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Hathras: 143 में से 88 ईंट भट्ठे चल रहे बिना जिगजैग, निकले धुएं से जहरीली हो रही हवा, जारी किए गए नोटिस

Fri, 16 May 2025 05:23 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Published by: चमन शर्मा Updated Fri, 16 May 2025 05:23 PM IST
सार

हाथरस जिले में करीब 143 ईंट भट्ठों का संचालन किया जाता है। इनमें से करीब 55 ईंट भट्ठे ही अब तक प्रदूषण रहित जिगजैग तकनीक से संचालित किए जा रहे हैं। बाकी ईंट भट्ठों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से लगातार नोटिस जारी कर जिगजैग तकनीक अपनाने के लिए कहा जा रहा है।

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Brick kiln operation without zigzag technology
भट्ठे की चिमनी से उठता धुआं - फोटो : संवाद

विस्तार

प्रदूषण की रोकथाम के लिए ईंट भट्ठों के जिगजैग तकनीक से संचालन के आदेश का हाथरस जिले में अभी तक महज 55 ईंट-भट्ठा संचालकों ने ही पालन किया है। करीब 88 भट्ठों का संचालन बिना जिगजैग तकनीक के किया जा रहा है, जिनका काला धुआं हवा को जहरीला बना रहा है।

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बढ़ते प्रदूषण से हवा को दूषित होने से बचाने के लिए शासन की ओर से हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। हवा को स्वच्छ बनाने के लिए जिले में संचालित ईंट-भट्ठों का जिगजैग तकनीक से संचालन का आदेश काफी समय पहले जारी किया गया था, लेकिन अभी तक जिले में आधे ईंट-भट्ठे भी इस तकनीक को नहीं अपना पाए हैं। बिना जिगजैग तकनीक के चल रहे भट्ठों की चिमनियों से हर रोज काला धुआं निकता है, जो वायु को प्रदूषित कर रहा है।
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जिले में करीब 143 ईंट भट्ठों का संचालन किया जाता है। इनमें से करीब 55 ईंट भट्ठे ही अब तक प्रदूषण रहित जिगजैग तकनीक से संचालित किए जा रहे हैं। बाकी ईंट भट्ठों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से लगातार नोटिस जारी कर जिगजैग तकनीक अपनाने के लिए कहा जा रहा है।

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ईंट भट्ठों को जिगजैग तकनीकी में तब्दील कराने की लगातार कोशिश की जा रही है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से भट्ठा संचालकों को सभी भट्ठों को जिगजैग तकनीकी से चलाने के लिए जून 2026 तक का समय दिया गया है।-विश्वनाथ शर्मा, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अलीगढ़।

ईंट भट्ठों के संचालन के लिए हैं दूरी के मानक

नए मानक के अनुसार अब 500 मीटर से एक किमी के दायरे में ही दूसरे ईंट-भट्ठे बनाने की अनुमति दी जा सकती है। पहले यह मानक 200 से लेकर 500 मीटर तक था। नए नियम को जिले में लागू करने की तैयारी की जा रही है।

जिगजैग सिस्टम का खर्च करीब 50 लाख
एक जिगजैग सिस्टम लगवाने के लिए भट्ठा स्वामी को करीब 50 लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यही कारण है कि भट्ठा मालिक इस तकनीक को अपनाने से बच रहे हैं। यही नहीं इस विधि से चिमनी बनवाने पर संचालक को शुरू के दिन से लगातार अंतिम दिन तक जेनरेटर की व्यवस्था करनी होगी। यह जेनरेटर 24 घंटे चलता रहेगा और तभी यह तकनीक सफल हो पाएगी। माना जा रहा है कि अगर सभी ने यह विधि अपनाई तो इसका असर ईंट के दामों पर भी पड़ेगा।

इस तरह काम करती है जिगजैग तकनीक
साधारण ईंट भट्ठों में आमतौर पर ईंट पकाने के लिए छल्लियों में सीधी हवा दी जाती है। जिगजैग विधि में टेढ़ी-मेढ़ी लाइन बनाकर पंखों से हवा दी जाती है। इसके चलते धुएं के ऊपर तक आते-आते उसके विषैले कारक टेढ़े-मेढ़े रास्तों में बैठ जाते हैं, जिससे चिमनी सफेद धुआं उगलती है। यहां यह बात भी अहम है कि पुरानी विधि से सामान्य तौर पर ईंट पकाने में 25-30 टन कोयला खर्च होता है, लेेकिन इस तकनीक से करीब 16 टन कोयले में काम चल जाता है। ईंटों की गुणवत्ता भी अच्छी होगी।

यह है शहर में प्रदूषण का आंकड़ा
माह प्रदूषण का मानक

  • जनवरी 2025 151 एक्यूआई
  • फरवरी 2025 155 एक्यूआई
  • मार्च 2025 149 एक्यूआई
  • अप्रैल 2025 143 एक्यूआई
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