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सुरेश चतुर्वेदी ने बृजभाषा काव्य को बड़े मंचों पर किया स्थापित
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हिंदी की अनेक बोलियां यानी उपभाषाएं प्रचलित हैं, जो उसका मान बढ़ाती हैं। इनमें से कुछ बोलियों में उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है, जिनमें ब्रजभाषा भी शामिल है। ब्रजभाषा के उन्नयन के क्षेत्र में हाथरस नगर के जिन लोगों ने काम किया है, उनमें सुरेश चतुर्वेदी प्रमुख रहे हैं। हाथरस नगर की चौबे वाली गली के रहने वाले कवि सुरेश जी का जन्म धार्मिक विद्वान परिवार में तीन नवंबर 1941 को हुआ था। उन्होंने ब्रजभाषा काव्य को बड़े मंचों पर स्थापित करने के लिए तो अपनी ऊर्जा लगाई ही, साथ ही साथ खड़ी बोली से भी उनका गहरा नाता रहा है। ब्रजभाषा काव्य रचना मंदिर के समर्पित पुजारी कवि सुरेश चतुर्वेदी की सोच ब्रज कविता, संगीत, संस्कृति और कला को पुनर्जीवित करके उसमें नयापन भरने की थी।
उन्होंने ब्रजभाषा कविता को छंदों के अतिरिक्त सरल लोकभाषा के गीतों में परोसा। बृज कला केंद्र, साहित्य संगम, काका हाथरसी ब्रज मेला, आकाशवाणी मथुरा-वृंदावन केंद्र से जुड़कर उन्होंने ब्रज क्षेत्र की आंचलिक भाषा ब्रजभाषा की अनेकानेक तरीकों से सेवा की। हाथरस के प्रसिद्ध लक्खी मेला श्रीदाऊजी महाराज के मंच पर ब्रजभाषा कवि सम्मेलन कराने की नींव रखी और लगातार 30 वर्षों तक इसका संयोजकीय दायित्व भी निभाया। उन्होंने अलीगढ़ की नुमाइश में भी वर्ष 1995 में अपने संयोजकत्व में ब्रजभाषा कवि सम्मेलन कराया था। कवि सुरेशजी को संपादकीय कार्यों में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने संगीत शिरोमणि पं. नथाराम गौड़ स्मृति ग्रंथ, मेला श्रीदाऊजी महाराज हाथरस की हीरक जयंती स्मारिका, कवि श्यामबाबा के कविता संग्रह श्याम सरोवर, इंदिरा शर्मा स्मारिका, ब्रजभाषा कवि सम्मेलनों की स्मारिका आदि का संपादन किया।
समय-समय पर उनके लेख तथा रचनाएं विभिन्न समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते थे, जो लोगों का मार्गदर्शन करते थे। हिंदी और हिंदी की बोली ब्रजभाषा के लिए की गई इन सेवाओं के लिए कवि सुरेश जी अनेक मंचों पर अनेकों बार सम्मानित हुए और उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर काका हाथरसी ब्रजभाषा पुरस्कार भी पाया। साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन में भी उनकी गहरी रुचि रहती थी और वे सहज भाव से इनका दायित्व निभाते थे। कवि सुरेश चतुर्वेदी का निधन 26 नवंबर 1996 को हुआ। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ब्रजभाषा काव्य तथा खड़ी बोली की उनकी रचनाएं आज भी आमजन में चेतना जगा रही हैं। उनके निधन के बाद उनके दो काव्य संग्रह ‘गीत गुंजन’ तथा ‘नन्हा फूल गुलाब’ प्रकाशित हुए हैं। हिंदी की सेवा के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया। हिंदी की वंदना करते हुए कवि सुरेश जी कहा करते थे कि--
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‘हम सौ सौ बार कृतज्ञ धन्य, करके अभिनंदन हिंदी का।
हम कोटि कोटि शत कोटि बार, करते हैं वंदन हिंदी का।।
प्रस्तुति - गिर्राज किशोर वशिष्ठ, रिटायर्ड प्रवक्ता हिंदी, सरस्वती इंटर कॉलेज, हाथरस।
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उन्होंने ब्रजभाषा कविता को छंदों के अतिरिक्त सरल लोकभाषा के गीतों में परोसा। बृज कला केंद्र, साहित्य संगम, काका हाथरसी ब्रज मेला, आकाशवाणी मथुरा-वृंदावन केंद्र से जुड़कर उन्होंने ब्रज क्षेत्र की आंचलिक भाषा ब्रजभाषा की अनेकानेक तरीकों से सेवा की। हाथरस के प्रसिद्ध लक्खी मेला श्रीदाऊजी महाराज के मंच पर ब्रजभाषा कवि सम्मेलन कराने की नींव रखी और लगातार 30 वर्षों तक इसका संयोजकीय दायित्व भी निभाया। उन्होंने अलीगढ़ की नुमाइश में भी वर्ष 1995 में अपने संयोजकत्व में ब्रजभाषा कवि सम्मेलन कराया था। कवि सुरेशजी को संपादकीय कार्यों में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने संगीत शिरोमणि पं. नथाराम गौड़ स्मृति ग्रंथ, मेला श्रीदाऊजी महाराज हाथरस की हीरक जयंती स्मारिका, कवि श्यामबाबा के कविता संग्रह श्याम सरोवर, इंदिरा शर्मा स्मारिका, ब्रजभाषा कवि सम्मेलनों की स्मारिका आदि का संपादन किया।
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समय-समय पर उनके लेख तथा रचनाएं विभिन्न समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते थे, जो लोगों का मार्गदर्शन करते थे। हिंदी और हिंदी की बोली ब्रजभाषा के लिए की गई इन सेवाओं के लिए कवि सुरेश जी अनेक मंचों पर अनेकों बार सम्मानित हुए और उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर काका हाथरसी ब्रजभाषा पुरस्कार भी पाया। साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन में भी उनकी गहरी रुचि रहती थी और वे सहज भाव से इनका दायित्व निभाते थे। कवि सुरेश चतुर्वेदी का निधन 26 नवंबर 1996 को हुआ। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ब्रजभाषा काव्य तथा खड़ी बोली की उनकी रचनाएं आज भी आमजन में चेतना जगा रही हैं। उनके निधन के बाद उनके दो काव्य संग्रह ‘गीत गुंजन’ तथा ‘नन्हा फूल गुलाब’ प्रकाशित हुए हैं। हिंदी की सेवा के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया। हिंदी की वंदना करते हुए कवि सुरेश जी कहा करते थे कि--
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हम कोटि कोटि शत कोटि बार, करते हैं वंदन हिंदी का।।
प्रस्तुति - गिर्राज किशोर वशिष्ठ, रिटायर्ड प्रवक्ता हिंदी, सरस्वती इंटर कॉलेज, हाथरस।