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Hathras News: लागत ज्यादा और कम दाम, घाटे की खेती.. बेबस आलू किसान
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प्रतीकात्मक चित्र।
- फोटो : Archive
किसान संगठन आलू की शवयात्रा निकाल रहे हैं, इनका गुस्सा बेवजह भी नहीं है। आलू की बंपर फसल इस बार किसानों के लिए फायदे की जगह घाटे का सौदा बनकर रह गई है। लागत ज्यादा और भाव कम है, किसान बेबस हैं।
गांव पीहुरा निवासी किसान मथुरा प्रसाद ने बताया कि आलू की बुवाई से लेकर उसे शीतगृह तक पहुंचाने में 400 रुपये प्रति पैकेट (50 किलोग्राम) की लागत आ रही है। 130 रुपये प्रति पैकेट शीतगृह का किराया है। शीतगृह पर भाव 250 से 350 रुपये प्रति पैकेट चल रहा है।
मंडी में 500 रुपये का भाव चल रहा है। लेकिन उतना ही भाड़ा भी बढ़ जाता है। मथुरा प्रसाद का कहना है कि किसानों की मेहनत तो कुल लागत में शामिल ही नहीं है, जिसका उन्हें इस बार कोई मोल नहीं मिल रहा है। इस बार आलू की लागत और मुनाफे के गणित को समझें तो किसानों की बेबसी साफ नजर आ रही है।
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पट्टे पर खेत लेकर आलू बोने वाले किसानों की कमर टूटी
जिले में ऐसे किसानों की बड़ी संख्या है, जिनके पास खुद की जमीन नहीं है और उन्होंने 12 हजार रुपये प्रति बीघा के हिसाब से जमीन पट्टे (ठेके) पर लेकर आलू की बुवाई की थी। मौजूदा बाजार भाव को देखकर इन बंटाईदार और पट्टेदार किसानों के सामने परिवार पालने और कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया है।
-इस बार रेटों में गिरावट के कारण किसान आलू नहीं निकाल रहा है। आलू की निकासी पिछले सालों की अपेक्षा कम हुई है। अभी फिलहाल 15 फीसदी ही आलू की निकासी हो सकी है। आने वाले समय में आलू की निकासी बढ़ेगी। सुनील कुमार, डीएचओ
52 हजार हेक्टेयर था जिले में इस बार आलू का रकबा
160 शीतगृहों की 14.28 मीट्रिक टन की क्षमता है।
13.10 लाख मीट्रिक टन आलू जमा है शीतगृहों में
15-16 फीसदी ही आलू की निकासी हो पाई अभी तक
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गांव पीहुरा निवासी किसान मथुरा प्रसाद ने बताया कि आलू की बुवाई से लेकर उसे शीतगृह तक पहुंचाने में 400 रुपये प्रति पैकेट (50 किलोग्राम) की लागत आ रही है। 130 रुपये प्रति पैकेट शीतगृह का किराया है। शीतगृह पर भाव 250 से 350 रुपये प्रति पैकेट चल रहा है।
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मंडी में 500 रुपये का भाव चल रहा है। लेकिन उतना ही भाड़ा भी बढ़ जाता है। मथुरा प्रसाद का कहना है कि किसानों की मेहनत तो कुल लागत में शामिल ही नहीं है, जिसका उन्हें इस बार कोई मोल नहीं मिल रहा है। इस बार आलू की लागत और मुनाफे के गणित को समझें तो किसानों की बेबसी साफ नजर आ रही है।
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पट्टे पर खेत लेकर आलू बोने वाले किसानों की कमर टूटी
जिले में ऐसे किसानों की बड़ी संख्या है, जिनके पास खुद की जमीन नहीं है और उन्होंने 12 हजार रुपये प्रति बीघा के हिसाब से जमीन पट्टे (ठेके) पर लेकर आलू की बुवाई की थी। मौजूदा बाजार भाव को देखकर इन बंटाईदार और पट्टेदार किसानों के सामने परिवार पालने और कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया है।
-इस बार रेटों में गिरावट के कारण किसान आलू नहीं निकाल रहा है। आलू की निकासी पिछले सालों की अपेक्षा कम हुई है। अभी फिलहाल 15 फीसदी ही आलू की निकासी हो सकी है। आने वाले समय में आलू की निकासी बढ़ेगी। सुनील कुमार, डीएचओ
52 हजार हेक्टेयर था जिले में इस बार आलू का रकबा
160 शीतगृहों की 14.28 मीट्रिक टन की क्षमता है।
13.10 लाख मीट्रिक टन आलू जमा है शीतगृहों में
15-16 फीसदी ही आलू की निकासी हो पाई अभी तक