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अब ‘बाबी खरबूजा’ ने घोली मिठास
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Wed, 03 Jun 2015 12:10 AM IST
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लाल सन्मानी ने अपने कृषि विविधीकरण के आगाज को आगे बढ़ाते हुए हरदोई में
ताईवान के बाबी नामक प्रजाति के खरबूजे की पैदावार कर उसकी मिठास घोल दी
है। बाजार में बाबी को लोग हाथों हाथ खरीद रहे हैं।
जिले में बाबी की कीमत 20 रुपये प्रति किलो रखी गई है, जो अभी विशेष रूप से उत्पादक के कार्यालय से ही मुहैया है। उत्पादक किसान द्वारा बाबी को मुंबई, दिल्ली और बरेली के साथ लखनऊ की बाजारों में उतारने की योजना बनाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से प्रचलित प्रजाति के खरबूजों पर मौसम की मार से न केवल उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि लागत के अनुरूप अपेक्षानुसार लाभ नहीं मिलता, इसलिए उन्होंने जिले के किसानों को इस ओर जागरूक करने के साथ खुद के कृषि कारोबार को आगे बढ़ाने को काफी शोध के बाद बाबी का उत्पादन करने का निर्णय लिया और एक एकड़ कृषि भूमि में उसका उत्पादन किया।
उन्होंने बताया कि एक एकड़ में ताईवान के इस खास खरबूजे बाबी प्रजाति के उत्पादन पर करीब एक लाख रुपये की लागत आई और करीब 125 से 130 क्विंटल खरबूजे का उत्पादन होने का अनुमान है।
उन्होंने बताया कि इस तरह से बाजारी खर्च आदि निकालने के बाद भी उन्हें उम्मीद है कि वे इस उत्पादन से करीब एक से सवा लाख रुपये की बचत कर लेंगे। इस उत्पादन में उन्हें 100 दिनों तक मेहनत करनी पड़ी। बताया कि औसतन 90 से 100 दिन में यह फसल तैयार हो जाती है।
जिले में बाबी की कीमत 20 रुपये प्रति किलो रखी गई है, जो अभी विशेष रूप से उत्पादक के कार्यालय से ही मुहैया है। उत्पादक किसान द्वारा बाबी को मुंबई, दिल्ली और बरेली के साथ लखनऊ की बाजारों में उतारने की योजना बनाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से प्रचलित प्रजाति के खरबूजों पर मौसम की मार से न केवल उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि लागत के अनुरूप अपेक्षानुसार लाभ नहीं मिलता, इसलिए उन्होंने जिले के किसानों को इस ओर जागरूक करने के साथ खुद के कृषि कारोबार को आगे बढ़ाने को काफी शोध के बाद बाबी का उत्पादन करने का निर्णय लिया और एक एकड़ कृषि भूमि में उसका उत्पादन किया।
उन्होंने बताया कि एक एकड़ में ताईवान के इस खास खरबूजे बाबी प्रजाति के उत्पादन पर करीब एक लाख रुपये की लागत आई और करीब 125 से 130 क्विंटल खरबूजे का उत्पादन होने का अनुमान है।
उन्होंने बताया कि इस तरह से बाजारी खर्च आदि निकालने के बाद भी उन्हें उम्मीद है कि वे इस उत्पादन से करीब एक से सवा लाख रुपये की बचत कर लेंगे। इस उत्पादन में उन्हें 100 दिनों तक मेहनत करनी पड़ी। बताया कि औसतन 90 से 100 दिन में यह फसल तैयार हो जाती है।