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उरई मेडिकल कॉलेज की लापरवाही : गलत ब्लड ग्रुप बता मरीज की जान खतरे में डाली
Sat, 03 May 2025 12:54 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
Updated Sat, 03 May 2025 12:54 AM IST
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उरई। मेडिकल कॉलेज की एक गंभीर लापरवाही सामने आई है। दो दिन पहले भर्ती कराए गए मरीज का ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव बताया गया था। दो दिन तक ब्लड नहीं मिलने से परिजन मरीज को झांसी ले गए। निजी लैब में जांच कराई तो पता चला उसका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव है। परिजनों का आरोप है कि उरई मेडिकल कॉलेज में जानलेवा लापरवाही बरती गई। यदि मरीज को उनके बताए गए ब्लड ग्रुप का रक्त चढ़ा दिया जाता तो उसकी जान जा सकती थी।
हमीरपुर जिले के राठ कसबे के रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नगर कार्यवाह प्रदीप सिंह के डेढ़ वर्षीय भतीजे अमोघ की तबीयत बिगड़ने पर परिजनों ने 29 अप्रैल को मेडिकल कॉलेज उरई में भर्ती कराया। मासूम के रक्त में संक्रमण और हीमोग्लोबिन 5.8 पहुंचने की बात कहकर डॉक्टरों ने भर्ती कर लिया। खून चढ़ाने से पहले अमोघ का रक्त सैंपल लिया गया। लैब में जांच के बाद बताया गया कि अमोघ का ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव है। इसी ग्रुप का रक्त उसे चढ़ाया जाएगा।
इसके बाद परिजन एबी निगेटिव खून की तलाश करने लगे। दो दिन तक परिजन भटकते रहे, लेकिन न तो किसी डोनर की व्यवस्था हो पाई न ही इस ग्रुप का ब्लड मिला। इधर, बच्चे की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टरों का कहना था कि खून की व्यवस्था जल्दी करनी पड़ेगी। रक्त नहीं चढ़ाया गया तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।
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बच्चे की हालत को देखते हुए परिजनों ने उसे मेडिकल कॉलेज से झांसी के लिए रेफर करा लिया। झांसी में निजी अस्पताल की लैब में उसके ब्लड की जांच कराई गई तो ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव की जगह ओ निगेटिव निकला। ब्लड ग्रुप में परिवर्तन होने पर परिजन परेशान हो गए। उन्होंने दोबारा से जांच कराई तो ब्लड ग्रुप फिर ओ नेगेटिव ही निकला।
झांसी के एक निजी अस्पताल में बच्चे का इलाज चल रहा है। अब वह स्वस्थ है, लेकिन परिजनों में उरई मेडिकल कॉलेज के प्रति आक्रोश है। उनका कहना है कि गनीमत रही कि उन्हें ब्लड नहीं मिला, यदि मिल जाता तो गलत ग्रुप का ब्लड चढ़ाने से बच्चे की जान चली जाती। परिजनों ने कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
वहीं, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य अरविंद्र त्रिवेदी का कहना है कि टेक्निकल समस्या हो सकती है। कई बार इस तरीके की समस्या हो जाती है। प्राचार्य मामले को बेहद हल्के में ले रहे हैं। वह जांच कराने की बात भी नहीं कर रहे हैं। इससे परिजनों में रोष है।
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ट्रेनी छात्र ले रहे सैंपल, जांच करने वाले बातचीत में व्यस्त
मरीज के ब्लड ग्रुप की गलत रिपोर्ट देने के मामले में जब शुक्रवार को लैब की जांच-पड़ताल की गई तो चौकाने वाली हकीकत सामने आई। लैब में मरीजों का सैंपल लेने के लिए ट्रेनी छात्रों को लगाया गया था। वह खून लेने के लिए कई बार मरीज को इंजेक्शन लगा रहे थे, तब कहीं जाकर ब्लड निकाल पा रहे थे। वहीं, लैब में तैनात कर्मचारी आपस में बातचीत करने में ही व्यस्त थे। वह यह भी नहीं देख रहे थे कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है। एक कर्मचारी एक घंटे से फोन पर बात करने में ही व्यस्त रहा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लैब में कितनी गंभीरता से जांच की जा रही है।
