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हाथरस : कवि के अलावा चित्रकार व संगीतकार भी थे काका हाथरसी
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हाथरस : काका हाथरसी स्मारक में लगी काका हाथरसी की प्रतिमा। संवाद
- फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
शहर के ओढपुरा तिराहा स्थित काका हाथरसी स्मारक भवन पर लोग जब पहुंचते हैं तो उन्हें काका की मुस्कुराती हुई प्रतिमा दिखाई देती है और काका के कुछ ऐसे दोहे पढ़ने को मिलते हैं, जोकि हिंदी हास्य व्यंग्य में उन्हें जिंदगी का गूढ़ रहस्य समझाते हैं। हिंदी हास्य व्यंग्य के आका कवि काका का नाम देश विदेश में विख्यात है। काका हाथरसी की वजह से हाथरस का नाम भी देश और दुनिया में पहचाना जाता है। बात यदि काका की स्मृतियों की करें तो काका की किताबें और उनकी रचनाएं तो विश्वभर में प्रसिद्ध हैं ही। शहर में भी काका हाथरसी की स्मृति में उनका स्मारक बना है। इस स्मारक भवन में काका की प्रतिमा लगी है और काका के रचित कुछ दोहे लिखे हैं। अभी तक इस स्मारक में काका की पुस्तकें, उनके दैनिक जीवन से जुड़ी तमाम धरोहरें संग्रहीत नहीं है। हालांकि इसे लेकर स्मारक समिति के लोग पहल कर रहे हैं।
काका हाथरसी ने हिंदी के हास्य व्यंग्य को देश-विदेश में पहचान दिलाई। हाथरस को भी काका ही वजह से पूरे देश दुनिया में पहचान मिली। काका का निधन 18 सितंबर वर्ष 1993 में हो गया था। काका की स्मृति में समय-समय पर कार्यक्रम भी होते रहे। यह अभी भी बदस्तूर जारी हैं लेकिन काका हाथरसी की स्मृति में स्मारक स्थापित करने की पहल की वर्ष 2002 में तत्कालीन डीएम रविकांत भटनागर ने। काका हाथरसी स्मारक समिति भी गठित की गई। भटनाकर इसके संस्थापक अध्यक्ष बने और शहर में मथुरा रोड पर ओढ़पुरा तिराहे पर काका हाथरसी स्मारक का शिलान्यास किया गया। करीब एक साल में यह भवन बनकर तैयार हो गया।
काका की स्मृति में यहां कार्यक्रम होने लगे। यह भी योजना बनाई गई कि काका के तमाम पुस्तकों को यहां रखा जाए और यहां पुस्तकालय बनाया जाए। काका एक बेहतरीन चित्रकार और संगीतकार भी थे। उनकी बनाई गई पेंटिंगें, ब्रुश सहित अन्य तमाम जैसी भी यहां रखी जाएं और एक संग्रहालय बनाया जाए। जिससे कि लोग जब यहां आएं तो काका के पूरे विराट व्यक्तित्व को वह जान सकें। काका न केवल हास्य व्यंग्य के कवि थे, जबकि एक उम्दा चित्रकार और संगीतकार भी थे। वर्ष 2008 में काका की एक प्रतिमा यहां जरूर लगाई गई। फिलहाल शहर में मथुरा रोड से जब लोग प्रवेश करते हैं तो इस स्मारक को देख उन्हें यह अहसास हो जाता है कि वह काका हाथरसी के शहर में आ गए हैं।
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स्मारक को संग्रहालय बनाने के लिए किए जा रहे प्रयास : डॉ. भटनागर
हाथरस। काका हाथरसी स्मारक समिति के अध्यक्ष के अध्यक्ष डॉ.रविकांत भटनागर हैं। रिटायर्ड मंडलायुक्त आजमगढ़ रविकांत भटनागर का कहना है कि वर्ष 1965 में जब वह इटावा में एसडीएम थे, तभी से काका की रचनाएं पढ़ने लगे और उनके प्रशंसक बन गए। काका से उनकी बातचीत भी होती थी। काका के काफी कवि सम्मेलनों में वह मौजूद भी रहे। भटनागर का कहना है कि जब वर्ष 2001 में यहां उनकी डीएम के रूप में तैनाती हुई तो उन्हें काफी अच्छा लगा। वह अपने आप को काफी सौभाग्यशाली समझने लगे कि काका की नगरी में उनकी तैनाती हुई है। जब और लोगों से मिला तो पता चला कि यहां की मिट्टी में ही साहित्य है। यहां के कुछ साहित्यकारों व समाजसेवियों के सुझाव व सहयोग से यह स्मारक स्थापित किया गया। भटनागर का कहना है कि यह प्रयास किया जा रहा है कि इस स्मारक में संग्रहालय बने, जिससे साहित्य का विकास हो।
