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Hathras News: वर्दी में हौसले की सवारी, पुरुष परिचालकों पर महिलाएं भारी

Tue, 15 Sep 2026 01:42 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस Updated Tue, 15 Sep 2026 01:42 AM IST
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Riding high on spirit in uniform, women outshine male conductors.
रोडवेज बस में टिकट काटती महिला परिचालक। संवाद - फोटो : Samvad
हाथ में ई-टिकटिंग मशीन, कंधों पर बैग और आंखों में परिवार को बेहतर जिंदगी देने का सपना। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के हाथरस डिपो में वर्दी पहने जब ये महिला परिचालक बस की सीढ़ियों पर कदम रखती हैं, तो वे केवल टिकट नहीं काटतीं, बल्कि समाज की उस रढि़वादी सोच को भी पीछे छोड़ देती हैं, जहां यह कहा जाता है कि यह काम महिलाओं के वश का नहीं है।
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डिपो में तैनात लगभग 120 पुरुष परिचालक जहां कई बार भागदौड़ भरी ड्यूटी, रात के सफर और अनियमित दिनचर्या से असहज होकर गैरहाजिर हो जाते हैं, वहीं डिपो की 12 महिला संविदा परिचालक अपनी नियमित निष्ठा से सबको चौंका रही हैं। चौंकाने वाली बात यह भी है कि इनमें से अधिकांश महिलाएं उच्च शिक्षित हैं, कोई एमएससी और बीएड है तो कोई परास्नातक और कंप्यूटर दक्ष।
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डिग्रियों के अनुरूप मुकाम भले न मिला हो, लेकिन इन्होंने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और नियमित ड्यूटी कर निर्धारित किलोमीटर का लक्ष्य पूरा करते हुए संविदा श्रेणी में अधिकतम मानदेय हासिल किया। त्योहारी सीजन की प्रोत्साहन योजनाओं में भी ये महिलाएं बाजी मार रही हैं।
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हाथरस डिपो प्रभारी मंगेश कुमार बताते हैं कि डिपो में कई महिला परिचालकों की नियुक्ति हुई, लेकिन इसमें चुनिंदा ही इस चुनौतीपूर्ण कार्य को कर पा रहीं हैं।

काम कोई छोटा नहीं होता : कुसुम
मथुरा रोड स्थित लोहिया नगर की निवासी कुसुम चौधरी उच्च शिक्षित हैं। उन्होंने एमएससी और बीएड की डिग्री हासिल की है, साथ ही एनसीसी और स्काउट में भी सक्रिय रही हैं। पिछले एक वर्ष से वह हाथरस डिपो में संविदा परिचालक के रूप में कार्यरत हैं। हर महीने तय किलोमीटर का लक्ष्य पूरा कर वह 20 हजार रुपये से अधिक मानदेय हासिल करती हैं और हर प्रोत्साहन योजना में इनाम की हकदार बनती हैं। वह कहती हैं कि कोई काम छोटा नहीं होता।


एक की कमाई से बच्चों की परवरिश संभव नहीं : रानी
कस्बा महौ की निवासी रानी सेंगर भूगोल विषय से एमए हैं और कंप्यूटर कोर्स भी कर चुकी हैं। दो मासूम बच्चों की मां रानी को इस पद पर कार्य करते हुए करीब चार माह का समय हुआ है। घर और नौकरी के बीच संतुलन बैठाना उनके लिए हर रोज एक नई अग्निपरीक्षा जैसा होता है। वह कहती हैं कि आज की महंगाई के दौर में केवल एक सदस्य की कमाई से घर का खर्च और बच्चों की परवरिश संभव नहीं है।
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