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उरई मेडिकल कॉलेज की लैब में जांच के बाद मेरे भतीजे का ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव बताया गया। बाद में झांसी की निजी लैब में दो बार जांच कराई गई तो उसका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव निकला। यदि उरई मेडिकल कॉलेज में भतीजे को खून चढ़ा दिया जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। ऐसी लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
- प्रदीप सिंह, बीमार बच्चे के चाचा और संघ के कार्यकर्ता।
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हमीरपुर जिले के राठ कसबे के रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नगर कार्यवाह प्रदीप सिंह के डेढ़ वर्षीय भतीजे अमोघ की तबीयत बिगड़ने पर परिजनों ने 29 अप्रैल को मेडिकल कॉलेज उरई में भर्ती कराया। मासूम के रक्त में संक्रमण और हीमोग्लोबिन 5.8 पहुंचने की बात कहकर डॉक्टरों ने भर्ती कर लिया। खून चढ़ाने से पहले अमोघ का रक्त सैंपल लिया गया। लैब में जांच के बाद बताया गया कि अमोघ का ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव है। इसी ग्रुप का रक्त उसे चढ़ाया जाएगा।
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इसके बाद परिजन एबी निगेटिव खून की तलाश करने लगे। दो दिन तक परिजन भटकते रहे, लेकिन न तो किसी डोनर की व्यवस्था हो पाई न ही इस ग्रुप का ब्लड मिला। इधर, बच्चे की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टरों का कहना था कि खून की व्यवस्था जल्दी करनी पड़ेगी। रक्त नहीं चढ़ाया गया तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।
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बच्चे की हालत को देखते हुए परिजनों ने उसे मेडिकल कॉलेज से झांसी के लिए रेफर करा लिया। झांसी में निजी अस्पताल की लैब में उसके ब्लड की जांच कराई गई तो ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव की जगह ओ निगेटिव निकला। ब्लड ग्रुप में परिवर्तन होने पर परिजन परेशान हो गए। उन्होंने दोबारा से जांच कराई तो ब्लड ग्रुप फिर ओ नेगेटिव ही निकला।
झांसी के एक निजी अस्पताल में बच्चे का इलाज चल रहा है। अब वह स्वस्थ है, लेकिन परिजनों में उरई मेडिकल कॉलेज के प्रति आक्रोश है। उनका कहना है कि गनीमत रही कि उन्हें ब्लड नहीं मिला, यदि मिल जाता तो गलत ग्रुप का ब्लड चढ़ाने से बच्चे की जान चली जाती। परिजनों ने कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
वहीं, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य अरविंद्र त्रिवेदी का कहना है कि टेक्निकल समस्या हो सकती है। कई बार इस तरीके की समस्या हो जाती है। प्राचार्य मामले को बेहद हल्के में ले रहे हैं। वह जांच कराने की बात भी नहीं कर रहे हैं। इससे परिजनों में रोष है।
ट्रेनी छात्र ले रहे सैंपल, जांच करने वाले बातचीत में व्यस्त
मरीज के ब्लड ग्रुप की गलत रिपोर्ट देने के मामले में जब शुक्रवार को लैब की जांच-पड़ताल की गई तो चौकाने वाली हकीकत सामने आई। लैब में मरीजों का सैंपल लेने के लिए ट्रेनी छात्रों को लगाया गया था। वह खून लेने के लिए कई बार मरीज को इंजेक्शन लगा रहे थे, तब कहीं जाकर ब्लड निकाल पा रहे थे। वहीं, लैब में तैनात कर्मचारी आपस में बातचीत करने में ही व्यस्त थे। वह यह भी नहीं देख रहे थे कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है। एक कर्मचारी एक घंटे से फोन पर बात करने में ही व्यस्त रहा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लैब में कितनी गंभीरता से जांच की जा रही है।
उरई मेडिकल कॉलेज की लैब में जांच के बाद मेरे भतीजे का ब्लड ग्रुप एबी निगेटिव बताया गया। बाद में झांसी की निजी लैब में दो बार जांच कराई गई तो उसका ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव निकला। यदि उरई मेडिकल कॉलेज में भतीजे को खून चढ़ा दिया जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। ऐसी लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
- प्रदीप सिंह, बीमार बच्चे के चाचा और संघ के कार्यकर्ता।