एक नाटक में निभाया किरदार तो प्रभुलाल गर्ग बन गए काका हाथरसी
हाथरस। प्रभूलाल गर्ग उर्फ काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबर 1906 को शहर की जैन गली में हुआ था। काका का बचपन काफी गरीबी में बीता। पिता की जल्द मौत के बाद वह अपने मामा के यहां इगलास जाकर रहने लगे। गरीबी में काका ने चाट पकौड़ी तक बेची। बचपन में ही काका कविता लिखने लगे। प्रभूलाल गर्ग ने एक नाटक में काका की भूमिका निभाई। बस तभी से वह काका हाथरसी के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 14 साल की अवस्था में काका हाथरस आ गए। काका केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि वह उम्दा चित्रकार और संगीत के जानकार भी थे। उन्होंने चित्रशाला भी खोली। संगीत नाम से मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की। यह आज तक प्रकाशित हो रही है। काका की पहली कविता इलाहबाद से प्रकाशित पत्रिका गुलदस्ता में छपी। इसके बाद उनकी कविताएं लगातार छपने लगी। वह मंचों पर काव्यपाठ के लिए जाने लगे। वर्ष 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पद्मश्री से नवाजा। काका ने विदेशों में भी काव्यपाठ किया। उन्होंने फिल्म जमुना किनारे में अभिनय भी किया। 18 सितंबर 1995 को काका ने इस दुनिया से विदा ले ली। काका के प्रमुख कविता संग्रहों में काका की फुलझड़ियां, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि, काका तरंग, जय बोलो बेइमान की, यार सप्तक, खिलखिलाहट, यार सप्तक, काका के व्यंग्य बाण, काका तरंग, मेरा जीवन ए-वन आदि हैं। --
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शहर के ओढपुरा तिराहा स्थित काका हाथरसी स्मारक भवन पर लोग जब पहुंचते हैं तो उन्हें काका की मुस्कुराती हुई प्रतिमा दिखाई देती है और काका के कुछ ऐसे दोहे पढ़ने को मिलते हैं, जोकि हिंदी हास्य व्यंग्य में उन्हें जिंदगी का गूढ़ रहस्य समझाते हैं। हिंदी हास्य व्यंग्य के आका कवि काका का नाम देश विदेश में विख्यात है। काका हाथरसी की वजह से हाथरस का नाम भी देश और दुनिया में पहचाना जाता है। बात यदि काका की स्मृतियों की करें तो काका की किताबें और उनकी रचनाएं तो विश्वभर में प्रसिद्ध हैं ही। शहर में भी काका हाथरसी की स्मृति में उनका स्मारक बना है। इस स्मारक भवन में काका की प्रतिमा लगी है और काका के रचित कुछ दोहे लिखे हैं। अभी तक इस स्मारक में काका की पुस्तकें, उनके दैनिक जीवन से जुड़ी तमाम धरोहरें संग्रहीत नहीं है। हालांकि इसे लेकर स्मारक समिति के लोग पहल कर रहे हैं।
काका हाथरसी ने हिंदी के हास्य व्यंग्य को देश-विदेश में पहचान दिलाई। हाथरस को भी काका ही वजह से पूरे देश दुनिया में पहचान मिली। काका का निधन 18 सितंबर वर्ष 1993 में हो गया था। काका की स्मृति में समय-समय पर कार्यक्रम भी होते रहे। यह अभी भी बदस्तूर जारी हैं लेकिन काका हाथरसी की स्मृति में स्मारक स्थापित करने की पहल की वर्ष 2002 में तत्कालीन डीएम रविकांत भटनागर ने। काका हाथरसी स्मारक समिति भी गठित की गई। भटनाकर इसके संस्थापक अध्यक्ष बने और शहर में मथुरा रोड पर ओढ़पुरा तिराहे पर काका हाथरसी स्मारक का शिलान्यास किया गया। करीब एक साल में यह भवन बनकर तैयार हो गया।
