Hathras: सेना-पुलिस और सीबीआई के फर्जी अधिकारी बनकर ठगी करने वाले गिरोह के छह गिरफ्तार, छह अभी और फरार
आठवीं पास इरफान गैंग का सरगना है और गिरोह के अन्य सदस्य भी आठवीं और नौवीं पास हैं। अब तक करीब 1000 से ज्यादा लोगों से डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी कर चुके हैं।
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सेना, पुलिस और सीबीआई के फर्जी अधिकारी बनकर ऑनलाइन ठगी करने वाले मेवात के गिरोह के छह सदस्यों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार यह गिरोह अब 1000 लोगों से डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी कर चुका है। गिरोह के छह सदस्य अभी भागे हुए हैं, जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है।
पुलिस अधीक्षक चिरंजीवनाथ सिन्हा ने खुलासे की जानकारी देते हुए बताया कि मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर गंगाधाम कॉलोनी की पुलिया के पास से 26 सितंबर को इन्हें गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार आरोपियों में अंसार निवासी हामिदपुरा, हमजा निवासी आजमपाड़ा, हाशिम कुरैशी निवासी बिलौचपुरा आगरा, तारिफ व इरफान निवासी उधाका भरतपुर राजस्थान और वसीम टायडा भरतपुर का रहने वाला है।
एसपी के अनुसार आठवीं पास इरफान गैंग का सरगना है और गिरोह के अन्य सदस्य भी आठवीं और नौवीं पास हैं। उन्होंने बताया कि आरोपियों ने बताया है कि अब तक करीब 1000 से ज्यादा लोगों से डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी कर चुके हैं। पुलिस को इनके कब्जे से 15000 रुपये नकद, 17 डेबिट कार्ड, आठ मोबाइल फोन, 13 कूटरचित आधार कार्ड,पासबुक बरामद की हैं।
इस तरह से करते थे ठगी
गिरोह के निशाने पर ट्रांसपोर्टर रहते थे। पुलिस पूछताछ में इरफान ने बताया कि वह फर्जी आर्मी अफसर बनकर ट्रांसपोर्टर को फोन करता और कहता कि उसका ट्रांसफर कोलकाता से दिल्ली हो गया है। सामान आना है। ट्रांसपोर्टर ने यदि 30 हजार रुपये भाड़ा बताया तो वह उसे कहता कि 70 हजार का बिल दो सेना मुख्यालय से इतना ही भुगतान करा देंगे, उसमें से 30 हजार मुझे भेज देना। फिर ट्रांसपोर्टर को वर्दी में अपने फोटो के साथ मुख्यालय की लोकेशन भेज देता और 30 हजार रुपये से उससे पहले ही मंगा लेता। कभी इरफान तो कभी तारिफ अधिकारी बनकर कॉल करता था। सीबीआई और पुलिस अधिकारी बनकर भी ठगी की है।
पैसा आते ही दूसरे सदस्य हो जाते सक्रिय
जैसा ही पैसा खाते में आता वसीम उसे निकाल लेता था। 50 फीसदी इरफान, दस फीसदी वसीम रख लेता बाकी गिरोह के सदस्य आपस में बांट लेते थे। आगरा के अंसार, हमजा, हाशिम पांच हजार रुपये लेकर खाते उपलब्ध कराते थे। इसके लिए यह लोगों को लालच देकर उनसे आईडी और अन्य दस्तावेज लेकर उनके नाम पर खाते खुलवाते थे। उन्हें भी 2500 रुपये दिए जाते थे, लेकिन पास बुक और डेबिट कार्ड वसीम अपने पास रखता था। खाता खुल जाने के बाद वसीम उसकी जानकारी अपने गांव के मुस्तकीम , आरिफ, अलताफ, वारिस, शाहिल, आबिद को देता था।