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दिल में दर्द और आंखों में पानी
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Thu, 30 Apr 2015 11:57 PM IST
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ही साथ है। जी हां मजदूरी करने वालों का एक बड़ा वर्ग है, फिर भी इस वर्ग
को आज तक वो मुकाम हासिल न हो सका है, जिसे स्वर्णिम कहा जा सके लिहाजा
पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी पेशे से ज्यादा मजबूरी ज्यादा नजर आती है।
कहने को तो मजदूरों के हितों के लिए तमाम योजनाएं संचालित हो रही हैं, पर कहीं योजनाओं के मानक आड़े आते है तो कहीं योजनाओं के जिम्मेदारों की बेखबरी काम बनने नहीं देती। ऊपर से कार्यालयों की बाबूगीरी और फकीरी मजदूरों को बेहाल बनाए हुए हैं।
यह सही है कि मनरेगा जैसी योजनाओं और प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कुछ मजदूरों तक पहुंचा है, पर मजदूरों का वर्ग इतना बड़ा है कि यह योजनाएं नाकाफी लगती है। 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है। उम्मीद है कि इनके भी स्वर्णिम भविष्य के आगाज के रास्ते प्रशस्त हों, ताकि मजदूरी पेशा रहे मजबूरी नहीं।
उधर, शहर में ही तमाम चाक चौबारों पर हर रोज मजदूरों का जमघट लगता है। चौराहा इनकी भीड़ से सिमट सा जाते हैं। हर रोज इन श्रमिकों को इंतजार रहता है, उन लोगोें का जो इन्हें श्रम के लिए दिन भर के लिए तय श्रमराशि देकर श्रम कराए। इसको लेकर बोली लगती है।
हर कोई कम से कम में काम करने वाले मजदूर को तलाशता है। ज्यादा उम्र वालों को तो निराशा ही हाथ लगती है। लोग कम उम्र वाले हष्ट पुष्ट श्रमिकों को ही पसंद कर काम पर ले जाते हैं, ताकि जितनी दिहाड़ी तय हुई है, उसकी पाई पाई श्रम कराके वसूली जा सके।
1 मई को पूरे देश में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सुबह या तो कहीं कहीं मजदूर दिवस को लेकर गोष्ठियां शुरू होगी या फिर पुरानी लकीरें पीटी जाएंगी। इसके बाद भी इन सबसे कोसो दूर मजदूर अपने परिवार के लिए रोटी की व्यवस्था करने के लिए चौराहों पर भीड़ के रूप में हर रोज की तरह खड़े होंगे।
उधर, वैसे तो जिले में पांच लाख से अधिक मनरेगा सहित दिहाड़ी मजदूर हैं, पर श्रम विभाग में पंजीकृत मजदूरों की संख्या करीब 12 हजार है। खास बात यह है कि हर रोज सैकड़ों की तादाद में दिहाड़ी मजदूर शहर में खुले आसमां के नीचे चौबारों के किनारे सर्दी गर्मी बरसात हर मौसम में काम की तलाश में खड़े होते हैं।
इसके अलावा दिहाड़ी मजदूरों के लिए न तो यूनियन है और न ही बैठने के लिए कोई स्थान। इसके अलावा रहनुमा ही इनके लिए टीनशेड तक की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। उधर, सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ उन्हीं श्रमिकों/परिवारों को मिलता है, जो कि श्रम विभाग में पंजीकृत है।
उधर, जानकारों की मानें तो मजदूर आंदोलन मजदूर किसान पार्टी ने 1923 में मद्रास से शुरू किया। लाल झंडे के साथ शुरू हुई इस क्रांति के बाद से 1923 से ही मजदूरों के लिए आठ घंटे का काम प्रस्तावित किया गया, तभी से इसे मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है।
कहने को तो मजदूरों के हितों के लिए तमाम योजनाएं संचालित हो रही हैं, पर कहीं योजनाओं के मानक आड़े आते है तो कहीं योजनाओं के जिम्मेदारों की बेखबरी काम बनने नहीं देती। ऊपर से कार्यालयों की बाबूगीरी और फकीरी मजदूरों को बेहाल बनाए हुए हैं।
यह सही है कि मनरेगा जैसी योजनाओं और प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कुछ मजदूरों तक पहुंचा है, पर मजदूरों का वर्ग इतना बड़ा है कि यह योजनाएं नाकाफी लगती है। 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है। उम्मीद है कि इनके भी स्वर्णिम भविष्य के आगाज के रास्ते प्रशस्त हों, ताकि मजदूरी पेशा रहे मजबूरी नहीं।
उधर, शहर में ही तमाम चाक चौबारों पर हर रोज मजदूरों का जमघट लगता है। चौराहा इनकी भीड़ से सिमट सा जाते हैं। हर रोज इन श्रमिकों को इंतजार रहता है, उन लोगोें का जो इन्हें श्रम के लिए दिन भर के लिए तय श्रमराशि देकर श्रम कराए। इसको लेकर बोली लगती है।
हर कोई कम से कम में काम करने वाले मजदूर को तलाशता है। ज्यादा उम्र वालों को तो निराशा ही हाथ लगती है। लोग कम उम्र वाले हष्ट पुष्ट श्रमिकों को ही पसंद कर काम पर ले जाते हैं, ताकि जितनी दिहाड़ी तय हुई है, उसकी पाई पाई श्रम कराके वसूली जा सके।
1 मई को पूरे देश में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सुबह या तो कहीं कहीं मजदूर दिवस को लेकर गोष्ठियां शुरू होगी या फिर पुरानी लकीरें पीटी जाएंगी। इसके बाद भी इन सबसे कोसो दूर मजदूर अपने परिवार के लिए रोटी की व्यवस्था करने के लिए चौराहों पर भीड़ के रूप में हर रोज की तरह खड़े होंगे।
उधर, वैसे तो जिले में पांच लाख से अधिक मनरेगा सहित दिहाड़ी मजदूर हैं, पर श्रम विभाग में पंजीकृत मजदूरों की संख्या करीब 12 हजार है। खास बात यह है कि हर रोज सैकड़ों की तादाद में दिहाड़ी मजदूर शहर में खुले आसमां के नीचे चौबारों के किनारे सर्दी गर्मी बरसात हर मौसम में काम की तलाश में खड़े होते हैं।
इसके अलावा दिहाड़ी मजदूरों के लिए न तो यूनियन है और न ही बैठने के लिए कोई स्थान। इसके अलावा रहनुमा ही इनके लिए टीनशेड तक की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। उधर, सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ उन्हीं श्रमिकों/परिवारों को मिलता है, जो कि श्रम विभाग में पंजीकृत है।
उधर, जानकारों की मानें तो मजदूर आंदोलन मजदूर किसान पार्टी ने 1923 में मद्रास से शुरू किया। लाल झंडे के साथ शुरू हुई इस क्रांति के बाद से 1923 से ही मजदूरों के लिए आठ घंटे का काम प्रस्तावित किया गया, तभी से इसे मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है।