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Hathras News: स्कूलों की दूरी बनी संकट, डेढ़ किलोमीटर पैदल चलते हैं रोजाना, सैकड़ों बच्चे परेशान

Thu, 26 Feb 2026 04:44 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Published by: चमन शर्मा Updated Thu, 26 Feb 2026 04:44 PM IST
सार

समायोजन करने वाले विद्यालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है, क्योंकि पहले से संचालित इन स्कूलों में अतिरिक्त बच्चों के पहुंचने से कक्षाओं में भीड़ बढ़ गई है। कमरों की कमी के कारण बच्चों को बरामदे या खुले मैदान में बैठाकर पढ़ाई कराई जा रही है।

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Distance from school worries students
परिषदीय विद्यालय के खुले हिस्से में पढ़ाई करते बच्चे - फोटो : संवाद

विस्तार

हाथरस जिले में परिषदीय विद्यालयों के 76 भवन कंडम घोषित हो चुके हैं। इसलिए बड़ी संख्या में बच्चों को अपने गांव से एक से डेढ़ किमी दूर अन्य विद्यालयों में समायोजित किया गया है। इन बच्चों को रोजाना इतनी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। इसका असर उनकी उपस्थिति, एकाग्रता और पढ़ाई पर पड़ रहा है। अभिभावक भी इस सफर से खासे चिंतित रहते हैं। नतीजा ये कि ज्यादा दूरी में समायोजित किए गए बच्चों की उपस्थिति में लगभग 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा रही है।

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कक्षा एक से चार तक के बच्चों के लिए यह दूरी बेहद चुनौतीपूर्ण है। गर्मी, सर्दी और बरसात में परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। अभिभावकों का कहना है कि छोटे बच्चों को अकेले इतनी दूर भेजना सुरक्षित नहीं लगता, इसलिए कई बार वे बच्चों को स्कूल ही नहीं भेज पाते।
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इधर, समायोजन करने वाले विद्यालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है, क्योंकि पहले से संचालित इन स्कूलों में अतिरिक्त बच्चों के पहुंचने से कक्षाओं में भीड़ बढ़ गई है। कमरों की कमी के कारण बच्चों को बरामदे या खुले मैदान में बैठाकर पढ़ाई कराई जा रही है। फर्नीचर, शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं भी कम पड़ रही हैं। इन स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि अस्थायी व्यवस्थाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

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ढाई करोड़ मिले तो शुरू हो स्कूलों का निर्माण
इन स्कूलों के भवनों के निर्माण के लिए करीब ढ़ाई करोड़ रुपये के बजट की मांग की गई है, लेकिन उपलब्धता न होने के चलते इन विद्यालयों के भवन का निर्माण अधर में लटका हुआ है।

केस-1-नगला बक्सा के बच्चे लगभग पौन किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते हैं। सहपऊ के नगला बक्सा के परिषदीय विद्यालय का समायोजन गांव ढ़कपुरा के स्कूल में किया गया है। इसके चलते नगला बक्सा के करीब 40 बच्चों को रोजाना पौन किमी की दूरी पैदल तय कर स्कूल जाना होता है, करीब एक साल से बच्चे परेशान हैं।
केस-2-गांव तकिया के बच्चों का समायोजन 
सहपऊ के संविलियन विद्यालय में किया गया है। तकिया के बच्चों को सवा किलोमीटर दूर तक पैदल आना-जाना होता है, अभिभावकों को भी इससे दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
केस-3- डेढ़ किलोमीटर पैदल चलते हैं पवलोई के बच्चे
हाथरस जंक्शन के गांव पवलोई के परिषदीय विद्यालय के भवन को भी कंडम घोषित किया गया है। अभी तक यहां नए भवन का निर्माण शुरू नहीं किया गया है। मजबूरी में पवलोई के करीब 113 बच्चों को डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर गांव धौरपुर के परिषदीय विद्यालय जाना पड़ता है। वहां भी एक ही कमरा है, जिससे बच्चों के बैठने तक की पर्याप्त जगह नहीं है। इस कारण महज 60 से 70 फीसदी बच्चे ही स्कूल पहुंचते हैं।

गांव का स्कूल बंद होने से बहुत समस्या है। बच्चे दूसरे गांव धौरपुर के स्कूल जाने में कतराते हैं, पढ़ाई में समस्याएं होती हैं। वहां विद्यालय में कमरे से बाहर बैठाया जाता है। वहां एक ही कमरा है, जिसमें कक्षा पांच के बच्चे पढ़ते हैं बाकी बाहर पेड़ के नीचे फर्श पर बैठते हैं।-विक्रम सिंह, निवासी गांव पवलोई।
टूटने के बाद गांव का विद्यालय दोबारा नहीं बना। बजट न होने से निर्माण नहीं हो रहा। गांव में 113 बच्चे हैं। गांव धौरपुर के स्कूल में कम बच्चे जाते हैं, क्योंकि वहां ठीक से पढ़ाई नहीं होती है। एक से डेढ़ किलोमीटर जाना पड़ता है, कभी बच्चा लेट हो जाए तो समस्या होती है।-मुरारीलाल कश्यप निवासी गांव पवलोई।
मेरी दो बेटियां क्रमश: कक्षा पांच और तीन में पढ़ती हैं। पहले गांव में ही स्कूल था तो कोई परेशानी नहीं थी। बरसात में पानी भरने से स्कूल भवन जर्जर हो गया है। अब दोनों बेटियों को गांव से एक किमी दूर सहपऊ संविलियन विद्यालय जाना पड़ता है, जिससे बहुत परेशानी होती है।-भोला निवासी गांव तकिया सहपऊ।
नगला बक्सर के प्राथमिक विद्यालय में 36 बच्चे पढ़ते हैं। मेरे बच्चों को ढकपुरा भेजा जा रहा है। हमें काम छोड़कर बच्चों को छोड़ने और लेने जाना पड़ता है। जब गांव में विद्यालय था तब ऐसी समस्या नहीं थी। गांव में स्कूल होना चाहिए, क्योंकि यहां अधिक बच्चे हैं।-रघुनाथ निवासी नगला बक्सा सहपऊ।

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