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‘घास की रोटी’ पर गरमाई सियासत
ब्यूरो/ अमर उजाला, उरई
Updated Sat, 28 Nov 2015 11:07 PM IST
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पिछले दिनों दिए गए आप के पूर्व नेता योगेंद्र यादव व अन्य नेताओं के बयान
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ने बुंदेलखंड का सियासी पारा चढ़ा दिया है। बुंदेलखंड में इसकी चारों ओर
भर्त्सना हो रही है। वहीं, शुक्रवार को सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के पूर्व
सांसद घनश्याम अनुरागी ने बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस कर आप नेताओं व
बुंदेलखंड में काम कर रही एनजीओ को निशाने पर लिया। उन्होंने
सीधे तौर पर संबंधित एनजीओ की जांच की मांग कर डाली है। पूर्व सांसद ने बयान को बुंदेलखंड की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वाला बताया है। कहा है कि किसान सूखे से परेशान जरूर है लेकिन वह घास की रोटी नहीं खा रहा। प्रदेश सरकार ने सूखा पीड़ित लोगों की पहचान कर उनके लिए मुआवजा राशि भी घोषित कर दी है। एनजीओ के दबाव में दिया
गया यह बयान निराधार है। जालौन और बुंदेलखंड के कई जिलों में काम कर रही एनजीओ पर निशाना साधा। कहा कि इस संस्था ने भी आप नेताओं के साथ मिलीभगत कर केंद्र और राज्य सरकार को जो रिपोर्ट भेजी है, वह पूरी तरह गलत है। कहा कि राज्य सरकार के सहयोग से जल्द ही संस्था की सोशल आडिट कराया जाएगा।
वर्जन
‘परमार्थ’ का सूखे की रिपोर्ट से कुछ लेना देना नहीं है। यह रिपोर्ट स्वराज अभियान की ओर से बनाई गई है जिसके लिए सर्वे खुद योगेद्र यादव व प्रशांत भूषण ने करवाया है। जब इसका प्रपत्र जारी हुआ तो मैं वहां नहीं था और न ही इस रिपोर्ट से मेरा कुछ भी लेना देना है। मुझे बेवजह इन सब बातों में घसीटा जा रहा है।
संजय सिंह, संचालक, परमार्थ संस्था
बुंदेलखंड का किसान खुद सक्षम
घास की रोटी के सवाल पर अब कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी ने कहा कि बुंदेलखंड का किसान खुद में सक्षम है। हमारा इतिहास छह हजार वर्षों का है। सूखे से किसान परेशान
जरूर है और इसके लिए पार्टी जमीनी स्तर पर संघर्ष भी कर रही है। किसानों को मुआवजे की भी मांग की जा रही है। किसान इसमें खुद भी आगे आकर संघर्ष कर रहे हैं। पर यह कहना कि यहां के 108 गांवों के किसान घास की रोटी खा रहे हैं, पूरी तरह गलत है।
कई अन्य संगठन भी कूदे मैदान में
मामले को लेकर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बलराम लंबरदार ने कहा कि बुंदेलखंड का किसान सूखे की मार से परेशान है। उसे सरकारी सहायता भी मिलनी चाहिए लेकिन यहां कोई किसान घास की रोटी नहीं खा रहा है। किसान नेता राजवीर सिंह जादौन ने कहा कि यह सब नेतागिरी का खेल है। बुंदेलखंड में इन कथित सामाजिक संगठनाें ने कब और कहा सर्वे कर लिया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है।
क्या है मामला
वास्तव में घास की रोटी खाने का मामला ललितपुर की सहरिया जनजाति से जुड़ा है। इस जनजाति के लोग एक विशेष समाई घास के बीजों को पीसकर रोटी बनाते हैं। सहरिया जनजाति के लोग जालौन के रामपुरा बीहड़ क्षेत्रों में भी पाए जाते
