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ऑनलाइन कक्षाओं से बदला बच्चों का स्वभाव
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हरदोई। बॉल, हॉकी, क्रिकेट, खो-खो, लूडो, सांप-सीढ़ी, शतरंज और बिजनेस गेम...। ये खेल-खिलौने अब बच्चों को कम ही लुभा रहे हैं। घर और परिवार के सदस्यों के साथ गपशप करना भी इनको अब काफी बोरिंग लगने लगा है।
इधर, मोबाइल गेमिंग और कार्टून देखना न सिर्फ बच्चों का पसंदीदा शौक बन चुुका है, बल्कि मोबाइल की चाहत लत की तरह दिलो-दिमाग में घर कर रही है। यह सब अभी दो साल में बदला है।
कोरोना महामारी की पहली से लेकर तीसरी लहर ने बच्चों में इस बीमारी को अपनी समेटकर लेकर आई है। स्कूल बंद होने की वजह से शिक्षा व्यवस्था में आई ऑनलाइन कक्षाओं के साथ धीरे से बच्चों ने बचपने में मोबाइल से गहरी दोस्ती कर ली है।
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मां-बाप बच्चों के स्वभाव में आए इस परिवर्तन को लेकर परेशानी में हैं। मोहल्ला सुभाषनगर निवासी अजीत के घर आते ही उनसे चिपककर चॉकलेट-खिलौनों की फरमाइश करने वाला उनका बच्चा वैभव अब उनका इंतजार सिर्फ मोबाइल के लिए करता है।
घर में दाखिल होते ही मोबाइल हाथ से छीन लेता है और एकांत में बैठकर कार्टून देखने लगता है। उनके घर में न होने पर मां से मोबाइल की जिद करता है। खिलौनों से तो खेलता ही नहीं।
ऐसा केवल वैभव के साथ नहीं है, बल्कि अन्य बच्चे भी इस लत की चपेट में आ गए हैं। बच्चों ने मोबाइल की लत के चक्कर में तो अब खेलना-कूदना भी बंद कर दिया है। बस सारा दिन मोबाइल पर चिपके रहने के साथ ही कार्टून आदि देखते ही नजर आते हैं।
लत छुड़ाने में लगेगा काफी समय
इस बाबत मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मोबाइल की लत सिगरेट और कोकीन जैसे नशे से भी ज्यादा खतरनाक है। छोटे बच्चों को इस लत के नुकसान का अनुमान भी नहीं होता है, इसलिए उन्हें समझाकर मोबाइल छुड़वाना अभिभावकों के लिए काफी मुश्किल होगा।
हालांकि, लत छुड़ाने का एक सरल सुझाव भी विशेषज्ञ देते हैं। यदि अभिभावक बच्चों को पर्याप्त समय देना शुरू कर दें, अपनी व्यस्तताओं के बावजूद भी वह ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों के लिए निकालें, तो थोड़े समय में मोबाइल की लत कम या खत्म हो सकती है।
समय बचाने के लिए बच्चों को मोबाइल गैजेट्स में उलझाना भी बेहद घातक हो सकता है। इस लत को छुड़ाने के लिए काफी समय लग सकता है।
मेरा बेटा वंश कक्षा आठ का छात्र है। मोबाइल पर क्लास की वजह से उसे मोबाइल देना पड़ता था। क्लास के बाद थोड़ी देर कार्टून देखने की जिद करता था, तो अनुमति दे देते थे। अब मोबाइल का आदी हो गया है।
- अंजू गुप्ता, अभिभावक
मेरा बेटा कार्तिकेय पांडेय कक्षा आठ में पढ़ता है। कार्टून का इतना दीवाना है कि कई-कई घंटे मोबाइल में कार्टून देखता रहता है। अपने साथ के बच्चों के साथ खेलना भी बहुत कम कर दिया है।
-गीता पांडेय, अभिभावक
बेटी अंजलि सातवीं कक्षा में पढ़ती है। जब से ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ाई शुरू हुईं है, तब से मोबाइल में गेम खेलने और कार्टून देखने का खूब शौक चढ़ा है। कई घंटे मोबाइल में व्यस्त रहती है।
चंद्रभान सिंह, अभिभावक
मेरा बेटा कक्षा नौ में पढ़ता है। मोबाइल पर गेम खेलने का शौकीन हो गया है। ऑनलाइन कक्षाओं की वजह से मोबाइल देना पड़ता था, तभी से इसे यह शौक लगा है।
- अजय सिंह, अभिभावक
बच्चों में आंखों की समस्या ज्यादा हो रही है। काफी नजदीक से मोबाइल की छोटी स्क्रीन को ज्यादा समय तक लगातार देखने से उनकी आंखों में दिक्कत आ रही है।
इसके अलावा शारीरिक काम से दूर होने की वजह से उनका शारीरिक व मानसिक विकास भी प्रभावित हुआ है। स्कूल खुलने लगे हैं, संभवतया मोबाइल एक्टिविटी कम होने से लत भी छूट जाएगी, लेकिन अभिभावकों को इस बारे में सतर्क रहना होगा।
