हार के बावजूद बढ़ा सत्तापक्ष का हौसला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिला पंचायत अध्यक्ष के बेहद प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव में बेशक सपा को हार का मुंह देखना पड़ा है, लेकिन जिले की सियासत में एकतरफा रुतबा रखने वाली बसपा को नाकों चने चबबाने के बाद सपा खेमे का हौसला किसी विजेता से कम नहीं है। जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में बहुमत पाने के बावजूद जिस तरह बसपा ऐनवक्त तक एक-एक वोट के लिए जूझती नजर आई, उसे सत्ता पक्ष अपनी जीत ही मान रहा है। सपा के तेवरों ने भी जता दिया है कि भविष्य की सियासी जंग में भी वह बसपा की राह आसान नहीं होने देगी।
अध्यक्ष पद के बेहद करीब पहुंच चुकी बसपा को फांसने के लिए सत्ता पक्ष ने इस बार ऐसा जाल बिछाया कि बसपाई दिग्गज उसमें उलझते ही चले गए। वो तो दिग्गजों का राजनीतिक तजुर्बा काम आ गया, वरना तो सत्तापक्ष ने बसपा को चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
----
अगले चुनाव में बसपा की घेराबंदी की तैयारी
बेशक बसपाई दिग्गज राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं, लेकिन सपा के नए खिलाड़ियों की चुनौती उन पर इस बार भारी पड़ती दिखी। यही वजह है कि सत्तापक्ष के दिग्गज भी इस बार बसपा को अगली चुनौती पेश करने के लिए आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहे हैं। सपा खेमे में अब ब्लॉक प्रमुख चुनाव और उसके बाद स्थानीय निकाय के विधान परिषद चुनाव में बसपा को घेरने की रणनीति पर मंथन शुरू हो गया है। सत्तापक्ष इस बार पूरी प्लानिंग के साथ एमएलसी चुनाव में उतरेगा, ताकि बसपा को इस बार जीत का कोई मौका ही नहीं मिल सके।
----
बसपा खेमे के लिए यह मंथन का वक्त
जीत के बावजूद बसपा के लिए यह मंथन का वक्त है। पार्टी के सामने उन कमियों को दूर करने की चुनौती होगी, जिनकी वजह से उसे एकतरफा बहुमत पाने के बावजूद जीत के लाले पड़ गए। बसपा खेमे के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बहुमत के बावजूद उसके सामने कश्मकश की नौबत क्यों आई। क्यों पार्टी अपने ही सदस्यों को एकजुट नहीं रख पाई। ऐनवक्त तक जिस तरह बसपा अपने सदस्यों को एकजुट रखने के लिए जूझती नजर आई, उसके चुनावी प्रबंधन की भी पोल खोलकर रख दी है और यह भी जता दिया है कि बसपा का किला विरोधियों के अब अभेद नहीं रहा। जाहिर है कि भविष्य में सत्तापक्ष की चुनौतियों से निपटने के लिए बसपा को नए सिरे से बनानी पड़ेगी रणनीति।
----
भितरघात से निपटने की भी होगी चुनौती
वैसे देखा जाए तो बसपा की इस स्थिति के लिए भितरघात भी कम जिम्मेदार नहीं है। यह भितरघातियों का ही कमाल था कि सत्तापक्ष बसपा खेमे के उन पांच सदस्यों तक आसानी से पहुंचने में कामयाब हो गया, जिन्हें उसने अज्ञातवाश में रख रखा था। सपा नेताओं तक इनका पता भितरघातियों के जरिए ही पहुंचा। भितरघात की दूसरी बानगी मतदान के वक्त तब भी सुनने को मिली, जब बसपा के दो सदस्यों की क्रॉस वोटिंग की चर्चा शिद्दत से उड़ी। 14 सदस्यों को लेकर पहुंचने के बावजूद एक वोट कम निकलने से इस चर्चा को दम भी मिला। भविष्य के चुनावी मुकाबलों से पहले इस समस्या से निपटना भी उसके लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं है।