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Hathras News: जन्मजात विकृति के शिकार हो रहे मासूम, 47 चिह्नित
Sun, 30 Aug 2026 02:01 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Sun, 30 Aug 2026 02:01 AM IST
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प्रतीकात्मक चित्र।
- फोटो : Archive
आनुवंशिक कारणों, खराब जीवनशैली और गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी के कारण नौनिहाल जन्मजात विकृतियों के शिकार हो रहे हैं। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में जुलाई माह तक प्रसव केंद्रों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में चलाए गए स्क्रीनिंग अभियान में कुल 47 बच्चे जन्मजात दोषों से ग्रसित पाए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने इनमें से 10 बच्चों का सफल उपचार व प्रबंधन कराया है। आरबीएसके की रिपोर्टिंग के आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 में जिले के राजकीय प्रसव केंद्रों पर कुल 4,180 बच्चों का जन्म हुआ, जिनकी पूरी तरह से जांच की गई। इनमें से 11 नवजात शिशुओं में जन्मजात दोष की पुष्टि हुई।
इसके अलावा आशा कार्यकर्ताओं द्वारा गृह आधारित नवजात देखभाल (एचबीएनएस) के तहत 9,163 शिशुओं का परीक्षण किया गया, जिसमें तीन बच्चे चिह्नित किए गए। आरबीएसके की मोबाइल हेल्थ टीमों ने अप्रैल से जुलाई तक गांव-गांव जाकर 96,570 बच्चों का गहन स्वास्थ्य परीक्षण किया, जिसमें 33 बच्चे जन्मजात शारीरिक विकृतियों से पीड़ित मिले।
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जागरूकता और शुरुआती पहचान जरूरी
एसीएमओ डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि जन्मजात विकृतियों का मुख्य कारण आनुवंशिक कारक, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड व आवश्यक पोषक तत्वों की कमी, देर से गर्भावस्था या बिना डॉक्टरी सलाह के दवाओं का सेवन है। आरबीएसके की टीमें अब ग्रामीण इलाकों में चौपालों और स्क्रीनिंग शिविरों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और परिजनों को बेहतर पोषण, संतुलित जीवनशैली और समय पर जांच कराने के प्रति जागरूक कर रही हैं।
जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में 4डी की तलाश
जिले में आरबीएसके की 14 ग्रामीण और एक शहरी टीम है। प्रत्येक टीम में चिकित्सक, स्टाफ नर्स, ऑप्टोमेट्रिस्ट या फार्मासिस्ट तैनात हैं। ये टीम जन्म से 18 वर्ष के बच्चों में 4डी यानी, डिफेक्ट एट बर्थ (जन्मजात दोष), डिफिशिएंसी (पोषक तत्वों की कमी), डिसीज (बीमारियां), और डेवलपमेंटल डिले (विकास में देरी) की पहचान करती हैं।
आंकड़े एक नजर में
कुल प्रसव (राजकीय केंद्र) : 4,180
प्रसव केंद्रों पर चिह्नित नवजात : 11
आशा द्वारा चिह्नित शिशु : 03
मोबाइल हेल्थ टीम द्वारा परीक्षण : 96,570 बच्चे
चिह्नित बच्चे: 33
कुल चिह्नित बच्चे : 47
उपचारित बच्चे: 10
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आरबीएसके की टीमें लगातार क्षेत्र में काम कर रही हैं। जन्मजात विकृति का मुख्य कारण आनुवंशिक व पोषण की कमी है। ऐसे बच्चों को चिह्नित कर इलाज से जोड़ा जा रहा है।
-डॉ. वेदप्रकाश, सीएमओ
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स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने इनमें से 10 बच्चों का सफल उपचार व प्रबंधन कराया है। आरबीएसके की रिपोर्टिंग के आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 में जिले के राजकीय प्रसव केंद्रों पर कुल 4,180 बच्चों का जन्म हुआ, जिनकी पूरी तरह से जांच की गई। इनमें से 11 नवजात शिशुओं में जन्मजात दोष की पुष्टि हुई।
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इसके अलावा आशा कार्यकर्ताओं द्वारा गृह आधारित नवजात देखभाल (एचबीएनएस) के तहत 9,163 शिशुओं का परीक्षण किया गया, जिसमें तीन बच्चे चिह्नित किए गए। आरबीएसके की मोबाइल हेल्थ टीमों ने अप्रैल से जुलाई तक गांव-गांव जाकर 96,570 बच्चों का गहन स्वास्थ्य परीक्षण किया, जिसमें 33 बच्चे जन्मजात शारीरिक विकृतियों से पीड़ित मिले।
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जागरूकता और शुरुआती पहचान जरूरी
एसीएमओ डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि जन्मजात विकृतियों का मुख्य कारण आनुवंशिक कारक, गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड व आवश्यक पोषक तत्वों की कमी, देर से गर्भावस्था या बिना डॉक्टरी सलाह के दवाओं का सेवन है। आरबीएसके की टीमें अब ग्रामीण इलाकों में चौपालों और स्क्रीनिंग शिविरों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और परिजनों को बेहतर पोषण, संतुलित जीवनशैली और समय पर जांच कराने के प्रति जागरूक कर रही हैं।
जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में 4डी की तलाश
जिले में आरबीएसके की 14 ग्रामीण और एक शहरी टीम है। प्रत्येक टीम में चिकित्सक, स्टाफ नर्स, ऑप्टोमेट्रिस्ट या फार्मासिस्ट तैनात हैं। ये टीम जन्म से 18 वर्ष के बच्चों में 4डी यानी, डिफेक्ट एट बर्थ (जन्मजात दोष), डिफिशिएंसी (पोषक तत्वों की कमी), डिसीज (बीमारियां), और डेवलपमेंटल डिले (विकास में देरी) की पहचान करती हैं।
आंकड़े एक नजर में
कुल प्रसव (राजकीय केंद्र) : 4,180
प्रसव केंद्रों पर चिह्नित नवजात : 11
आशा द्वारा चिह्नित शिशु : 03
मोबाइल हेल्थ टीम द्वारा परीक्षण : 96,570 बच्चे
चिह्नित बच्चे: 33
कुल चिह्नित बच्चे : 47
उपचारित बच्चे: 10
आरबीएसके की टीमें लगातार क्षेत्र में काम कर रही हैं। जन्मजात विकृति का मुख्य कारण आनुवंशिक व पोषण की कमी है। ऐसे बच्चों को चिह्नित कर इलाज से जोड़ा जा रहा है।
-डॉ. वेदप्रकाश, सीएमओ