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उपेक्षा ने छीन ली मूंगा मोती की चमक
Tue, 02 Apr 2019 12:32 AM IST
Mohd Rafeek
न्यूज डेस्क अमर उजाला हाथरस
न्यूज डेस्क अमर उजाला हाथरस
Published by: Mohd Rafeek
Updated Tue, 02 Apr 2019 12:32 AM IST
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पुरदिलनगर में भट्ठी पर कांच के कड़े बनाते मजदूर।
- फोटो : अमर उजाला
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सिकंदराराऊ। कस्बा पुरदिलनगर कभी मूंगा मोती उद्योग के लिए जाना जाता था। पहले यहां से करोड़ों के हैंडीक्राफ्ट विदेशों में निर्यात किए जाते थे। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा था। यहां के मूंगा मोती की चमक इतनी थी जब कभी प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा यहां आते तो लाखों के ऑर्डर देते हैं।
लेकिन, सरकारी उपेक्षा के कारण आज इसकी स्थिति बहुत खराब हो गई। इस उद्योग से जुड़े लोग विधायक और सांसद से गुहार लगा चुके हैं व्यापारी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक जाकर इस संबंध में अपनी आवाज पहुंचा चुके हैं लेकिन अब तक उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं है। पेेश है राकेश वार्ष्णेय की रिपोर्ट।
सरकार और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा के कारण पहले इससे हजारों कमाने वाले कारीगर अब बड़े शहरों की ओर पलायन कर गए हैं, जो बचे हैं वे अब ई-रिक्शा चलाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भीड़ से गुजलार रहने वाले बाजार में आज सिर्फ सन्नाटा है। वर्तमान में कस्बे में सिर्फ कांच के कड़े वो भी लकड़ी की भट्ठियों पर पर बन रहे हैं। इन पर काम करने वाले को गरम करने के बाद निकली गैस से इनके फेंफड़ें और नजर कमजोर हो रही है।
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मूंगा मोती निर्माता पूर्व चेयरमैन हर्षकांत कुशवाहा का कहना है अगर पुरदिलनगर के कांच उद्योग को वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट कैटेगरी में रख लिया जाता तो कुछ तो लाभ होता। हाथरस की हींग को तो रख लिया गया जब कि इसकी आवश्यकता नहीं थी। हींग की बिक्री तो हर हाल में होनी थी बात थी तो केवल मूंगा मोती उद्योग की। सांसद विधायक ने भी कुछ नहीं किया। अगर सांसद दमदारी से संसद में यहां का मामला उठाते तो बजट में कुछ न कुछ अवश्य होता।
ट्रेनों का ठहराव नहीं होने से भी पड़ा प्रभाव
यहां से जाकर जयपुर में व्यवसाय कर रहे कांच व्यवसायी नरेंद्र दीक्षित का कहना है कि रेलवे लाइन ब्रॉडगेज होने के बाद एक भी लंबी दूरी की ट्रेन यहां नहीं रुकती है। इसके अतिरिक्त एचएडी शटल ट्रेन की तर्ज पर कासगंज से दिल्ली के लिए शटल ट्रेन वाया हाथरस जंक्शन दिल्ली के लिए चले तो छोटे व्यापारी प्रात: दिल्ली जाकर अपना माल बेचकर शाम तक वापस लौट सकते हैं। इससे कसबे में रोजगार बढ़ सकता है।
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लेकिन, सरकारी उपेक्षा के कारण आज इसकी स्थिति बहुत खराब हो गई। इस उद्योग से जुड़े लोग विधायक और सांसद से गुहार लगा चुके हैं व्यापारी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक जाकर इस संबंध में अपनी आवाज पहुंचा चुके हैं लेकिन अब तक उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं है। पेेश है राकेश वार्ष्णेय की रिपोर्ट।
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सरकार और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा के कारण पहले इससे हजारों कमाने वाले कारीगर अब बड़े शहरों की ओर पलायन कर गए हैं, जो बचे हैं वे अब ई-रिक्शा चलाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। भीड़ से गुजलार रहने वाले बाजार में आज सिर्फ सन्नाटा है। वर्तमान में कस्बे में सिर्फ कांच के कड़े वो भी लकड़ी की भट्ठियों पर पर बन रहे हैं। इन पर काम करने वाले को गरम करने के बाद निकली गैस से इनके फेंफड़ें और नजर कमजोर हो रही है।
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मूंगा मोती निर्माता पूर्व चेयरमैन हर्षकांत कुशवाहा का कहना है अगर पुरदिलनगर के कांच उद्योग को वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट कैटेगरी में रख लिया जाता तो कुछ तो लाभ होता। हाथरस की हींग को तो रख लिया गया जब कि इसकी आवश्यकता नहीं थी। हींग की बिक्री तो हर हाल में होनी थी बात थी तो केवल मूंगा मोती उद्योग की। सांसद विधायक ने भी कुछ नहीं किया। अगर सांसद दमदारी से संसद में यहां का मामला उठाते तो बजट में कुछ न कुछ अवश्य होता।
ट्रेनों का ठहराव नहीं होने से भी पड़ा प्रभाव
यहां से जाकर जयपुर में व्यवसाय कर रहे कांच व्यवसायी नरेंद्र दीक्षित का कहना है कि रेलवे लाइन ब्रॉडगेज होने के बाद एक भी लंबी दूरी की ट्रेन यहां नहीं रुकती है। इसके अतिरिक्त एचएडी शटल ट्रेन की तर्ज पर कासगंज से दिल्ली के लिए शटल ट्रेन वाया हाथरस जंक्शन दिल्ली के लिए चले तो छोटे व्यापारी प्रात: दिल्ली जाकर अपना माल बेचकर शाम तक वापस लौट सकते हैं। इससे कसबे में रोजगार बढ़ सकता है।