प्राइवेट अस्पताल संचालकों की मनमानी: खुले में फेंक रहे 6.6 टन चिकित्सा कचरा, बढ़ रहा बीमारियों का खतरा
बागला जिला अस्पताल के सामने और सीएमओ कार्यालय के निकट स्थित प्राइवेट अस्पतालों की की मनमानी से आसपास के लोग परेशान हैं। इन अस्पतालों का स्टाफ चिकित्सा कचरे को अस्पताल से एकत्रित कर बाहर लगे कूड़े के ढेर पर फेंक देता है। यही कचरा फिर जानवरों के जरिये सड़कों पर बिखरता है।
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बायो मेडिकल वेस्ट (चिकित्सा कचरे) के निस्तारण में प्राइवेट अस्पताल संचालक मनमानी कर रहे हैं। इन अस्पतालों से निकलने वाले कचरे को सीधे सड़कों पर फेंका जा रहा है। लापरवाही का आलम यह है कि जिले की 190 इकाइयों से हर महीने लगभग 6.6 टन चिकित्सा कचरा कूड़े में फेंका जा रहा है। सबसे बुरा हाल जिला अस्पताल के सामने स्थित प्राइवेट अस्पतालों का है, जहां से पॉलिथीन में भरकर इंजेक्शन व दवाओं की खाली शीशियां खुले में फेंकी जा रही हैं, जिसको जानवर सड़क पर बिखेर देते हैं।
निजी अस्पतालों के पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेजों में बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट सर्टिफिकेट व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी जरूरी है। इन दोनों के बिना पंजीकरण नहीं हो पाता है। पंजीकरण का नवीनीकरण भी नहीं होता है, इसलिए अस्पताल संचालक दोनों सर्टिफिकेट बनवाते हैं। बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट सर्टिफिकेट के लिए अस्पतालों को कचरे का सुरक्षित संग्रह करना होता है, उसको अलग-अलग करना होता है और सुरक्षित परिवहन व निस्तारण करना होता है, ताकि मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण को संक्रमण से बचाया जा सके।
इसके अलावा कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग करने और सही रंग के डस्टबिन में फिंकवाने की जिम्मेदारी भी अस्पतालों की होती है, लेकिन शहर के अधिकांश निजी अस्पताल इस कार्य में अनदेखी कर रहे हैं। बागला जिला अस्पताल के सामने और सीएमओ कार्यालय के निकट स्थित प्राइवेट अस्पतालों की की मनमानी से आसपास के लोग परेशान हैं। इन अस्पतालों का स्टाफ चिकित्सा कचरे को अस्पताल से एकत्रित कर बाहर लगे कूड़े के ढेर पर फेंक देता है। यही कचरा फिर जानवरों के जरिये सड़कों पर बिखरता है।
दुकान के सामने ही मेडिकल वेस्ट और कूड़े का ढेर पड़ा है। यहीं पर आसपास के अस्पताल व क्लीनिक संचालक अपना चिकित्सा कचरा भी फेंक जाते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता है।-अरविंद शर्मा, दुकानदार अलीगढ़ रोड।
कूड़े के ढेर पर पड़े इंजेक्शन, सिरिंज की थैलियां और डायपर आदि को बंदर व कुत्ते इधर-उधर फैला देते हैं, जिससे आने-जाने वाले लोग संपर्क में आते है और बीमार होने का डर बना रहता है।-अमित कुमार निवासी रमनपुर।
नगर पालिका द्वारा समय से कूड़ा नहीं उठाया जा रहा। ऊपर से चिकित्सा कचरा फैल रहा है। मक्खी-मच्छरों से संक्रमण जगह-जगह फैलता है। निजी अस्पताल व क्लीनिक संचालकों को इस पर ध्यान देना चाहिए।-राजेश निवासी सासनी गेट।
