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Hardoi News: 24 साल पुराने मामले में दो को दो साल की कैद
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बंटवारे की रंजिश में बिलग्राम गनियापुर में 2001 में हुई थी घटना
संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। गंभीर चोट पहुंचाने के 24 साल पुराने मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट-2 सचिन वर्मा ने फैसला सुनाया। उन्होंने दो आरोपियों रामाधार और कुंवरपाल को दोषी करार देते हुए दो-दो साल की सजा सुनाई। साथ ही 7000 रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माना न देने पर दो माह की अतिरिक्त सजा काटनी होगी।
बिलग्राम कोतवाली क्षेत्र के गनियापुर गांव निवासी परशुराम ने 27 अगस्त 2001 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें बताया था कि 26 अगस्त 2001 को अपने बाग से लकड़ी लेकर घर आ रहा था। इसी दौरान गांव के ही शिव सिंह अपने पुत्र गिरींद्र, कुंवरपाल व गांव के ही रामाधार के साथ आए। चारों ने अपने बाग से लकड़ी लाने का आरोप लगाते हुए गाली-गलौज किया। मना करने पर चारों ने लाठी-डंडों से पिटाई कर दी थी। शोर सुनकर उसका भाई प्रेम मौके पर आ गया था, उसके साथ भी मारपीट की थी।
ग्रामीणों को आते देख चारों आरोपी जानमाल की धमकी देते हुए भाग गए थे। डॉक्टरी परीक्षण में परशुराम का बायां हाथ टूट निकला था। इसके साथ ही शरीर पर कई चोटें थीं। विवेचना में पता चला था कि दोनों पक्ष एक ही परिवार के हैं। 10 बीघा का एक बाग है। बाग के बंटवारे का मुकदमा चल रहा था। इसी बात को लेकर करीब 10 साल से दोनों पक्षों के बीच में रंजिश चली आ रही थी।
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विवेचना के बाद पुलिस ने 17 अप्रैल 2002 को चारों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था। 13 अक्तूबर 2010 को चारों के खिलाफ न्यायालय में आरोप तय हुआ। दौरान मुकदमा गिरींद्र व शिवसिंह की मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष की ओर से तीन गवाहों को पेश किया गया, साथ ही तीन अभिलेखीय साक्ष्य दिए गए। दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने व पत्रावली पर मौजूद सबूतों के आधार पर एसीजेमएम ने जीवित बचे आरोपी रामाधार और कुंवरपाल को सजा सुनाई है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। गंभीर चोट पहुंचाने के 24 साल पुराने मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट-2 सचिन वर्मा ने फैसला सुनाया। उन्होंने दो आरोपियों रामाधार और कुंवरपाल को दोषी करार देते हुए दो-दो साल की सजा सुनाई। साथ ही 7000 रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माना न देने पर दो माह की अतिरिक्त सजा काटनी होगी।
बिलग्राम कोतवाली क्षेत्र के गनियापुर गांव निवासी परशुराम ने 27 अगस्त 2001 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें बताया था कि 26 अगस्त 2001 को अपने बाग से लकड़ी लेकर घर आ रहा था। इसी दौरान गांव के ही शिव सिंह अपने पुत्र गिरींद्र, कुंवरपाल व गांव के ही रामाधार के साथ आए। चारों ने अपने बाग से लकड़ी लाने का आरोप लगाते हुए गाली-गलौज किया। मना करने पर चारों ने लाठी-डंडों से पिटाई कर दी थी। शोर सुनकर उसका भाई प्रेम मौके पर आ गया था, उसके साथ भी मारपीट की थी।
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ग्रामीणों को आते देख चारों आरोपी जानमाल की धमकी देते हुए भाग गए थे। डॉक्टरी परीक्षण में परशुराम का बायां हाथ टूट निकला था। इसके साथ ही शरीर पर कई चोटें थीं। विवेचना में पता चला था कि दोनों पक्ष एक ही परिवार के हैं। 10 बीघा का एक बाग है। बाग के बंटवारे का मुकदमा चल रहा था। इसी बात को लेकर करीब 10 साल से दोनों पक्षों के बीच में रंजिश चली आ रही थी।
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विवेचना के बाद पुलिस ने 17 अप्रैल 2002 को चारों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था। 13 अक्तूबर 2010 को चारों के खिलाफ न्यायालय में आरोप तय हुआ। दौरान मुकदमा गिरींद्र व शिवसिंह की मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष की ओर से तीन गवाहों को पेश किया गया, साथ ही तीन अभिलेखीय साक्ष्य दिए गए। दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने व पत्रावली पर मौजूद सबूतों के आधार पर एसीजेमएम ने जीवित बचे आरोपी रामाधार और कुंवरपाल को सजा सुनाई है।