फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Hathras News ›   Hathras: Used to treat revolutionaries for free, did not take names even after suffering torture

हाथरस : क्रांतिकारियों का करते थे मुफ्त इलाज, यातनाएं सहकर भी नहीं लेते थे नाम

Wed, 03 Aug 2022 11:46 PM IST
अलीगढ़ ब्यूरो मुकेश बाबू शर्मा
मुकेश बाबू शर्मा Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Wed, 03 Aug 2022 11:46 PM IST
विज्ञापन
Hathras: Used to treat revolutionaries for free, did not take names even after suffering torture
हाथरस : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. सूरजपाल का फाइल फोटो। संवाद - फोटो : SHAPHU

विज्ञापन
 कस्बा एवं क्षेत्र में 42 से अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पैदा हुए। इन्होंने अपना पूरा जीवन देश की आजादी की लड़ाई में लगा दिया। इन्हीं में से एक थे पंडित सूरजभान दुबे। बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले सूरजभान पहली बार 20 साल की उम्र में 1941 में बरहन रेलवे स्टेशन लूट कांड में जेल गए। जेल से छूटने के बाद वे क्रांतिकारियों का मुफ्त इलाज करने लगे। इसके लिए अंग्रेजी हुकूमत उन्हें यातनाएं देती फिर भी उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।
पौत्र विजय कुमार दुबे ने बताया कि जेल में उनकी मुलाकात क्रांतिकारियों से हुई। जेल में ही उन्होंने वैध का काम सीख लिया। उन्होंने करो अथवा मरो, नमक सत्याग्रह एवं अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलनों में भाग लिया और जेल गए। उनको जेल में रहने एवं वहां पर डॉक्टरी सीखने का प्रमाण पत्र भी मिला था। जेल से छूटने के बाद उन्होंने क्लीनिक खोल ली।
विज्ञापन

स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ क्रांतिकारियों का मुफ्त भी इलाज करते रहे। क्रांतिकारियों से प्रेरणा लेकर वह आजीवन कुंवारे रहे। वह दो भाई थे। जब उनके बड़े भाई की मौत हुई तो उनके बच्चे काफी छोटे थे। उन पर उनके परिवार को चलाने का भार भी आ पड़ा था। बड़े भाई के परिवार को पालते हुए भी उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी काफी अग्रणी भूमिका निभाई। संवाद
विज्ञापन
विज्ञापन

आजादी के 25 साल पूरा होने पर इंदिरा गांधी ने भेंट किया था ताम्रपत्र
सन 2001 में 80 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने आए तत्कालीन डीएम रविकांत भटनागर एवं एसपी असीम अरुण ने उनकी अर्थी को कंधा दिया था। 1972 में स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूर्ण होने पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनको बुलाकर ताम्रपत्र भेंट किया था। अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह उनके परिवार को सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिली। परिवार के लोग आज भी खेतीबाड़ी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। संवाद
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed