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बसपा का मोहरा बदलने से सत्तापक्ष की खिली बांछें
अमर उजाला ब्यूूराे/हाथ्ारस
Updated Fri, 01 Jan 2016 11:14 PM IST
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जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए दो ही नामांकन होने के बाद अब यह तय हो गया है कि जिले में यह मुकाबला बसपा बनाम अन्य दल होने जा रहा है। बदला है तो सिर्फ बसपा का मोहरा। रामेश्वर उपाध्याय की जगह अब विनोद उपाध्याय बसपा खेमे के योद्धा होंगे, जबकि सत्तापक्ष और अन्य दलों की तरफ से ओमवती यादव मैदान में हैं। बसपा का मोहरा बदलने से सत्तापक्ष में जश्न का माहौल दिख रहा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने नतीजे से पहले ही आधी लड़ाई जीत ली है।
सत्तापक्ष को उम्मीद है कि ऐनवक्त पर बसपा का यह कदम उसके बहुमत में फूट डाल सकता है। ऐसे में उसे उन सदस्यों का समर्थन हासिल करने में आसानी हो सकती है, जोकि रामेश्वर उपाध्याय के खासमखास समझे जाते हैं और अध्यक्ष पद के लिए उनकी दावेदारी के नाम पर सदस्य का चुनाव जीतकर आए हैं, लेकिन बसपा को उम्मीद है कि प्रत्याशी बदलने के बावजूद उसके बहुमत पर कोई खतरा नहीं है। उसके सभी सदस्य उनके अधिकृत प्रत्याशी के लिए ही वोट करेंगे मगर सत्तापक्ष ने इस मौके का फायदा उठाने के लिए बसपा के बहुमत में सेंधमारी की कोशिश तेज कर दी है। अब भेदियों के जरिए सत्तापक्ष के दिग्गज बसपा के उन सदस्यों तक पहुंचने की जुगत भिड़ा रहे हैं, जोकि जीतने के बाद से ही अंडरग्राउंड चल रहे हैं। भेदियों से उनका पता जानने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनसे तार जोड़े जा सकें।
बदलाव का फायदा उठाने को तैयार सपा
बहुमत के लिए करो या मरो की चुनौती से जूझ रहे सत्तापक्ष के लिए यह मौका वाकई बेहद अहम बन गया है। उसके पास बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए अब सिर्फ पांच दिन बाकी रह गए हैं। 11 सदस्य पहले से ही सत्तापक्ष के कब्जे में हैं। अब अध्यक्ष बनने के लिए उसे केवल दो सदस्यों की दरकार है, जिन्हें वह बसपा में फूट डालकर हासिल करना चाहता है। अगर सत्तापक्ष की कोशिश कामयाब नहीं हुई तो अध्यक्षी के लिए उसकी अब तक की भागदौड़ पर पानी फिर जाएगा।
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बसपा ने और मजबूत की किलेबंदी
प्रत्याशी बदलने के बाद बसपा खेमे के सामने भी सत्तापक्ष की चालों को मात देने की चुनौती है। उन्हें डर है कि कहीं सत्तापक्ष इस बदलाव की आड़ में उनके सदस्यों को बरगलाने में कामयाब नहीं हो जाए। यही वजह है कि अब उसके दिग्गजों ने अपने सदस्यों किलेबंदी और मजबूत कर दी है, ताकि सत्तापक्ष का कोई भी तीर उनकी सुरक्षा को नहीं भेद सके।
सत्तापक्ष के अगले कदम पर नजर
सियासत में अब यह सवाल अहम हो गया है कि चुनाव तक बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए सत्तापक्ष क्या कमाल करने वाला है। राजनीतिक दलों की ही नहीं, बल्कि आम-ओ-खास की नजर भी उसके अगले कदम पर है। सत्तापक्ष से चौंकाने वाली उम्मीद इसलिए भी की जा रही है, क्योंकि अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए प्रदेश सरकार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है।
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सत्तापक्ष को उम्मीद है कि ऐनवक्त पर बसपा का यह कदम उसके बहुमत में फूट डाल सकता है। ऐसे में उसे उन सदस्यों का समर्थन हासिल करने में आसानी हो सकती है, जोकि रामेश्वर उपाध्याय के खासमखास समझे जाते हैं और अध्यक्ष पद के लिए उनकी दावेदारी के नाम पर सदस्य का चुनाव जीतकर आए हैं, लेकिन बसपा को उम्मीद है कि प्रत्याशी बदलने के बावजूद उसके बहुमत पर कोई खतरा नहीं है। उसके सभी सदस्य उनके अधिकृत प्रत्याशी के लिए ही वोट करेंगे मगर सत्तापक्ष ने इस मौके का फायदा उठाने के लिए बसपा के बहुमत में सेंधमारी की कोशिश तेज कर दी है। अब भेदियों के जरिए सत्तापक्ष के दिग्गज बसपा के उन सदस्यों तक पहुंचने की जुगत भिड़ा रहे हैं, जोकि जीतने के बाद से ही अंडरग्राउंड चल रहे हैं। भेदियों से उनका पता जानने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनसे तार जोड़े जा सकें।
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बदलाव का फायदा उठाने को तैयार सपा
बहुमत के लिए करो या मरो की चुनौती से जूझ रहे सत्तापक्ष के लिए यह मौका वाकई बेहद अहम बन गया है। उसके पास बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए अब सिर्फ पांच दिन बाकी रह गए हैं। 11 सदस्य पहले से ही सत्तापक्ष के कब्जे में हैं। अब अध्यक्ष बनने के लिए उसे केवल दो सदस्यों की दरकार है, जिन्हें वह बसपा में फूट डालकर हासिल करना चाहता है। अगर सत्तापक्ष की कोशिश कामयाब नहीं हुई तो अध्यक्षी के लिए उसकी अब तक की भागदौड़ पर पानी फिर जाएगा।
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बसपा ने और मजबूत की किलेबंदी
प्रत्याशी बदलने के बाद बसपा खेमे के सामने भी सत्तापक्ष की चालों को मात देने की चुनौती है। उन्हें डर है कि कहीं सत्तापक्ष इस बदलाव की आड़ में उनके सदस्यों को बरगलाने में कामयाब नहीं हो जाए। यही वजह है कि अब उसके दिग्गजों ने अपने सदस्यों किलेबंदी और मजबूत कर दी है, ताकि सत्तापक्ष का कोई भी तीर उनकी सुरक्षा को नहीं भेद सके।
सत्तापक्ष के अगले कदम पर नजर
सियासत में अब यह सवाल अहम हो गया है कि चुनाव तक बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए सत्तापक्ष क्या कमाल करने वाला है। राजनीतिक दलों की ही नहीं, बल्कि आम-ओ-खास की नजर भी उसके अगले कदम पर है। सत्तापक्ष से चौंकाने वाली उम्मीद इसलिए भी की जा रही है, क्योंकि अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए प्रदेश सरकार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है।