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Mother's Day: मां है संघर्ष-साहस और समर्पण की मिसाल, हर कठिनाई झेल कर बच्चों का जीवन संवारा

Sun, 10 May 2026 11:54 AM IST
Chaman Kumar Sharma विनीत चौरसिया, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
विनीत चौरसिया, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Sun, 10 May 2026 11:54 AM IST
सार

संघर्ष, साहस और समर्पण की ये कहानियां मां के अदम्य प्रेम और शक्ति की मिसाल हैं। ये माताएं न केवल अपने बच्चों के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि समाज के लिए भी मिसाल बन चुकी हैं। 
 

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Mother saved the lives of her children
संगीता शर्मा, जीवन चौहान व रेनू - फोटो : संवाद

विस्तार

मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह हर कठिन परिस्थिति में बच्चों के सपनों को संवारती है। पूरी जिंदगी इसमें ही गुजार देती है। शहर में भी ऐसी माताएं हैं, जिन्होंने जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। किसी ने बहन के बच्चों को अपना मानकर उनका भविष्य संवारा, तो किसी ने अकेले संघर्ष कर तीन बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया। किसी ने पति के निधन के बाद टूटने के बजाय बच्चों के सपनों को अपनी ताकत बना लिया। संघर्ष, साहस और समर्पण की ये कहानियां मां के अदम्य प्रेम और शक्ति की मिसाल हैं। ये माताएं न केवल अपने बच्चों के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि समाज के लिए भी मिसाल बन चुकी हैं। 

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समर्पण : बहन के तीन बच्चों को अपनाया
शहर की गली रग्घा पाठक निवासी संगीता शर्मा ने वह कर दिखाया, जो हर किसी के बस की बात नहीं। वर्ष 2004 में उनकी बहन मोनिका की तीसरे बच्चे के जन्म के दौरान मृत्यु हो गई, वह 10 घंटे के नवजात के साथ कुल तीन बच्चे छोड़ गईं थीं। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन संगीता ने बहन के तीनों बच्चों को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए उन्हें पालने का निर्णय लिया। इस फैसले की कीमत उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में भी चुकानी पड़ी। बहन के बच्चों की जिम्मेदारी उठाने के कारण उनके पति ने उनका साथ छोड़ दिया, लेकिन संगीता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने घर-घर जाकर ट्यूशन पढ़ाई और दिन-रात मेहनत कर बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। आज उनकी मेहनत रंग लाई है। बहन का बड़ा बेटा फार्मासिस्ट बन चुका है। बेटी ने स्नातक तक की शिक्षा पूरी कर ली है, जबकि छोटा बेटा इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा है। संगीता कहती हैं कि इन बच्चों की सफलता ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।
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संघर्ष : 33 साल की तपस्या से तीन बेटियों का भविष्य संवारा
शहर के कोठी बेलनशाह निवासी जीवन चौहान की जिंदगी 33 वर्षों से संघर्ष की मिसाल है। जीवन साथी का साथ छूटने के बाद उन्होंने अकेले ही तीन बेटियों की जिम्मेदारी उठाई और हर कठिनाई को मात देकर उन्हें सम्मानजनक जीवन दिया। आंगनबाड़ी कार्यकत्री की छोटी सी नौकरी की सीमित आय में घर चलाना आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने ट्यूशन पढ़ाई, घरेलू छोटे-मोटे काम किए और हर संभव प्रयास कर बेटियों की शिक्षा कभी नहीं रुकने दी। उनकी बड़ी बेटी ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की, मझली बेटी ने एमए और बीएड की शिक्षा प्राप्त की, जबकि छोटी बेटी ने एमकॉम तक पढ़ाई पूरी की। आज तीनों बेटियां आत्मनिर्भर हैं और उनकी शादी भी हो चुकी है। जीवन चौहान कहती हैं-संघर्ष कठिन जरूर था, लेकिन बेटियों की मुस्कान और उनका सम्मानजनक जीवन देखकर लगता है कि हर कठिनाई सफल हो गई।
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साहस : पति के बाद बच्चों के सपनों को टूटने नहीं दिया
शहर की वॉटर वर्क्स कॉलोनी निवासी रेनू के जीवन में कोरोना महामारी ऐसा दर्द लेकर आई, जिसने उनकी दुनिया बदल दी। कोरोना काल में पति के निधन के बाद वह अकेली पड़ गईं, लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए उन्होंने खुद को संभाला और साहस के साथ जीवन की नई शुरुआत की। रेनू निजी नौकरी करने के साथ-साथ अतिरिक्त आय के लिए छोटे-मोटे काम भी करतीं हैं। तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को इंटरमीडिएट तक पढ़ाया है और अब उसे डॉक्टर बनाने की तैयारी कर रहीं हैं। वहीं बेटे की हाईस्कूल तक की पढ़ाई पूरी करा चुकी हैं और उसे इंजीनियर बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। रेनू कहती हैं-कई बार हालात बहुत कठिन हो जाते हैं, लेकिन बच्चों के सपने उन्हें कमजोर नहीं पड़ने देते। उनकी सफलता ही मेरे जीवन का उद्देश्य है।

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