अस्पतालों का चिकित्सा कचरा कूड़े के ढेरों पर फेंका जा रहा है। ट्रैक्टर व टेंपो से सफाई कर्मी ही इसको उठा रहे हैं, जिसे सीवेज फार्म पर डाला जाता है। सफाई कर्मियों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है, उन्हें भी संक्रमण होने का खतरा बना रहता है।-उमेश चंचल, अध्यक्ष, सफाई कर्मचारी मजदूर संघ।
बाया मेडिकल वेस्ट निस्तारण के लिए समय-समय पर नोटिस जारी किए जाते हैं। सड़क पर ऐसा कचरा नहीं डालना चाहिए। यदि कोई अस्पताल संचालक ऐसा कर रहा है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी।-डॉ. राजीव रॉय, सीएमओ।
मथुरा की कंपनी देती है सर्टिफिकेट
बायो मेडिकल वेस्ट उठाने के लिए पहले लखनऊ स्तर से टेंडर उठता था। इस बार अप्रैल 2025 में सीएमओ स्तर से टेंडर निकाला गया था। जुलाई में मथुरा की कंपनी बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल एजेंसी (बीएमडब्ल्यूडीए) को टेंडर मिला। तब से यही कंपनी सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों से निकलने वाले चिकित्सा कचरे का निस्तारण करा रही है। इसी कंपनी की तरफ से अस्पतालों को मेडिकल वेस्ट प्रबंधन का सर्टिफिकेट मिलता है। अस्पताल का पंजीयन कराने और पंजीयन नवीनीकरण में यह सर्टिफिकेट खासा अहम होता है।
80 संस्थाओं ने ही लिया सर्टिफिकेट, 107 ने नहीं किया प्रबंध
जिले में 137 पंजीकृत निजी अस्पताल हैं। इनके अलावा 35 आयुर्वेदिक क्लीनिक, 26 सामान्य क्लीनिक तथा लगभग 75 पैथोलॉजी लैब हैं। इन सभी से निकलने वाले कचरे को उठाने की जिम्मेदारी मथुरा की कंपनी की है। कंपनी के मैनेजर मोहन गर्ग ने बताया कि पिछले चार महीनों में केवल 80 इकाइयों ने ही उनसे मेडिकल वेस्ट प्रबंधन के सर्टिफिकेट प्राप्त किए हैं। इनमें 30 प्राइवेट अस्पताल हैं और शेष पैथोलॉजी व क्लीनिक हैं। सादाबाद, शहर में बाईपास व मथुरा रोड, सासनी व सिकंदराराऊ के अस्पताल भी इनमें शामिल है। शहर सहित जिले के 107 प्राइवेट अस्पतालों ने अभी तक सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं किए हैं, जिससे उनके यहां से कूड़ा नहीं उठाया जा रहा है।
रोजाना करीब 220 किलो निकल रहा कचरा
शहर की 190 इकाइयों से इस वक्त हर महीने लगभग 6.6 टन मेडिकल वेस्ट कूड़े में फेंका जा रहा है। प्राइवेट अस्पताल सहित अन्य संस्थाएं इसमें शामिल हैं। इन इकाइयों से रोजाना लगभग 220 किलो कचरा निकल रहा है, जो सामान्य कूड़े में मिलकर संक्रमण फैला रहा है। इस हिसाब से महीने में 6.6 टन मेडिकल वेस्ट कूड़े के ढेर व नालों में फेंका जा रहा है। 80 इकाइयों से फिलहाल एजेंसी रोजाना 100 किलो चिकित्सा कचरा उठा रही हैं।
यह होता है मेडिकल वेस्ट
चिकित्सा कचरे में सुइयां, सिरिंज, स्केलपेल ब्लेड, रक्त के अवशेष, शरीर के तरल पदार्थ से दूषित वस्तुएं, गंदी रूई, ड्रेसिंग, गंदे प्लास्टर कास्ट, बिस्तर, शरीर से दूषित अन्य सामग्री शामिल होती है। अस्पतालों में प्रति बेड व क्लीनिक में मरीजों की संख्या के आधार पर चिकित्सा कचरे का निर्धारण है। इसी आधार पर एजेंसी सर्टिफिकेट की फीस तय करती है।