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‘अलका’ के हौसलों ने भर ली उड़ान
Hardoi
Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’ मन में हो जज्बा तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। फिर चाहे आर्थिक तंगी की बात हो चाहे शारीरिक अक्षमता की। कुछ ऐसा ही अलका ने कर दिखाया। विकलांगता के बावजूद हौसलों की उड़ान में अलका ने बाजी मारी। पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होकर न उसने मां-बाप के सपने को साकार किया बल्कि समाज को भी नई प्रेरणा दी। खाली वक्त में मन के भावों को कागजों पर उकेरकर बेहतर चित्रकारी की मिशाल प्रस्तुत करने वाली अलका आज परिवार पर बोझ नहीं बल्कि परिवार के लोगों के लिए नाज बन गई है।
नगर क्षेत्र के मोहल्ला सदर बाजार निवासी गोपी चंद गुप्ता के चार बेटों में इकलौती बेटी अलका उर्फ शारदा जन्मजात विकलांगता से ग्रसित है। परिजनों ने काफी इलाज भी कराया लेकिन नतीजा सिफर रहा। हाथ-पैरों से लाचार अलका के मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा हुआ। साथ की लड़कियों को खेलता वह खेल तो नहीं सकी, लेकिन पढ़ाई-लिखाई में वह उन सबको पीछे छोड़ती गई। अलका ने नगर के आर्यकन्या कॉलेज से उच्च शिक्षा ग्रहण की, लेकिन एक सवाल जो रह-रहकर झकझोरता रहता कि आखिर कैसे वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और अपने साथ-साथ परिवार के बोझ में भी कुछ हाथ बंटा सके। बस फिर क्या था। तलाश शुरू होते ही मंजिल भी खुद ब खुद उसकी तरफ चल पड़ी।
मां मुन्नीदेवी की प्रेरणा से कंप्यूटर कोर्स, टाईपिंग, मेंहदी, पेटिंग, सिलाई, कढ़ाई, फल संरक्षण कोर्स के अलावा एनटीटी की शिक्षा पूरी की और एक प्राइवेट प्रतिष्ठान में एकाउंट व कैशियर के पद पर काम शुरू कर दिया। खाली वक्त मिलने पर मन के भावों को कागजों पर उकेरकर अच्छी चित्रकारी भी करने लगी। आज विकलांग बेटी परिवार के लिए नाज बन गई। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दुनिया में कुछ मुश्किल नहीं, इस बात की सोच मन में बनाते हुए उसने अपना कदम आगे बढ़ाया था। आज वह इसी जज्बे के सहारे हर मुश्किल को पार कर इस मुकाम पर पहुंची है। अलका आज समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गई है।
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नगर क्षेत्र के मोहल्ला सदर बाजार निवासी गोपी चंद गुप्ता के चार बेटों में इकलौती बेटी अलका उर्फ शारदा जन्मजात विकलांगता से ग्रसित है। परिजनों ने काफी इलाज भी कराया लेकिन नतीजा सिफर रहा। हाथ-पैरों से लाचार अलका के मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा हुआ। साथ की लड़कियों को खेलता वह खेल तो नहीं सकी, लेकिन पढ़ाई-लिखाई में वह उन सबको पीछे छोड़ती गई। अलका ने नगर के आर्यकन्या कॉलेज से उच्च शिक्षा ग्रहण की, लेकिन एक सवाल जो रह-रहकर झकझोरता रहता कि आखिर कैसे वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और अपने साथ-साथ परिवार के बोझ में भी कुछ हाथ बंटा सके। बस फिर क्या था। तलाश शुरू होते ही मंजिल भी खुद ब खुद उसकी तरफ चल पड़ी।
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मां मुन्नीदेवी की प्रेरणा से कंप्यूटर कोर्स, टाईपिंग, मेंहदी, पेटिंग, सिलाई, कढ़ाई, फल संरक्षण कोर्स के अलावा एनटीटी की शिक्षा पूरी की और एक प्राइवेट प्रतिष्ठान में एकाउंट व कैशियर के पद पर काम शुरू कर दिया। खाली वक्त मिलने पर मन के भावों को कागजों पर उकेरकर अच्छी चित्रकारी भी करने लगी। आज विकलांग बेटी परिवार के लिए नाज बन गई। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दुनिया में कुछ मुश्किल नहीं, इस बात की सोच मन में बनाते हुए उसने अपना कदम आगे बढ़ाया था। आज वह इसी जज्बे के सहारे हर मुश्किल को पार कर इस मुकाम पर पहुंची है। अलका आज समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गई है।
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