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Hathras News: पापा और भैया बने ड्राइवर, बाबा ने नहीं छोड़ा नाती का साथ

Thu, 11 Jun 2026 02:28 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 11 Jun 2026 02:28 AM IST
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Dad and brother stepped up as drivers; Grandpa didn't leave his grandson's side.
हाथरस सिटी स्टेशन पर प्रश्नपत्र से उत्तर का मिलान करते अभ्यर्थी। संवाद - फोटो : Samvad
विनीत चौरसिया
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हाथरस। पुलिस भर्ती परीक्षा के दौरान बुधवार को हाथरस के 13 परीक्षा केंद्रों पर केवल अभ्यर्थियों की भीड़ ही नहीं दिखाई दी, बल्कि उनके सपनों को साकार करने के लिए परिजन भी संघर्ष करते नजर आए। कोई सैकड़ों किलोमीटर कार चलाकर बेटी या बहन को परीक्षा दिलाने पहुंचा तो कहीं बुजुर्ग बाबा बसों के धक्के खाकर अपने नाती का हाथ थामे दिखे। इन केंद्रों पर 120 कारों से आए अभ्यर्थियों के साथ परिजन भी थे।
परीक्षा केंद्रों के बाहर इंतजार करते परिजनों की आंखों में एक ही उम्मीद थी कि उनके अपने सफल हों और उनके सपने पूरे हों। तेज धूप, लंबा सफर और थकान भी इन परिजनों के हौसलों को कम नहीं कर सकी। परीक्षा केंद्रों पर ऐसे सैकड़ों परिवार दिखाई दिए, जो अपनों की सफलता के लिए हर कठिनाई उठाने के लिए तैयार थे। पुलिस भर्ती परीक्षा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि किसी भी युवा की सफलता के पीछे केवल उसकी मेहनत नहीं होती, बल्कि परिवार के त्याग, विश्वास और संघर्ष की भी बड़ी भूमिका होती है। परीक्षा केंद्रों के बाहर इंतजार करते ये चेहरे इसी अनकही कहानी को बयां कर रहे थे। संवाद
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केस-01
201 किमी कार चलाकर बहन
के सपनों का सहारा बना भाई

हरियाणा के गुरुग्राम से आए अरविंद कुमार सुबह कार लेकर हाथरस के लिए निकले थे। उनके साथ उनकी मां और बहन शिवानी भी थीं। करीब 201 किलोमीटर का सफर तय कर वह परीक्षा केंद्र पहुंचे। अरविंद कहते हैं कि बहन की सफलता हमारे पूरे परिवार का सपना है। अगर उसे एक अच्छी नौकरी मिलती है तो उसका भविष्य सुरक्षित होगा। ऐसे में कुछ घंटे तक लगातार कार चलाना कोई बड़ी बात नहीं है। परीक्षा केंद्र के बाहर इंतजार कर रही मां की नजरें भी बार-बार गेट पर टिक जाती थीं। वह कहती हैं कि बच्चों की सफलता से बढ़कर माता-पिता के लिए कुछ नहीं होता।
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केस-02

500 किमी का सफर, ताकि बेटी आराम से परीक्षा दे सके

हरियाणा के फतेहाबाद से आए महेंद्र पाल सिंह अपनी बेटी निकिता सिंह को परीक्षा दिलाने पहुंचे थे। बेटी को लंबी यात्रा की परेशानी न हो, इसलिए पिता और भाई ने बारी-बारी से करीब 500 किलोमीटर तक कार चलाई। महेंद्र पाल बताते हैं, हम चाहते थे कि बेटी आराम से परीक्षा दे। इसलिए पूरा सफर हमने संभाला और उसे सिर्फ परीक्षा पर ध्यान देने दिया। बच्चों की सफलता के लिए माता-पिता हर त्याग करने को तैयार रहते हैं। उनके चेहरे पर सफर की थकान जरूर थी, लेकिन बेटी के भविष्य को लेकर उम्मीद भी थी।


केस-03

बसों में धक्के खाकर नाती संग पहुंचे बाबा

राजस्थान के भरतपुर जनपद के गांव कुंदर से आए निर्भय सिंह का संघर्ष सबसे अलग रहा। उनके पास निजी वाहन नहीं था। इसके बावजूद वह बसों से करीब 130 किलोमीटर की यात्रा करते हुए अपने नाती को परीक्षा दिलाने हाथरस पहुंचे। उन्होंने बताया कि यह उनके नाती के जीवन की पहली बड़ी परीक्षा है। इसलिए सोचा कि उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। घर से बाहर की दुनिया को समझने और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए परिवार का साथ जरूरी होता है। परीक्षा केंद्र के बाहर बैठे निर्भय बार-बार अपने नाती की चिंता करते दिखे। उनका कहना था कि बच्चे आगे बढ़ें, यही बुजुर्गों के जीवन की सबसे बड़ी खुशी होती है।
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