- डॉ. अमरजीत अजमानी, बाल रोग विशेषज्ञ
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इधर, मोबाइल गेमिंग और कार्टून देखना न सिर्फ बच्चों का पसंदीदा शौक बन चुुका है, बल्कि मोबाइल की चाहत लत की तरह दिलो-दिमाग में घर कर रही है। यह सब अभी दो साल में बदला है।
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कोरोना महामारी की पहली से लेकर तीसरी लहर ने बच्चों में इस बीमारी को अपनी समेटकर लेकर आई है। स्कूल बंद होने की वजह से शिक्षा व्यवस्था में आई ऑनलाइन कक्षाओं के साथ धीरे से बच्चों ने बचपने में मोबाइल से गहरी दोस्ती कर ली है।
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मां-बाप बच्चों के स्वभाव में आए इस परिवर्तन को लेकर परेशानी में हैं। मोहल्ला सुभाषनगर निवासी अजीत के घर आते ही उनसे चिपककर चॉकलेट-खिलौनों की फरमाइश करने वाला उनका बच्चा वैभव अब उनका इंतजार सिर्फ मोबाइल के लिए करता है।
घर में दाखिल होते ही मोबाइल हाथ से छीन लेता है और एकांत में बैठकर कार्टून देखने लगता है। उनके घर में न होने पर मां से मोबाइल की जिद करता है। खिलौनों से तो खेलता ही नहीं।
ऐसा केवल वैभव के साथ नहीं है, बल्कि अन्य बच्चे भी इस लत की चपेट में आ गए हैं। बच्चों ने मोबाइल की लत के चक्कर में तो अब खेलना-कूदना भी बंद कर दिया है। बस सारा दिन मोबाइल पर चिपके रहने के साथ ही कार्टून आदि देखते ही नजर आते हैं।
लत छुड़ाने में लगेगा काफी समय
इस बाबत मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मोबाइल की लत सिगरेट और कोकीन जैसे नशे से भी ज्यादा खतरनाक है। छोटे बच्चों को इस लत के नुकसान का अनुमान भी नहीं होता है, इसलिए उन्हें समझाकर मोबाइल छुड़वाना अभिभावकों के लिए काफी मुश्किल होगा।
हालांकि, लत छुड़ाने का एक सरल सुझाव भी विशेषज्ञ देते हैं। यदि अभिभावक बच्चों को पर्याप्त समय देना शुरू कर दें, अपनी व्यस्तताओं के बावजूद भी वह ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों के लिए निकालें, तो थोड़े समय में मोबाइल की लत कम या खत्म हो सकती है।
समय बचाने के लिए बच्चों को मोबाइल गैजेट्स में उलझाना भी बेहद घातक हो सकता है। इस लत को छुड़ाने के लिए काफी समय लग सकता है।
मेरा बेटा वंश कक्षा आठ का छात्र है। मोबाइल पर क्लास की वजह से उसे मोबाइल देना पड़ता था। क्लास के बाद थोड़ी देर कार्टून देखने की जिद करता था, तो अनुमति दे देते थे। अब मोबाइल का आदी हो गया है।
- अंजू गुप्ता, अभिभावक
मेरा बेटा कार्तिकेय पांडेय कक्षा आठ में पढ़ता है। कार्टून का इतना दीवाना है कि कई-कई घंटे मोबाइल में कार्टून देखता रहता है। अपने साथ के बच्चों के साथ खेलना भी बहुत कम कर दिया है।
-गीता पांडेय, अभिभावक
बेटी अंजलि सातवीं कक्षा में पढ़ती है। जब से ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ाई शुरू हुईं है, तब से मोबाइल में गेम खेलने और कार्टून देखने का खूब शौक चढ़ा है। कई घंटे मोबाइल में व्यस्त रहती है।
चंद्रभान सिंह, अभिभावक
मेरा बेटा कक्षा नौ में पढ़ता है। मोबाइल पर गेम खेलने का शौकीन हो गया है। ऑनलाइन कक्षाओं की वजह से मोबाइल देना पड़ता था, तभी से इसे यह शौक लगा है।
- अजय सिंह, अभिभावक
बच्चों में आंखों की समस्या ज्यादा हो रही है। काफी नजदीक से मोबाइल की छोटी स्क्रीन को ज्यादा समय तक लगातार देखने से उनकी आंखों में दिक्कत आ रही है।
इसके अलावा शारीरिक काम से दूर होने की वजह से उनका शारीरिक व मानसिक विकास भी प्रभावित हुआ है। स्कूल खुलने लगे हैं, संभवतया मोबाइल एक्टिविटी कम होने से लत भी छूट जाएगी, लेकिन अभिभावकों को इस बारे में सतर्क रहना होगा।
- डॉ. अमरजीत अजमानी, बाल रोग विशेषज्ञ