हैं। इसके अलावा ये ललितपुर के मडावरा व जाखलौन ब्लाक में विशेष तौर से पाए जाते हैं। सहरिया जन अधिकार मंच की संयोजिका लच्छी सहरिया ने बताया कि जनजाति सदियों से इस घास के बीज का प्रयोग कर रही है। उसका बुंदेलखंड के सूखे से कुछ लेना देना नहीं।
सीधे तौर पर संबंधित एनजीओ की जांच की मांग कर डाली है। पूर्व सांसद ने बयान को बुंदेलखंड की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वाला बताया है। कहा है कि किसान सूखे से परेशान जरूर है लेकिन वह घास की रोटी नहीं खा रहा। प्रदेश सरकार ने सूखा पीड़ित लोगों की पहचान कर उनके लिए मुआवजा राशि भी घोषित कर दी है। एनजीओ के दबाव में दिया
गया यह बयान निराधार है। जालौन और बुंदेलखंड के कई जिलों में काम कर रही एनजीओ पर निशाना साधा। कहा कि इस संस्था ने भी आप नेताओं के साथ मिलीभगत कर केंद्र और राज्य सरकार को जो रिपोर्ट भेजी है, वह पूरी तरह गलत है। कहा कि राज्य सरकार के सहयोग से जल्द ही संस्था की सोशल आडिट कराया जाएगा।
वर्जन
‘परमार्थ’ का सूखे की रिपोर्ट से कुछ लेना देना नहीं है। यह रिपोर्ट स्वराज अभियान की ओर से बनाई गई है जिसके लिए सर्वे खुद योगेद्र यादव व प्रशांत भूषण ने करवाया है। जब इसका प्रपत्र जारी हुआ तो मैं वहां नहीं था और न ही इस रिपोर्ट से मेरा कुछ भी लेना देना है। मुझे बेवजह इन सब बातों में घसीटा जा रहा है।
संजय सिंह, संचालक, परमार्थ संस्था
बुंदेलखंड का किसान खुद सक्षम
घास की रोटी के सवाल पर अब कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी ने कहा कि बुंदेलखंड का किसान खुद में सक्षम है। हमारा इतिहास छह हजार वर्षों का है। सूखे से किसान परेशान
जरूर है और इसके लिए पार्टी जमीनी स्तर पर संघर्ष भी कर रही है। किसानों को मुआवजे की भी मांग की जा रही है। किसान इसमें खुद भी आगे आकर संघर्ष कर रहे हैं। पर यह कहना कि यहां के 108 गांवों के किसान घास की रोटी खा रहे हैं, पूरी तरह गलत है।
कई अन्य संगठन भी कूदे मैदान में
मामले को लेकर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बलराम लंबरदार ने कहा कि बुंदेलखंड का किसान सूखे की मार से परेशान है। उसे सरकारी सहायता भी मिलनी चाहिए लेकिन यहां कोई किसान घास की रोटी नहीं खा रहा है। किसान नेता राजवीर सिंह जादौन ने कहा कि यह सब नेतागिरी का खेल है। बुंदेलखंड में इन कथित सामाजिक संगठनाें ने कब और कहा सर्वे कर लिया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है।
क्या है मामला
वास्तव में घास की रोटी खाने का मामला ललितपुर की सहरिया जनजाति से जुड़ा है। इस जनजाति के लोग एक विशेष समाई घास के बीजों को पीसकर रोटी बनाते हैं। सहरिया जनजाति के लोग जालौन के रामपुरा बीहड़ क्षेत्रों में भी पाए जाते
हैं। इसके अलावा ये ललितपुर के मडावरा व जाखलौन ब्लाक में विशेष तौर से पाए जाते हैं। सहरिया जन अधिकार मंच की संयोजिका लच्छी सहरिया ने बताया कि जनजाति सदियों से इस घास के बीज का प्रयोग कर रही है। उसका बुंदेलखंड के सूखे से कुछ लेना देना नहीं।