{"_id":"63641f55634374591e129e07","slug":"bsp-eager-to-avenge-the-defeat-in-hathras-seat-last-time-hathras-news-ali303959581","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाथरस सीट पर पिछली बार मिली हार का बदला लेने को बसपा आतुर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाथरस सीट पर पिछली बार मिली हार का बदला लेने को बसपा आतुर
विज्ञापन
केसी निराला, जिलाध्यक्ष बसपा। संवाद
- फोटो : HATHRAS
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
अभी न नगर निकाय चुनाव की तिथि घोषित हुई है और ना ही आरक्षण की स्थिति स्पष्ट है लेकिन निकाय चुनाव की तैयारी में सभी प्रमुख राजनीतिक दल जोर-शोर से लगे हैं। बसपा ने भी इस पर अपनी रणनीति तैयार करने में लगी है।
सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के सहारे पार्टी इस बार हाथरस नगर पालिकाध्यक्ष के पद पर काबिज होने की रणनीति बना रही है। वह पिछले चुनाव में मिली हार का बदला लेना चाहती है। पार्टी नेता यह उम्मीद लगाए बैठे है कि नगर पालिका क्षेत्र का सीमा विस्तार से उसका परंपरागत वोटर बढ़ गया है। इससे उसे लाभ होगा।
2017 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा वर्ष 1996 से लेकर 2012 तक इस सीट से विस चुनाव तो जीतती रही है लेकिन हाथरस नगर पालिका अध्यक्ष की सीट पर बसपा खास प्रदर्शन नहीं कर पाई। वर्ष 2006 में जरूर बसपा के समर्थन से अगम प्रिय सत्संगी चुनाव जीते थे, वरना पिछले 25 साल में हमेशा नगर पालिकाध्यक्ष का पद भाजपा की झोली में ही जाता रहा है।
विज्ञापन
पिछले वर्ष 2017 के चुनाव में भी भाजपा के आशीष शर्मा बसपा प्रत्याशी को हराकर चुनाव जीते थे। तब बसपा की प्रत्याशी रितु उपाध्याय थी और वह दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार बसपा इस हार का बदला लेना चाहती है।
इस बार हाथरस नगर पालिका की सीमा बढ़ गई है। यहां 28 के स्थान पर 35 वार्ड हो गए हैं। बसपा ने इस बार हाथरस निकाय के चुनाव को लेकर रणनीति बनाई है। बसपा अपने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर काम कर रही है। पार्टी ने अध्यक्ष के अलावा सभी वार्डों से प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। बसपा के कार्यकर्ता व पदाधिकारी सबसे पहले यह जातिगत वोटरों की गणना कर रहे हैं।
पार्टी यह आकलन कर रही है कि किस वार्ड में किस जाति के वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके साथ ही आरक्षण पर भी पार्टी नेताओं की टकटकी लगी है। पार्टी की रणनीति है कि आरक्षण घोषित होते है कि वार्ड में उस जाति के प्रत्याशी को मैदान उतारा जाए, जिसकी जाति के वोटर सबसे ज्यादा उस वार्ड में हों। साथ ही यही रणनीति वह नगर पालिकाध्यक्ष के चुनाव में अपनाना चाहती है। पार्टी का फंडा है कि उसका परंपरागत वोटर, मुस्लिम वोटर और प्रत्याशी की जाति के वोटरों को एकजुट कर इस चुनाव में जीता जाए।
- पार्टी पूरे दम खम से निकाय चुनाव लड़ेगी। वार्डों से लेकर पालिकाध्यक्ष तक के चुनाव में उम्मीदवार उतारे जाएंगे। इस समय यह जानकारी की जा रही है कि किस वार्ड में किस जाति के मतदाताओं की क्या संख्या है। आरक्षण तय होगा तो फिर उसी आधार पर जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी उतारे जाएंगे। हाथरस शहर की सीमा का विस्तार होने से पार्टी का वोटर भी बढ़ा है। हर पहलु को ध्यान में रखकर चुनावी रणनीति बनाई जा रही है। - केसी निराला, जिलाध्यक्ष बसपा।
विज्ञापन
अभी न नगर निकाय चुनाव की तिथि घोषित हुई है और ना ही आरक्षण की स्थिति स्पष्ट है लेकिन निकाय चुनाव की तैयारी में सभी प्रमुख राजनीतिक दल जोर-शोर से लगे हैं। बसपा ने भी इस पर अपनी रणनीति तैयार करने में लगी है।
सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के सहारे पार्टी इस बार हाथरस नगर पालिकाध्यक्ष के पद पर काबिज होने की रणनीति बना रही है। वह पिछले चुनाव में मिली हार का बदला लेना चाहती है। पार्टी नेता यह उम्मीद लगाए बैठे है कि नगर पालिका क्षेत्र का सीमा विस्तार से उसका परंपरागत वोटर बढ़ गया है। इससे उसे लाभ होगा।
विज्ञापन
2017 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा वर्ष 1996 से लेकर 2012 तक इस सीट से विस चुनाव तो जीतती रही है लेकिन हाथरस नगर पालिका अध्यक्ष की सीट पर बसपा खास प्रदर्शन नहीं कर पाई। वर्ष 2006 में जरूर बसपा के समर्थन से अगम प्रिय सत्संगी चुनाव जीते थे, वरना पिछले 25 साल में हमेशा नगर पालिकाध्यक्ष का पद भाजपा की झोली में ही जाता रहा है।
विज्ञापन
पिछले वर्ष 2017 के चुनाव में भी भाजपा के आशीष शर्मा बसपा प्रत्याशी को हराकर चुनाव जीते थे। तब बसपा की प्रत्याशी रितु उपाध्याय थी और वह दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार बसपा इस हार का बदला लेना चाहती है।
इस बार हाथरस नगर पालिका की सीमा बढ़ गई है। यहां 28 के स्थान पर 35 वार्ड हो गए हैं। बसपा ने इस बार हाथरस निकाय के चुनाव को लेकर रणनीति बनाई है। बसपा अपने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर काम कर रही है। पार्टी ने अध्यक्ष के अलावा सभी वार्डों से प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। बसपा के कार्यकर्ता व पदाधिकारी सबसे पहले यह जातिगत वोटरों की गणना कर रहे हैं।
पार्टी यह आकलन कर रही है कि किस वार्ड में किस जाति के वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके साथ ही आरक्षण पर भी पार्टी नेताओं की टकटकी लगी है। पार्टी की रणनीति है कि आरक्षण घोषित होते है कि वार्ड में उस जाति के प्रत्याशी को मैदान उतारा जाए, जिसकी जाति के वोटर सबसे ज्यादा उस वार्ड में हों। साथ ही यही रणनीति वह नगर पालिकाध्यक्ष के चुनाव में अपनाना चाहती है। पार्टी का फंडा है कि उसका परंपरागत वोटर, मुस्लिम वोटर और प्रत्याशी की जाति के वोटरों को एकजुट कर इस चुनाव में जीता जाए।
- पार्टी पूरे दम खम से निकाय चुनाव लड़ेगी। वार्डों से लेकर पालिकाध्यक्ष तक के चुनाव में उम्मीदवार उतारे जाएंगे। इस समय यह जानकारी की जा रही है कि किस वार्ड में किस जाति के मतदाताओं की क्या संख्या है। आरक्षण तय होगा तो फिर उसी आधार पर जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी उतारे जाएंगे। हाथरस शहर की सीमा का विस्तार होने से पार्टी का वोटर भी बढ़ा है। हर पहलु को ध्यान में रखकर चुनावी रणनीति बनाई जा रही है। - केसी निराला, जिलाध्यक्ष बसपा।