.17
2019-20 542.32
न्यूनतम उत्पादकता वाली न्याय पंचायतें
धमनाखुर्द, चंदवारी (चिरगांव), पूंछ (मोंठ), अंबाबाय (बड़ागांव), राजापुर, रक्सा (बबीना), उल्दन (बंगरा), रतौसा, चुरारा (मऊरानीपुर), धनौरा, ककरबई (बामौर), सिमरधा (गुरसराय)
सभी की फोटो है
1- कृपेंद्र प्रताप सिंह
निवासी पठा, ब्लॉक बंगरा
दो हेक्टयर जमीन पानी न मिलने से खाली पड़ी रहती है
2- पुष्पेंद्र सिंह
निवासी पठा ब्लॉक बंगरा
डेढ़ हेक्टयर जमीन में पानी न होने पर बोवाई नहीं हो सकी
3- कृष्णगोपाल
निवासी ककरबई, गरौठा
तीन हेक्टेयर जमीन खाली पड़ी है
4- मदारी प्रसाद
निवासी गोकुल, गरौठा
डेढ़ हेक्टेयर जमीन पर पानी न होने से नहीं करते खेती
5-पंचम अहिरवार
निवासी धनौरा
ढाई हेक्टेयर जमीन में सिंचाई सहुलियत न होने से नहीं बोई फसल