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हज़रत कासिम की शहादत की याद में जुलूस

Wed, 21 Oct 2015 11:12 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, हरदोई
ब्यूरो/ अमर उजाला, हरदोई Updated Wed, 21 Oct 2015 11:12 PM IST
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Procession to commemorate the martyrdom of Hazrat Qasim
इमाम हुसैन के भतीजे जनाबे कासिम की याद में बुधवार को ताबूत, अलम और ज़री
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का जुलूस अपनी रिवायती शान के साथ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच निकाला गया। जुलूस के दौरान मातमी अंजुमनों के सदस्यों ने छुरियों के मातम से अपने सीने लहूलुहान कर शहीदे करबला हज़रत कासिम को पुरसा पेश किया। रौज़ा गेट पर बच्चों ने कमा लगाकर शोहदा-

ए-करबला का गम ताज़ा कर दिया। बड़ी संख्या में अज़ादार महिलाएं भी जुलूस में शामिल हुई। करबला की जंग में इमाम हुसैन के भतीजे हज़रत कासिम को सातवीं मोहर्रम के दिन शहीद कर दिया गया था। इसकी याद में प्रतिवर्ष शियाओं की ओर से यह जुलूस निकाला जाता है। इस बार जुलूस में बाहरी अंजुमन और नौहाख्वानों की दर्द भरी आवाज़ ने शहादत का

गम ताज़ा कर दिया। अल्लाह रे करबला में वह छोटे- छोटे बच्चे। पानी तो मांगते थे लेकिन मिला नहीं था। इक लाश ऐसी देखी जिस पर कफन नहीं था। सुबह जुलूस की शुरुआत इमामाबाड़ा मीरसराय से हुई। जुलूस में हज़रत कासिम की शबीहे ताबूत, ज़री और अलम शामिल थे। जगह-जगह कयाम (ठहराव) करता हुआ जुलूस परंपरागत रास्ते से दोपहर 2:20 बजे

चौहट्टा चौराहा पहुंचा। यहां पर मोहल्ला खुर्मुली से आए दूसरे जुलूस का मिलाप कराया गया। नौहाख्वानी और सीनाज़नी के बीच लब्बैक या हुसैन की दर्दनाक सदाओं के साथ जुलूस इस्लामगंज, यूसुफजई, नईबस्ती और कटराबाजार मोहल्लों से गुजरता हुआ सदर जहां रौज़ा गेट पहुंचा। रौजा गेट पर कयाम के बीच ही छिपीटोला और लोहानी से आए दो अन्य जुलूसों

का मिलाप हुआ। यहां पर मासूम बच्चों को कमा लगाकर गमे शहादते हुसैन मनाया गया। नौजवान मातदारों ने छुरियों से मातम करते हुए अपने सीने लाल कर लिए। देर शाम को जुलस लोहानी व मुरीदखानी मोहल्लों में कयाम पर था। रात भर भ्रमण करते हुए जुलूस अगले दिन (गुरुवार) को पुन: मीरसराय इमामबाड़ा पहुंच कर संपन्न हो गया।

मनाज़िर सीवानी के दर्द भरे नौहों पर गमगीन हुआ माहौल
मशहूर नौहाख्वां मनाज़िर सीवानी (बिहार) के दर्द भरे नौहों पर जुलूस में शामिल अज़ादार सिसक उठे। मनाज़िर सीवानी ने अपने कई मशहूर नौहों के साथ ही शोहदा-ए-करबला को सलाम पेश करते हुए लोगों को सीनाज़नी पर मजबूर कर दिया। इसके अलावा प्रसिद्ध अंजुमन शमशीरे हैदरी (बरेली) ने भी नौहों और मातम के जरिए करबला की जंग का मार्मिक चित्रण कर भावुक कर दिया। अमजद के नौहों ने भी गम का माहौल बनाया।

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