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बाढ़ से तबाही बचाएं, वोट पाएं
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पाली। सवायजपुर विधानसभा का कहारकोल गांव हर बार बाढ़ के समय टापू बन जाता है। मुख्य मार्गों से संपर्क टूट जाता है। साथ ही हर चुनाव में जनप्रतिनिधि ग्रामीणों को समस्या के पुख्ता इंतजाम का भरोसा देते हैं, लेकिन योजनाएं कागजी नाव में सफर तय करती रहती हैं।
यहां के ग्रामीणों की समस्या जस की तस बनी है। हर वर्ष फसल पानी में डूबती है किसान बर्बाद होते हैं। क्षेत्र की जनता का इस बार भी यही चुनावी मुद्दा है। गर्रा नदी के किनारे बसे कहारकोल गांव के लोगों की समस्याएं खत्म नहीं हो रही हैं।
बाढ़ की विभीषिका में पक्के मकान, झोपड़ियां बह जाती हैं। फसली भूमि नदी में समा जाती है। संपर्क मार्ग कट जाता है, संक्रामक रोग फैल जाते हैं। बाढ़ के समय में गांव के लोगों को एक अलग ही दुनिया में जीना पड़ता है।
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दूर-दूर तक कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आती हैं। चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी, रात के समय गर्रा की गुर्राहट से बच्चे तो बच्चे बड़े बूढ़े भी सहम जाते हैं। अगली सुबह मिलेगी या नहीं, इसी सोच में रात गुजर जाती है।
बाढ़ पीड़ित विजेंद्र, दृगपाल, सुनीता, जदुराम, सविता, गंगा देवी आदि के मुताबिक, हर चुनाव में प्रत्याशी उनके पास आते हैं और उनसे समर्थन व पक्ष में मतदान करने की अपील करते हैं।
जीतने के बाद केवल गांव में पीड़ितों को बिस्कुट, केला व थोड़ा बहुत राशन बांट कर अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं। बाढ़ से बचाव का स्थायी उपाय नहीं किया जाता।
विभाग की तरफ से बाढ़ के दौरान अस्थायी व्यवस्था की जाती है, लेकिन पीड़ितों को राहत नहीं मिल रही। उन्होंने कहा कि इस बार बाढ़ चुनाव में मुद्दा बनेगा। बांधों की सुरक्षा और कटान स्थलों पर स्थायी बचाव कार्य करवाने वाले प्रत्याशी को ही मतदान किया जाएगा।
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यहां के ग्रामीणों की समस्या जस की तस बनी है। हर वर्ष फसल पानी में डूबती है किसान बर्बाद होते हैं। क्षेत्र की जनता का इस बार भी यही चुनावी मुद्दा है। गर्रा नदी के किनारे बसे कहारकोल गांव के लोगों की समस्याएं खत्म नहीं हो रही हैं।
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बाढ़ की विभीषिका में पक्के मकान, झोपड़ियां बह जाती हैं। फसली भूमि नदी में समा जाती है। संपर्क मार्ग कट जाता है, संक्रामक रोग फैल जाते हैं। बाढ़ के समय में गांव के लोगों को एक अलग ही दुनिया में जीना पड़ता है।
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दूर-दूर तक कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आती हैं। चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी, रात के समय गर्रा की गुर्राहट से बच्चे तो बच्चे बड़े बूढ़े भी सहम जाते हैं। अगली सुबह मिलेगी या नहीं, इसी सोच में रात गुजर जाती है।
बाढ़ पीड़ित विजेंद्र, दृगपाल, सुनीता, जदुराम, सविता, गंगा देवी आदि के मुताबिक, हर चुनाव में प्रत्याशी उनके पास आते हैं और उनसे समर्थन व पक्ष में मतदान करने की अपील करते हैं।
जीतने के बाद केवल गांव में पीड़ितों को बिस्कुट, केला व थोड़ा बहुत राशन बांट कर अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं। बाढ़ से बचाव का स्थायी उपाय नहीं किया जाता।
विभाग की तरफ से बाढ़ के दौरान अस्थायी व्यवस्था की जाती है, लेकिन पीड़ितों को राहत नहीं मिल रही। उन्होंने कहा कि इस बार बाढ़ चुनाव में मुद्दा बनेगा। बांधों की सुरक्षा और कटान स्थलों पर स्थायी बचाव कार्य करवाने वाले प्रत्याशी को ही मतदान किया जाएगा।