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बिटिया देख नहीं सकती, विभाग मान नहीं रहा दिव्यांग
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फोटो-31- दिव्यांग पायल
- फोटो : HARDOI
हरदोई। बिटिया देखने, सुनने और बोलने में अक्षम है। स्वास्थ्य विभाग का दिव्यांगता प्रमाणपत्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में उसकी मदद कर सकता है, लेकिन विभाग के कर्मचारियों की मनमानी इसमें बाधा बनी है।
पिता का कहना है कि प्रमाणपत्र बनवाने के लिए जिला अस्पताल गए थे, लेकिन प्रमाणपत्र बनाने से मना कर दिया। परेशानी की बात यह है कि यह किस्सा किसी एक बच्चे या एक परिवार का नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी बिना पैसा लिए किसी का भी प्रमाणपत्र जारी नहीं करते। ज्यादातर मामलों में लखनऊ से प्रमाणपत्र बनवाने की सलाह दे दी जाती है।
सुरसा ब्लॉक के ग्राम जंडेलपुरवा निवासी नरेश ने बताया कि उनकी बेटी सात साल की है। वह जन्म से ही न तो ठीक से देख पाती है और न ही बोल और सुन पानी है। जिला अस्पताल में स्वास्थ्य प्रमाणपत्र बनवाने गए थे, लेकिन मना कर दिया। बताया कि लखनऊ में बनवाओ।
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सुरसा ब्लॉक के गुरगुज्जा गांव निवासी अवधेश कुमार की छह वर्षीय पुत्री आस्था प्रजापति शारीरिक रूप से अक्षम है। पिता अवधेश का कहना है कि कोई भी देखकर बता सकता है कि बिटिया दिव्यांग है। फिर भी स्वास्थ्य विभाग उसका दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी नहीं कर रहा।
हरदोई-बिलग्राम रोड स्थित कसरावां गांव के संजय प्रजापति का पुत्र समंगराज आठवीं कक्षा में है। सुमंगराज सुनने और बोलने में अक्षम है। इसके बावजूद उसका दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ। पिता संजय ने बताया कि कई बार प्रयास करने के बावजूद दिव्यांगता प्रमाणपत्र नहीं बना।
सुरसा ब्लॉक के अखनापुर गांव के रहने वाले सुरेंद्र का पुत्र चंदन इस बार छठी कक्षा में है। सुरेंद्र के मुताबिक चंदन शारीरिक रूप से दिव्यांग है। दिव्यांग प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था, लेकिन अस्पताल में प्रमाणपत्र जारी करने से मना कर दिया गया।
आंखों से संबंधित प्रमाणपत्र यहां बनाए जा रहे हैं। मानसिक, बोलने और सुनने में अक्षम लोगों को लखनऊ रेफर किया जाता है। पात्र होने के बाद भी प्रमाणपत्र नहीं बनाने की कोई शिकायत नहीं मिली है।-डॉ. ओपी तिवारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, हरदोई
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पिता का कहना है कि प्रमाणपत्र बनवाने के लिए जिला अस्पताल गए थे, लेकिन प्रमाणपत्र बनाने से मना कर दिया। परेशानी की बात यह है कि यह किस्सा किसी एक बच्चे या एक परिवार का नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी बिना पैसा लिए किसी का भी प्रमाणपत्र जारी नहीं करते। ज्यादातर मामलों में लखनऊ से प्रमाणपत्र बनवाने की सलाह दे दी जाती है।
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सुरसा ब्लॉक के ग्राम जंडेलपुरवा निवासी नरेश ने बताया कि उनकी बेटी सात साल की है। वह जन्म से ही न तो ठीक से देख पाती है और न ही बोल और सुन पानी है। जिला अस्पताल में स्वास्थ्य प्रमाणपत्र बनवाने गए थे, लेकिन मना कर दिया। बताया कि लखनऊ में बनवाओ।
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सुरसा ब्लॉक के गुरगुज्जा गांव निवासी अवधेश कुमार की छह वर्षीय पुत्री आस्था प्रजापति शारीरिक रूप से अक्षम है। पिता अवधेश का कहना है कि कोई भी देखकर बता सकता है कि बिटिया दिव्यांग है। फिर भी स्वास्थ्य विभाग उसका दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी नहीं कर रहा।
हरदोई-बिलग्राम रोड स्थित कसरावां गांव के संजय प्रजापति का पुत्र समंगराज आठवीं कक्षा में है। सुमंगराज सुनने और बोलने में अक्षम है। इसके बावजूद उसका दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ। पिता संजय ने बताया कि कई बार प्रयास करने के बावजूद दिव्यांगता प्रमाणपत्र नहीं बना।
सुरसा ब्लॉक के अखनापुर गांव के रहने वाले सुरेंद्र का पुत्र चंदन इस बार छठी कक्षा में है। सुरेंद्र के मुताबिक चंदन शारीरिक रूप से दिव्यांग है। दिव्यांग प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था, लेकिन अस्पताल में प्रमाणपत्र जारी करने से मना कर दिया गया।
आंखों से संबंधित प्रमाणपत्र यहां बनाए जा रहे हैं। मानसिक, बोलने और सुनने में अक्षम लोगों को लखनऊ रेफर किया जाता है। पात्र होने के बाद भी प्रमाणपत्र नहीं बनाने की कोई शिकायत नहीं मिली है।-डॉ. ओपी तिवारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, हरदोई