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उपवास रख मांगी पति की लंबी उम्र
अमर उजाला ब्यूरो हरदोई।
Updated Fri, 30 Oct 2015 11:58 PM IST
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गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के बीच प्रेम, समर्पण व विश्वास ही वह सूत्र है जो सुखी व सौभाग्यशाली बनाते हैं। मानवीय रिश्तों व धर्म के प्रति गहरी आस्था बनाए रखने के उद्देश्य से ही हिंदू धर्म में विशेष देव उपासना से जुड़ी घड़ियां नियत हैं। उन्हीं मंगल अवसरों में से एक करवा चौथ का पर्व शुक्रवार को जब आया तो विधि विधान से सुहागिनों ने पूजन अर्चन कर पति की लंबी आयु की कामना की।
इसके लिए विशेष रूप से मंगलमूर्ति भगवान गणेश के साथ शुक्रवार को देर शाम चंद्र उदय होतेे ही सुहागिनों ने परंपराओं व शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार ही पूजन पाठ शुरू किया। एक चौकी पर यथासंभव मिट्टी के गणेश की स्थापना के साथ चतुर्थी देवी का स्मरण कर श्री गणेश को सिंदूर, अक्षत, पीले वस्त्र, फूल, यज्ञोपवीत चढ़ाने के साथ मिठाई से भरे करवे भी रखे गए।
उसके बाद विधिवत पूजन करे व उनका भोग लगाया गया। इसके बाद उपवास रही सुहागिनों ने गणेशाय नमस्त्रुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक, संकटहर में देव ग्रहणार्त्य नमोस्तुते...मंत्र पढ़कर पति की दीर्घायु की कामना भी की।
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इस दिन सुहागिनों को सुबह ही व्रत का संकल्प लेकर सुबह से ही शाम को होने वाले पूजन आदि में तल्लीन दिखी। पूजा घर में दीवार आदि को साफ कर उस पर गेरू से फलक बनाकर चावल, हल्दी के घोल से करवा आदि बनाए गए। करवा के चित्र में गेरू की स्याही से गणेश जी, पार्वती जी, शंकर एंव कार्तिकेय जी का चित्र बनाकर एक वट वृक्ष तथा मानव आकृति बनाकर उसकेहाथ में चलनी भी बनाई गई।
बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि पास में ही उदित होते हुए चांद का एक चित्र बनाए जाने की भी परंपरा है। तत्पश्चात पीली मिट्टी से गौरी प्रतिमा बनाकर उनकी गोद में गणेश जी बनाकर बिठाए जाते हैं।
शाम को चंद्र उदय होने के बाद दोनों करवे चावल से भरे पात्र से ढककर उस पर सुपारी, नेवैद्य के रूप में चावल शक्कर से बने लड्डू , पूड़ी की आठ अठावरी तथा कोई ऋतुफल अर्पित किए। दाएं करवे को बाएं और बाएं करवे को दाई और स्थापित कर मंत्रों का प्रयोग करने केबाद पूजन किया गया।
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इसके लिए विशेष रूप से मंगलमूर्ति भगवान गणेश के साथ शुक्रवार को देर शाम चंद्र उदय होतेे ही सुहागिनों ने परंपराओं व शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार ही पूजन पाठ शुरू किया। एक चौकी पर यथासंभव मिट्टी के गणेश की स्थापना के साथ चतुर्थी देवी का स्मरण कर श्री गणेश को सिंदूर, अक्षत, पीले वस्त्र, फूल, यज्ञोपवीत चढ़ाने के साथ मिठाई से भरे करवे भी रखे गए।
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उसके बाद विधिवत पूजन करे व उनका भोग लगाया गया। इसके बाद उपवास रही सुहागिनों ने गणेशाय नमस्त्रुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक, संकटहर में देव ग्रहणार्त्य नमोस्तुते...मंत्र पढ़कर पति की दीर्घायु की कामना भी की।
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इस दिन सुहागिनों को सुबह ही व्रत का संकल्प लेकर सुबह से ही शाम को होने वाले पूजन आदि में तल्लीन दिखी। पूजा घर में दीवार आदि को साफ कर उस पर गेरू से फलक बनाकर चावल, हल्दी के घोल से करवा आदि बनाए गए। करवा के चित्र में गेरू की स्याही से गणेश जी, पार्वती जी, शंकर एंव कार्तिकेय जी का चित्र बनाकर एक वट वृक्ष तथा मानव आकृति बनाकर उसकेहाथ में चलनी भी बनाई गई।
बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि पास में ही उदित होते हुए चांद का एक चित्र बनाए जाने की भी परंपरा है। तत्पश्चात पीली मिट्टी से गौरी प्रतिमा बनाकर उनकी गोद में गणेश जी बनाकर बिठाए जाते हैं।
शाम को चंद्र उदय होने के बाद दोनों करवे चावल से भरे पात्र से ढककर उस पर सुपारी, नेवैद्य के रूप में चावल शक्कर से बने लड्डू , पूड़ी की आठ अठावरी तथा कोई ऋतुफल अर्पित किए। दाएं करवे को बाएं और बाएं करवे को दाई और स्थापित कर मंत्रों का प्रयोग करने केबाद पूजन किया गया।