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इनको खुद के इलाज की दरकार
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सवायजपुर। कस्बा स्थित राजकीय पशु चिकित्सालय का भवन जर्जर हो चुका है। कई दशक पुराने भवन में यह अस्पताल संचालित हो रहा है। इस पशु अस्पताल में कार्यरत स्टाफ हादसे की आशंका से हमेशा सशंकित रहते हैं।
1980 में बने अस्पताल का भवन 42 साल पुराना है। जिसका कार्य क्षेत्र आसपास के इलाके में है। खस्ताहाल भवन से यहां कार्यरत कर्मियों के सिर पर खतरा मंडरा रहा है।
एक दशक पूर्व ही इस भवन की हालत खस्ता हो चुकी थी और गिरने के कगार पर पहुंची गई थी, लेकिन यहां तैनात उप मुख्य पशु चिकित्साधिकारी द्वारा शासन को अवगत कराने के बाद भी कार्य नहीं कराया जा सका है।
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अस्पताल में बाउंड्रीवाल तक नहीं है, जिससे दिनभर सूअर व अन्य जानवर अस्पताल परिसर में रहते हैं। छत के प्लास्टर टूटकर नीचे गिर रहे हैं। सरिया दिखाई दे रही हैं। रंगाई-पुताई का कार्य नहीं किया गया है।
लोग यहां अपने पशुओं के इलाज व टीकाकरण के लिए पहुंचते हैं। जर्जर बिल्डिंग में ही पशुओं का इलाज होता है। प्रभारी मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. धर्मेंद्र वर्मा ने कहा कि पशु अस्पताल के निर्माण के प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है।
कहा कि बजट आने के बाद निर्माण कार्य कराया जाएगा। उन्होंने अस्पताल की जमीन पर स्थानीय लोगों पर अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासनिक स्तर पर कई बार मौखिक व लिखित शिकायत की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
अस्पताल में तैनात रहे डॉक्टर बच्चा सिंह के गैर जनपद स्थानांतरण के पांच माह बीतने के बाद भी चिकित्साधिकारी की तैनाती नहीं की गई है।
पाली के चिकित्सक को प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है, जो शायद ही कभी आते हैं। अस्पताल में तैनात चतुर्थ श्रेणी कर्मी संदीप व विमलेश बाजपेई ही आने वाले पशुओं का इलाज करते हैं।
क्षेत्र के दत्त नगर निवासी बृजेश, जैतापुर निवासी विशुन दयाल ने बताया कि यहां सुविधाएं न होने से दिक्कतें होती हैं।
कस्बा के अलावा मदनापुर, गौरखेड़ा, खितौली, सिमरिया, सिलवारी बसेलिया, खम्हरिया सहित चार न्याय पंचायतों के लगभग 40 गांवों के पशुपालकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
पशु चिकित्साधिकारी डॉ. जेएन पांडेय ने बताया कि मामला संज्ञान में आया है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
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1980 में बने अस्पताल का भवन 42 साल पुराना है। जिसका कार्य क्षेत्र आसपास के इलाके में है। खस्ताहाल भवन से यहां कार्यरत कर्मियों के सिर पर खतरा मंडरा रहा है।
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एक दशक पूर्व ही इस भवन की हालत खस्ता हो चुकी थी और गिरने के कगार पर पहुंची गई थी, लेकिन यहां तैनात उप मुख्य पशु चिकित्साधिकारी द्वारा शासन को अवगत कराने के बाद भी कार्य नहीं कराया जा सका है।
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अस्पताल में बाउंड्रीवाल तक नहीं है, जिससे दिनभर सूअर व अन्य जानवर अस्पताल परिसर में रहते हैं। छत के प्लास्टर टूटकर नीचे गिर रहे हैं। सरिया दिखाई दे रही हैं। रंगाई-पुताई का कार्य नहीं किया गया है।
लोग यहां अपने पशुओं के इलाज व टीकाकरण के लिए पहुंचते हैं। जर्जर बिल्डिंग में ही पशुओं का इलाज होता है। प्रभारी मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. धर्मेंद्र वर्मा ने कहा कि पशु अस्पताल के निर्माण के प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है।
कहा कि बजट आने के बाद निर्माण कार्य कराया जाएगा। उन्होंने अस्पताल की जमीन पर स्थानीय लोगों पर अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासनिक स्तर पर कई बार मौखिक व लिखित शिकायत की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
अस्पताल में तैनात रहे डॉक्टर बच्चा सिंह के गैर जनपद स्थानांतरण के पांच माह बीतने के बाद भी चिकित्साधिकारी की तैनाती नहीं की गई है।
पाली के चिकित्सक को प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है, जो शायद ही कभी आते हैं। अस्पताल में तैनात चतुर्थ श्रेणी कर्मी संदीप व विमलेश बाजपेई ही आने वाले पशुओं का इलाज करते हैं।
क्षेत्र के दत्त नगर निवासी बृजेश, जैतापुर निवासी विशुन दयाल ने बताया कि यहां सुविधाएं न होने से दिक्कतें होती हैं।
कस्बा के अलावा मदनापुर, गौरखेड़ा, खितौली, सिमरिया, सिलवारी बसेलिया, खम्हरिया सहित चार न्याय पंचायतों के लगभग 40 गांवों के पशुपालकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
पशु चिकित्साधिकारी डॉ. जेएन पांडेय ने बताया कि मामला संज्ञान में आया है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।