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काका की स्मृति में यहां कार्यक्रम होने लगे। यह भी योजना बनाई गई कि काका के तमाम पुस्तकों को यहां रखा जाए और यहां पुस्तकालय बनाया जाए। काका एक बेहतरीन चित्रकार और संगीतकार भी थे। उनकी बनाई गई पेंटिंगें, ब्रुश सहित अन्य तमाम जैसी भी यहां रखी जाएं और एक संग्रहालय बनाया जाए। जिससे कि लोग जब यहां आएं तो काका के पूरे विराट व्यक्तित्व को वह जान सकें। काका न केवल हास्य व्यंग्य के कवि थे, जबकि एक उम्दा चित्रकार और संगीतकार भी थे। वर्ष 2008 में काका की एक प्रतिमा यहां जरूर लगाई गई। फिलहाल शहर में मथुरा रोड से जब लोग प्रवेश करते हैं तो इस स्मारक को देख उन्हें यह अहसास हो जाता है कि वह काका हाथरसी के शहर में आ गए हैं।
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स्मारक को संग्रहालय बनाने के लिए किए जा रहे प्रयास : डॉ. भटनागर
हाथरस। काका हाथरसी स्मारक समिति के अध्यक्ष के अध्यक्ष डॉ.रविकांत भटनागर हैं। रिटायर्ड मंडलायुक्त आजमगढ़ रविकांत भटनागर का कहना है कि वर्ष 1965 में जब वह इटावा में एसडीएम थे, तभी से काका की रचनाएं पढ़ने लगे और उनके प्रशंसक बन गए। काका से उनकी बातचीत भी होती थी। काका के काफी कवि सम्मेलनों में वह मौजूद भी रहे। भटनागर का कहना है कि जब वर्ष 2001 में यहां उनकी डीएम के रूप में तैनाती हुई तो उन्हें काफी अच्छा लगा। वह अपने आप को काफी सौभाग्यशाली समझने लगे कि काका की नगरी में उनकी तैनाती हुई है। जब और लोगों से मिला तो पता चला कि यहां की मिट्टी में ही साहित्य है। यहां के कुछ साहित्यकारों व समाजसेवियों के सुझाव व सहयोग से यह स्मारक स्थापित किया गया। भटनागर का कहना है कि यह प्रयास किया जा रहा है कि इस स्मारक में संग्रहालय बने, जिससे साहित्य का विकास हो।
एक नाटक में निभाया किरदार तो प्रभुलाल गर्ग बन गए काका हाथरसी
हाथरस। प्रभूलाल गर्ग उर्फ काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबर 1906 को शहर की जैन गली में हुआ था। काका का बचपन काफी गरीबी में बीता। पिता की जल्द मौत के बाद वह अपने मामा के यहां इगलास जाकर रहने लगे। गरीबी में काका ने चाट पकौड़ी तक बेची। बचपन में ही काका कविता लिखने लगे। प्रभूलाल गर्ग ने एक नाटक में काका की भूमिका निभाई। बस तभी से वह काका हाथरसी के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 14 साल की अवस्था में काका हाथरस आ गए। काका केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि वह उम्दा चित्रकार और संगीत के जानकार भी थे। उन्होंने चित्रशाला भी खोली। संगीत नाम से मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की। यह आज तक प्रकाशित हो रही है। काका की पहली कविता इलाहबाद से प्रकाशित पत्रिका गुलदस्ता में छपी। इसके बाद उनकी कविताएं लगातार छपने लगी। वह मंचों पर काव्यपाठ के लिए जाने लगे। वर्ष 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पद्मश्री से नवाजा। काका ने विदेशों में भी काव्यपाठ किया। उन्होंने फिल्म जमुना किनारे में अभिनय भी किया। 18 सितंबर 1995 को काका ने इस दुनिया से विदा ले ली। काका के प्रमुख कविता संग्रहों में काका की फुलझड़ियां, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि, काका तरंग, जय बोलो बेइमान की, यार सप्तक, खिलखिलाहट, यार सप्तक, काका के व्यंग्य बाण, काका तरंग, मेरा जीवन ए-वन आदि हैं। --