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Jalaun News: सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा न मिलने से किसानों में नाराजगी
Sat, 21 Dec 2024 12:21 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
Updated Sat, 21 Dec 2024 12:21 AM IST
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मुहम्मदाबाद। डिफेंस कॉरिडोर में शामिल जमीन का मालियत यानी सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा न मिलने से करीब चालीस किसान नाराज हैं। किसानों के रजिस्ट्री न करने से काम में देरी हो रही है। इसको लेकर शुक्रवार को डीएम डकोर ब्लाक परिसर में पहुंचे और किसानों से बात कर चार सदस्यीय टीम बनाकर मामले को जल्द से जल्द निस्तारित करने के आदेश दिए।
लखनऊ में आयोजित यूपी इन्वेस्टर्स समिट में उत्तर प्रदेश को डिफेंस कॉरिडोर परियोजना का तोहफा देने की घोषणा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य रक्षा उत्पादों के कल-कारखानों के जरिए पिछड़े बुंदेलखंड के विकास को रफ्तार देना था। इसमें जालौन जिले को भी शामिल किया गया था। इस पर जिले के डकोर ब्लाक के तीन गांवों के किसानों की करीब 70.66 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण होना था।
इसमें कुसमिलिया, डकोर व टिमरों गांवों के 500 किसान शामिल थे। लेकिन सड़क किनारे जमीन पड़ने वाले किसान उचित मुआवजा न मिलने से नाराज हैं। इसे लेकर कई बार अधिकारी उनके साथ बैठक कर चुके हैं। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। काम में हो रही देरी को लेकर शुक्रवार को डीएम राजेश कुमार पांडेय, एडीएम संजय कुमार के साथ डकोर ब्लाक पहुंचे और उन्होंने ऐसे 40 किसानों से बात की, जिन्होंने अभी तक रजिस्ट्री नहीं की है।
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किसान शैलेंद्र कुमार यादव, मूलचंद्र राजपूत, लालाराम, गोविंद सिंह, बलवान, ओम प्रकाश, बादाम सिंह, ब्रजेंद्र सिंह, राजकुमार, मानवेंद्र, मजबूत, रमाकांत आदि ने डीएम से कहा कि जब तक हम लोगों को मालियत के हिसाब से मुआवजा नहीं मिलेगा। तब तक हम लोग रजिस्ट्री नहीं करेंगे। कहा कि उनकी जमीनें सड़क किनारे हैं, एक हेक्टेयर की कीमत 1 करोड़ से अधिक है। लेकिन सरकारी रेट में उन्हें केवल 66 लाख रुपये ही दिया जा रहा है। इसलिए वह घाटे में अपनी जमीन नहीं देंगे।
किसानों के अपनी बात पर अड़ जाने पर डीएम ने एडीएम संजय कुमार, एसडीएम नेहा ब्याडबाल, तहसीलदार शेर बहादुर सिंह व सब रजिस्ट्रार कल्पना अवस्थी की चार सदस्यीय टीम बनाई। टीम अब किसानों से संवाद कर उनकी जमीनों का उचित मुआवजा दिलवाकर अधिग्रहण करवाएगी।
इस दौरान नायब तहसीलदार राकेश सक्सेना, क्षेत्रीय लेखपाल डकोर अमित कुमार, लेखपाल रोहित पटेल, टिमरों लेखपाल रौनक शर्मा, कानूनगो रामराज राजपूत, एडीओ पंचायत बलवीर सिंह, एडीओ रमेश चंद्र उदैनिया, ग्राम प्रधान सोनू यादव, कोतवाल शशिकांत चौहान आदि मौजूद रहे।
सड़क किनारे जमीन होने से ज्यादा है कीमत
कुसमिलिया गांव निवासी किसान मूलचंद्र राजपूत ने बताया कि कॉरिडोर में उनकी जमीन ली गई है। लेकिन उनके खेत में कुआं बोरिंग, शौचालय, हैंडपंप आदि का प्रशासन की ओर से कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। इसके साथ ही तीन माह होने के बाद भी अभी किसी भी किसान को मुआवजा नहीं मिला है। डकोर निवासी किसान शैलेंद्र कुमार का कहना है कि 40 किसानों की सड़क किनारे जमीन है। अगर देखा जाए तो एक हेक्टेयर जमीन की कीमत करोड़ों रुपये है, लेकिन सरकारी मालियत में उन्हें जमीन का कम मुआवजा दिया जा रहा है। कहा, जितना मुआवजा मिल रहा है। उतने में वह अपनी अधिग्रहण जमीन के बराबर भी नहीं खरीद पा रहे हैं।
जानें क्या होती है मालियत
वर्तमान में मालियत का मतलब जमीन का सर्किल रेट से है। यह किसी भी जमीन का सरकार द्वारा तय किया गया एक न्यूनतम वास्तविक मूल्य होता है। जब जमीन की खरीद बिक्री होती है। तब इसी सर्किल रेट के आधार पर क्रेता को जमीन खरीदते समय रजिस्ट्री चार्ज और स्टाम्प ड्यूटी शुल्क का भुगतान करना पड़ता है।
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लखनऊ में आयोजित यूपी इन्वेस्टर्स समिट में उत्तर प्रदेश को डिफेंस कॉरिडोर परियोजना का तोहफा देने की घोषणा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य रक्षा उत्पादों के कल-कारखानों के जरिए पिछड़े बुंदेलखंड के विकास को रफ्तार देना था। इसमें जालौन जिले को भी शामिल किया गया था। इस पर जिले के डकोर ब्लाक के तीन गांवों के किसानों की करीब 70.66 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण होना था।
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इसमें कुसमिलिया, डकोर व टिमरों गांवों के 500 किसान शामिल थे। लेकिन सड़क किनारे जमीन पड़ने वाले किसान उचित मुआवजा न मिलने से नाराज हैं। इसे लेकर कई बार अधिकारी उनके साथ बैठक कर चुके हैं। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। काम में हो रही देरी को लेकर शुक्रवार को डीएम राजेश कुमार पांडेय, एडीएम संजय कुमार के साथ डकोर ब्लाक पहुंचे और उन्होंने ऐसे 40 किसानों से बात की, जिन्होंने अभी तक रजिस्ट्री नहीं की है।
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किसान शैलेंद्र कुमार यादव, मूलचंद्र राजपूत, लालाराम, गोविंद सिंह, बलवान, ओम प्रकाश, बादाम सिंह, ब्रजेंद्र सिंह, राजकुमार, मानवेंद्र, मजबूत, रमाकांत आदि ने डीएम से कहा कि जब तक हम लोगों को मालियत के हिसाब से मुआवजा नहीं मिलेगा। तब तक हम लोग रजिस्ट्री नहीं करेंगे। कहा कि उनकी जमीनें सड़क किनारे हैं, एक हेक्टेयर की कीमत 1 करोड़ से अधिक है। लेकिन सरकारी रेट में उन्हें केवल 66 लाख रुपये ही दिया जा रहा है। इसलिए वह घाटे में अपनी जमीन नहीं देंगे।
किसानों के अपनी बात पर अड़ जाने पर डीएम ने एडीएम संजय कुमार, एसडीएम नेहा ब्याडबाल, तहसीलदार शेर बहादुर सिंह व सब रजिस्ट्रार कल्पना अवस्थी की चार सदस्यीय टीम बनाई। टीम अब किसानों से संवाद कर उनकी जमीनों का उचित मुआवजा दिलवाकर अधिग्रहण करवाएगी।
इस दौरान नायब तहसीलदार राकेश सक्सेना, क्षेत्रीय लेखपाल डकोर अमित कुमार, लेखपाल रोहित पटेल, टिमरों लेखपाल रौनक शर्मा, कानूनगो रामराज राजपूत, एडीओ पंचायत बलवीर सिंह, एडीओ रमेश चंद्र उदैनिया, ग्राम प्रधान सोनू यादव, कोतवाल शशिकांत चौहान आदि मौजूद रहे।
सड़क किनारे जमीन होने से ज्यादा है कीमत
कुसमिलिया गांव निवासी किसान मूलचंद्र राजपूत ने बताया कि कॉरिडोर में उनकी जमीन ली गई है। लेकिन उनके खेत में कुआं बोरिंग, शौचालय, हैंडपंप आदि का प्रशासन की ओर से कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। इसके साथ ही तीन माह होने के बाद भी अभी किसी भी किसान को मुआवजा नहीं मिला है। डकोर निवासी किसान शैलेंद्र कुमार का कहना है कि 40 किसानों की सड़क किनारे जमीन है। अगर देखा जाए तो एक हेक्टेयर जमीन की कीमत करोड़ों रुपये है, लेकिन सरकारी मालियत में उन्हें जमीन का कम मुआवजा दिया जा रहा है। कहा, जितना मुआवजा मिल रहा है। उतने में वह अपनी अधिग्रहण जमीन के बराबर भी नहीं खरीद पा रहे हैं।
जानें क्या होती है मालियत
वर्तमान में मालियत का मतलब जमीन का सर्किल रेट से है। यह किसी भी जमीन का सरकार द्वारा तय किया गया एक न्यूनतम वास्तविक मूल्य होता है। जब जमीन की खरीद बिक्री होती है। तब इसी सर्किल रेट के आधार पर क्रेता को जमीन खरीदते समय रजिस्ट्री चार्ज और स्टाम्प ड्यूटी शुल्क का भुगतान करना पड़ता है।